वट पूर्णिमा 2026 कब है? 29 जून या कोई और दिन, जानें सही तिथि, शुभ मुहूर्त, पूजा विधि, व्रत कथा और महत्व

 वट पूर्णिमा हिंदू धर्म का एक महत्वपूर्ण व्रत और पर्व है, जिसे विशेष रूप से विवाहित महिलाएं अपने पति की लंबी आयु, सुख-समृद्धि और अखंड सौभाग्य की कामना के लिए रखती हैं। यह व्रत ज्येष्ठ मास की पूर्णिमा तिथि को मनाया जाता है। इस दिन महिलाएं वट वृक्ष (बरगद के पेड़) की पूजा करती हैं और उसकी परिक्रमा कर धागा बांधती हैं। हिंदू धर्म में वट वृक्ष को दीर्घायु, स्थिरता और समृद्धि का प्रतीक माना गया है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस वृक्ष में ब्रह्मा, विष्णु और महेश तीनों देवताओं का वास होता है, इसलिए इसकी पूजा का विशेष महत्व बताया गया है।

वट पूर्णिमा 2026 कब है? 29 जून या कोई और दिन, जानें सही तिथि, शुभ मुहूर्त, पूजा विधि, व्रत कथा और महत्व

वट पूर्णिमा व्रत केवल एक धार्मिक परंपरा नहीं है, बल्कि यह पति-पत्नी के अटूट प्रेम, समर्पण और विश्वास का प्रतीक भी माना जाता है। मान्यता है कि इस दिन श्रद्धापूर्वक व्रत और पूजा करने से वैवाहिक जीवन में सुख-शांति बनी रहती है तथा परिवार में समृद्धि आती है। धार्मिक ग्रंथों के अनुसार वट वृक्ष की पूजा करने से पुण्य फल की प्राप्ति होती है और भगवान विष्णु तथा माता लक्ष्मी की कृपा प्राप्त होती है। यह व्रत महिलाओं को मानसिक शक्ति, धैर्य और सकारात्मक ऊर्जा प्रदान करने वाला माना जाता है।

सुहागिन महिलाएं यह व्रत क्यों रखती हैं?

वट पूर्णिमा व्रत का संबंध माता सावित्री और सत्यवान की पौराणिक कथा से जुड़ा हुआ है। मान्यता है कि माता सावित्री ने अपने दृढ़ संकल्प, तपस्या और बुद्धिमत्ता के बल पर यमराज से अपने पति सत्यवान के प्राण वापस प्राप्त किए थे। इसी कारण सुहागिन महिलाएं माता सावित्री को आदर्श मानकर यह व्रत रखती हैं और अपने पति की लंबी आयु, अच्छे स्वास्थ्य तथा सुखी वैवाहिक जीवन की कामना करती हैं। माना जाता है कि श्रद्धा और विधि-विधान से किया गया यह व्रत अखंड सौभाग्य का आशीर्वाद प्रदान करता है।

वट पूर्णिमा 2026 कब है?

वट पूर्णिमा हिंदू धर्म का एक महत्वपूर्ण व्रत और पर्व है, जिसे विशेष रूप से सुहागिन महिलाएं अपने पति की दीर्घायु, सुखी दांपत्य जीवन और अखंड सौभाग्य की कामना से रखती हैं। यह व्रत ज्येष्ठ मास की पूर्णिमा तिथि को मनाया जाता है और इस दिन वट (बरगद) वृक्ष की पूजा का विशेष महत्व होता है। वर्ष 2026 में वट पूर्णिमा व्रत 29 जून, सोमवार को मनाया जाएगा। इसी दिन ज्येष्ठ पूर्णिमा तिथि भी रहेगी। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस दिन वट वृक्ष की पूजा, सावित्री-सत्यवान की कथा का श्रवण और व्रत का पालन करने से अखंड सौभाग्य का आशीर्वाद प्राप्त होता है।

29 जून या कोई और दिन की भ्रम की स्थिति:-

हर वर्ष की तरह 2026 में भी वट पूर्णिमा की तिथि को लेकर कुछ लोगों के मन में भ्रम हो सकता है। इसका मुख्य कारण विभिन्न पंचांगों और कैलेंडरों में पूर्णिमा तिथि के प्रारंभ और समाप्ति समय का अलग-अलग उल्लेख होना है। कुछ लोग तिथि के आरंभ को देखते हैं, जबकि व्रत और त्योहारों का निर्धारण प्रायः उदया तिथि (सूर्योदय के समय विद्यमान तिथि) के आधार पर किया जाता है। इसी वजह से कई बार दो अलग-अलग तारीखों को लेकर भ्रम की स्थिति बन जाती है।

सही व्रत तिथि:-

धार्मिक पंचांगों के अनुसार वट पूर्णिमा व्रत 29 जून 2026, सोमवार को रखा जाएगा। इसी दिन वट वृक्ष की पूजा, व्रत कथा का पाठ और धार्मिक अनुष्ठान करना शुभ माना गया है। सुहागिन महिलाएं इस दिन वट वृक्ष के चारों ओर धागा बांधकर पूजा करती हैं और माता सावित्री तथा सत्यवान की कथा सुनती हैं। मान्यता है कि इस व्रत के प्रभाव से पति की आयु लंबी होती है तथा वैवाहिक जीवन में सुख-समृद्धि बनी रहती है।

वट पूर्णिमा 2026 शुभ मुहूर्त

वट पूर्णिमा का व्रत सुहागिन महिलाओं के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। इस दिन वट (बरगद) वृक्ष की पूजा, सावित्री-सत्यवान की कथा का श्रवण और पति की दीर्घायु की कामना की जाती है। वर्ष 2026 में यह व्रत 29 जून, सोमवार को रखा जाएगा।

वट पूर्णिमा 2026 शुभ मुहूर्त

पूर्णिमा तिथि प्रारंभ:-

29 जून 2026 को प्रातः 03:06 बजे से पूर्णिमा तिथि प्रारंभ होगी।

पूर्णिमा तिथि समाप्त:-

30 जून 2026 को प्रातः 05:26 बजे तक पूर्णिमा तिथि रहेगी।

पूजा का शुभ समय:-

वट पूर्णिमा की पूजा प्रातः स्नान के बाद सूर्योदय से पूर्वाह्न तक करना शुभ माना जाता है। वट वृक्ष की पूजा के लिए सुबह 6:00 बजे से 11:00 बजे के बीच का समय विशेष रूप से अनुकूल माना जाता है। इस दौरान महिलाएं वट वृक्ष के चारों ओर धागा लपेटकर पूजा-अर्चना कर सकती हैं।

व्रत पारण समय:-

वट पूर्णिमा व्रत का पारण 30 जून 2026 को पूर्णिमा तिथि समाप्त होने के बाद किया जा सकता है। कई स्थानों पर महिलाएं पूजा और कथा के बाद उसी दिन व्रत का समापन भी करती हैं। पारण का समय स्थानीय पंचांग के अनुसार थोड़ा भिन्न हो सकता है।

नोट: व्रत और पूजा का अंतिम निर्णय अपने स्थानीय पंचांग या क्षेत्रीय परंपरा के अनुसार करें, क्योंकि विभिन्न क्षेत्रों में पूजा मुहूर्त में थोड़ा अंतर हो सकता है।

वट पूर्णिमा का महत्व

वट पूर्णिमा हिंदू धर्म का एक अत्यंत पवित्र व्रत है, जिसे विशेष रूप से विवाहित महिलाएं अपने पति की लंबी आयु, अच्छे स्वास्थ्य और सुखी वैवाहिक जीवन की कामना से रखती हैं। यह व्रत माता सावित्री की अटूट निष्ठा, प्रेम और समर्पण का प्रतीक माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस दिन वट (बरगद) वृक्ष की पूजा करने से अखंड सौभाग्य और सुख-समृद्धि का आशीर्वाद प्राप्त होता है।


अखंड सौभाग्य की प्राप्ति:-

वट पूर्णिमा व्रत को अखंड सौभाग्य का व्रत माना जाता है। मान्यता है कि जो महिलाएं श्रद्धा और विधि-विधान से यह व्रत रखती हैं, उन्हें वैवाहिक जीवन में सुख, शांति और समृद्धि प्राप्त होती है। साथ ही उनका सौभाग्य बना रहता है और परिवार में खुशहाली आती है। धार्मिक परंपराओं के अनुसार वट वृक्ष की पूजा करने और सावित्री-सत्यवान की कथा सुनने से महिलाओं को अखंड सौभाग्य का आशीर्वाद मिलता है।


वट पूर्णिमा व्रत का मुख्य उद्देश्य पति की लंबी आयु और अच्छे स्वास्थ्य की कामना करना है। पौराणिक कथा के अनुसार माता सावित्री ने अपने तप, प्रेम और दृढ़ संकल्प के बल पर यमराज से अपने पति सत्यवान के प्राण वापस प्राप्त किए थे। इसी घटना की स्मृति में विवाहित महिलाएं यह व्रत रखती हैं और भगवान से अपने पति की दीर्घायु तथा सुखद जीवन की प्रार्थना करती हैं। इसलिए वट पूर्णिमा को पति-पत्नी के अटूट प्रेम और विश्वास का प्रतीक भी माना जाता है।


बरगद वृक्ष का धार्मिक महत्व:-

वट पूर्णिमा पर बरगद (वट) वृक्ष की पूजा का विशेष महत्व है। हिंदू धर्म में वट वृक्ष को अमरत्व, स्थिरता और दीर्घायु का प्रतीक माना गया है। इसकी विशाल जड़ें और लंबी आयु जीवन में मजबूती और निरंतरता का संदेश देती हैं। धार्मिक मान्यता के अनुसार वट वृक्ष में भगवान ब्रह्मा, भगवान विष्णु और भगवान शिव का वास माना जाता है। इसलिए इसकी पूजा करने से त्रिदेवों का आशीर्वाद प्राप्त होता है। महिलाएं वट वृक्ष के चारों ओर पवित्र धागा लपेटकर परिवार की सुख-समृद्धि और पति की लंबी आयु की कामना करती हैं।

वट पूर्णिमा केवल एक व्रत नहीं, बल्कि प्रेम, समर्पण, विश्वास और पारिवारिक मूल्यों का प्रतीक है। यह पर्व विवाहित महिलाओं को माता सावित्री के आदर्शों का स्मरण कराता है और अखंड सौभाग्य, पति की दीर्घायु तथा पारिवारिक सुख-समृद्धि की कामना का अवसर प्रदान करता है।

वट पूर्णिमा व्रत की पूजा विधि

वट पूर्णिमा व्रत की पूजा विधि

    वट पूर्णिमा का व्रत विवाहित महिलाओं द्वारा अपने पति की लंबी आयु, सुखी दांपत्य जीवन और अखंड सौभाग्य की कामना के लिए रखा जाता है। इस दिन वट (बरगद) वृक्ष की पूजा का विशेष महत्व माना जाता है। विधि-विधान से की गई पूजा शुभ फल प्रदान करती है।

    वट पूर्णिमा के दिन प्रातः ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान करें और स्वच्छ वस्त्र धारण करें। विवाहित महिलाएं पारंपरिक रूप से लाल, पीले या हरे रंग के वस्त्र पहनती हैं तथा सोलह श्रृंगार करती हैं। इसके बाद व्रत का संकल्प लेकर भगवान विष्णु, माता लक्ष्मी और माता सावित्री का ध्यान करें। पूजा से पहले घर के मंदिर और पूजा स्थल की सफाई करें तथा पूजा सामग्री को एकत्रित कर लें।

    वट पूर्णिमा पूजा के लिए निम्नलिखित सामग्री की आवश्यकता होती है:-

    1. वट (बरगद) वृक्ष
    2. कच्चा सूती धागा या मौली
    3. रोली और कुमकुम
    4. अक्षत (चावल)
    5. हल्दी
    6. फूल और माला
    7. दीपक
    8. धूपबत्ती
    9. जल से भरा कलश
    10. फल और मिठाई
    11. नारियल
    12. पान और सुपारी
    13. सावित्री-सत्यवान का चित्र (यदि उपलब्ध हो)

    वट वृक्ष (बरगद) की पूजा:-

    वट वृक्ष के पास जाकर सबसे पहले जल अर्पित करें। इसके बाद रोली, अक्षत, फूल और कुमकुम चढ़ाएं। वृक्ष के समक्ष दीपक और धूप जलाकर पूजा करें। धार्मिक मान्यता के अनुसार वट वृक्ष में त्रिदेवों का वास माना जाता है, इसलिए श्रद्धापूर्वक उनकी आराधना करें।पूजा के दौरान माता सावित्री और सत्यवान का स्मरण करें तथा परिवार की सुख-समृद्धि और पति की दीर्घायु की प्रार्थना करें।

    परिक्रमा और धागा बांधने की विधि:-

    पूजा के बाद वट वृक्ष के चारों ओर कच्चा सूती धागा लपेटते हुए परिक्रमा करें। परंपरागत रूप से महिलाएं 7, 11, 21 या 108 परिक्रमा अपनी श्रद्धा और परंपरा के अनुसार करती हैं। परिक्रमा करते समय पति की लंबी आयु, सुखी वैवाहिक जीवन और अखंड सौभाग्य की कामना करें। इसके बाद सावित्री-सत्यवान की व्रत कथा सुनें या पढ़ें और अंत में भगवान से परिवार के कल्याण की प्रार्थना करें।

    धार्मिक मान्यताओं के अनुसार वट पूर्णिमा के दिन श्रद्धा और नियमपूर्वक की गई पूजा से अखंड सौभाग्य, पति की दीर्घायु और परिवार में सुख-समृद्धि का आशीर्वाद प्राप्त होता है। यह व्रत प्रेम, समर्पण और अटूट विश्वास का प्रतीक माना जाता है।

    वट पूर्णिमा व्रत कथा

    वट पूर्णिमा व्रत कथा

    वट पूर्णिमा का व्रत माता सावित्री और सत्यवान की अमर प्रेम कथा से जुड़ा हुआ है। यह कथा पति-पत्नी के अटूट प्रेम, समर्पण और निष्ठा का प्रतीक मानी जाती है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस कथा का श्रवण करने से व्रत का पूर्ण फल प्राप्त होता है।

    पौराणिक कथा के अनुसार प्राचीन समय में राजा अश्वपति की पुत्री सावित्री अत्यंत सुंदर, बुद्धिमान और पतिव्रता थीं। विवाह योग्य होने पर उन्होंने स्वयं सत्यवान को अपने पति के रूप में चुना। हालांकि महर्षि नारद ने राजा अश्वपति को बताया कि सत्यवान अल्पायु हैं और विवाह के एक वर्ष बाद उनकी मृत्यु हो जाएगी। यह जानने के बावजूद सावित्री अपने निर्णय पर अडिग रहीं और सत्यवान से विवाह कर लिया। विवाह के बाद उन्होंने पूरी श्रद्धा और समर्पण के साथ अपने पति की सेवा की।

    विवाह के एक वर्ष बाद वह दिन आ गया जब सत्यवान  की आयु पूरी होने वाली थी। सत्यवान जंगल में लकड़ी काटने गए और सावित्री  भी उनके साथ थीं। अचानक सत्यवान के सिर में तेज दर्द हुआ और वे सावित्री की गोद में सिर रखकर लेट गए। उसी समय उनके प्राण निकल गए। जब Yama सत्यवान के प्राण लेकर जाने लगे, तब सावित्री  भी उनके पीछे-पीछे चल पड़ीं। यमराज ने उन्हें लौटने के लिए कहा, लेकिन सावित्री ने अपने पति के प्रति अटूट प्रेम और धर्म का पालन करते हुए उनका पीछा नहीं छोड़ा। 

    सावित्री  की भक्ति, बुद्धिमत्ता और दृढ़ निश्चय से प्रसन्न होकर यमराज ने उन्हें कई वरदान दिए। अंत में सावित्री ने ऐसा वरदान मांगा जिससे उन्हें सत्यवान से संतान प्राप्त हो। यमराज अपने वचन में बंध गए, क्योंकि बिना सत्यवान के जीवित हुए यह संभव नहीं था। तब उन्होंने सत्यवान  के प्राण वापस लौटा दिए। इस प्रकार सावित्री  ने अपने तप, प्रेम और पतिव्रता धर्म के बल पर अपने पति को पुनः जीवन प्रदान किया। 

    कथा का संदेश:-

    वट पूर्णिमा की यह कथा हमें प्रेम, विश्वास, समर्पण और धैर्य का संदेश देती है। माता सावित्री  का जीवन सिखाता है कि सच्ची निष्ठा, साहस और दृढ़ संकल्प से बड़ी से बड़ी कठिनाई को भी पार किया जा सकता है। इसी कारण वट पूर्णिमा के दिन विवाहित महिलाएं माता सावित्री का स्मरण करती हैं और अपने पति की लंबी आयु, सुखी वैवाहिक जीवन तथा अखंड सौभाग्य की कामना करते हुए व्रत रखती हैं। यह पर्व भारतीय संस्कृति में आदर्श दांपत्य जीवन और अटूट प्रेम का प्रतीक माना जाता है।

    वट पूर्णिमा पर क्या दान करें?

    वट पूर्णिमा के दिन दान-पुण्य का विशेष महत्व माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस दिन श्रद्धा और सामर्थ्य के अनुसार दान करने से पुण्य फल की प्राप्ति होती है तथा परिवार में सुख-समृद्धि बनी रहती है।

    • वस्त्र दान:-

    वट पूर्णिमा के अवसर पर गरीब और जरूरतमंद लोगों को वस्त्र दान करना अत्यंत शुभ माना जाता है। वस्त्र दान से सेवा और परोपकार की भावना बढ़ती है तथा पुण्य की प्राप्ति होती है।

    • फल दान:-

    फल दान को सात्विक और पुण्यदायी माना गया है। इस दिन फल दान करने से जरूरतमंद लोगों की सहायता होती है और धार्मिक दृष्टि से शुभ फल प्राप्त होता है।

    • जल से भरा कलश:-

    गर्मी के मौसम में जल का दान विशेष महत्व रखता है। वट पूर्णिमा पर जल से भरा कलश या मटका दान करना पुण्यकारी माना जाता है। धार्मिक मान्यता है कि प्यासे व्यक्ति को जल उपलब्ध कराना सबसे श्रेष्ठ दानों में से एक है।

    • अन्न दान:-

    अन्न दान को महादान कहा गया है। इस दिन गरीबों, साधु-संतों या जरूरतमंद लोगों को अन्न दान करने से सुख-समृद्धि और पुण्य की प्राप्ति होती है।

    • दक्षिणा:-

    ब्राह्मणों, विद्वानों या जरूरतमंद लोगों को दक्षिणा देना भी शुभ माना जाता है। श्रद्धा और सामर्थ्य के अनुसार दिया गया दान विशेष फलदायी माना जाता है।

    वट पूर्णिमा पर क्या करें?

    • वट पूर्णिमा का दिन श्रद्धा, भक्ति और सौभाग्य का प्रतीक माना जाता है। इस दिन किए गए धार्मिक कार्यों से विशेष पुण्य प्राप्त होता है।
    • वट पूर्णिमा के दिन बरगद (वट) वृक्ष की विधि-विधान से पूजा करें। जल अर्पित करें, रोली-अक्षत चढ़ाएं और कच्चा धागा बांधकर परिक्रमा करें। धार्मिक मान्यता के अनुसार वट वृक्ष में त्रिदेवों का वास होता है।
    • माता सावित्री और सत्यवान की पवित्र कथा का श्रवण या पाठ करें। यह कथा पति-पत्नी के अटूट प्रेम, समर्पण और निष्ठा का संदेश देती है।
    • वस्त्र, फल, अन्न, जल से भरा कलश तथा दक्षिणा का दान करें। दान-पुण्य करने से पुण्य फल की प्राप्ति होती है और समाज सेवा का अवसर मिलता है।
    • विवाहित महिलाएं इस दिन अपने पति के स्वस्थ, सुखी और दीर्घायु जीवन की कामना करती हैं। माता सावित्री और भगवान से परिवार के सुख, शांति और समृद्धि की प्रार्थना करें।
    • दिनभर भगवान विष्णु, माता लक्ष्मी और माता सावित्री का ध्यान करें। भजन-कीर्तन, मंत्र जाप और धार्मिक ग्रंथों का पाठ करना भी शुभ माना जाता है।
    • धार्मिक मान्यता के अनुसार वट पूर्णिमा पर श्रद्धा और भक्ति के साथ किए गए ये कार्य अखंड सौभाग्य, सुखी दांपत्य जीवन और परिवार की समृद्धि का आशीर्वाद प्रदान करते हैं।

    वट पूर्णिमा पर क्या न करें?

    • वट पूर्णिमा का व्रत श्रद्धा, संयम और सदाचार का पर्व माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस दिन कुछ कार्यों से बचना चाहिए ताकि व्रत का पूर्ण फल प्राप्त हो सके।
    • व्रत के दिन क्रोध, विवाद और कटु व्यवहार से दूर रहना चाहिए। शांत मन से पूजा और भगवान का स्मरण करना शुभ माना जाता है।
    • किसी का अपमान करना, कटु वचन बोलना या निंदा करना व्रत के नियमों के विरुद्ध माना जाता है। इस दिन मधुर और सकारात्मक वाणी का प्रयोग करें।
    • जो नियम आपने व्रत के लिए संकल्पित किए हों, उनका पालन करने का प्रयास करें। श्रद्धा और अनुशासन के साथ व्रत करने से उसका आध्यात्मिक महत्व बढ़ता है।
    • वट (बरगद) वृक्ष की पूजा करते समय उसकी शाखाएं न तोड़ें, छाल न खुरचें और किसी भी प्रकार की हानि न पहुंचाएं। यह वृक्ष पूजनीय माना जाता है और इसकी रक्षा करना भी धार्मिक कर्तव्य समझा जाता है।
    • वृक्ष पर कील, प्लास्टिक या हानिकारक सामग्री न बांधें।
    • कच्चा धागा या मौली सावधानी से लपेटें।
    • पूजा के बाद स्थान की स्वच्छता बनाए रखें।
    • पर्यावरण संरक्षण का ध्यान रखें।
    • धार्मिक मान्यता के अनुसार वट पूर्णिमा पर संयम, सद्भाव और प्रकृति के प्रति सम्मान का भाव रखना ही व्रत का वास्तविक संदेश है।

    वट पूर्णिमा मंत्र

    वट पूर्णिमा के दिन मंत्र जाप का विशेष महत्व माना जाता है। श्रद्धा और भक्ति के साथ मंत्रों का उच्चारण करने से पूजा का फल बढ़ता है तथा मन को शांति और सकारात्मक ऊर्जा प्राप्त होती है। इस दिन भगवान विष्णु, माता सावित्री और वट वृक्ष की पूजा के दौरान निम्न मंत्रों का जाप किया जा सकता है।

    1. ॐ नमो भगवते वासुदेवाय:-

    यह भगवान विष्णु का अत्यंत पवित्र और प्रभावशाली मंत्र माना जाता है।

    ॐ नमो भगवते वासुदेवाय॥

    मंत्र का महत्व

    भगवान विष्णु की कृपा प्राप्त होती है।

    मन में शांति और सकारात्मकता आती है।

    जीवन में सुख और समृद्धि का आशीर्वाद मिलता है।


    2. सावित्री-सत्यवान स्मरण मंत्र:-

    वट पूर्णिमा के दिन माता सावित्री और सत्यवान का स्मरण करना शुभ माना जाता है।

    सावित्र्यै नमः। सत्यवानाय नमः॥ या ॐ सावित्र्यै स्वाहा, सत्यवानाय स्वाहा॥

    मंत्र का महत्व

    वैवाहिक जीवन में प्रेम और विश्वास बढ़ता है।

    अखंड सौभाग्य का आशीर्वाद प्राप्त होता है।

    पति-पत्नी के संबंधों में मधुरता बनी रहती है।

    3. वट वृक्ष पूजा मंत्र

    वट वृक्ष की पूजा करते समय यह मंत्र बोला जाता है:

    वटाय नमः। वटवृक्षाय नमः।

    ब्रह्मा-विष्णु-महेशाय नमः॥

    या

    मूलतो ब्रह्मरूपाय मध्यतो विष्णुरूपिणे।

    अग्रतः शिवरूपाय वृक्षराजाय ते नमः॥

    मंत्र का अर्थ

    इस मंत्र में वट वृक्ष को ब्रह्मा, विष्णु और महेश का स्वरूप मानकर प्रणाम किया जाता है। धार्मिक मान्यता है कि वट वृक्ष में त्रिदेवों का निवास होता है।

    मंत्र जाप करते समय ध्यान रखें

    • स्वच्छ मन और श्रद्धा के साथ मंत्रों का उच्चारण करें।
    • वट वृक्ष की परिक्रमा करते समय मंत्र जाप करना शुभ माना जाता है।
    • पूजा के दौरान भगवान विष्णु, माता सावित्री और सत्यवान का ध्यान करें।
    • संभव हो तो 108 बार मंत्र जाप करें।

    धार्मिक मान्यता के अनुसार वट पूर्णिमा पर इन मंत्रों का श्रद्धापूर्वक जाप करने से अखंड सौभाग्य, पति की दीर्घायु और परिवार में सुख-समृद्धि का आशीर्वाद प्राप्त होता है।

    वट पूर्णिमा व्रत के लाभ

    • वट पूर्णिमा का व्रत हिंदू धर्म में अत्यंत शुभ और पुण्यदायी माना जाता है। यह व्रत माता सावित्री की अटूट निष्ठा और समर्पण का प्रतीक है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार श्रद्धापूर्वक व्रत और पूजा करने से अनेक आध्यात्मिक तथा पारिवारिक लाभ प्राप्त होते हैं।
    • वट पूर्णिमा व्रत का सबसे बड़ा लाभ अखंड सौभाग्य माना जाता है। विवाहित महिलाएं अपने पति की लंबी आयु और सुखी दांपत्य जीवन की कामना से यह व्रत रखती हैं। मान्यता है कि माता सावित्री की कृपा से सौभाग्य और वैवाहिक सुख बना रहता है।
    • धार्मिक विश्वास के अनुसार वट पूर्णिमा के दिन श्रद्धा और भक्ति के साथ पूजा करने से परिवार में सुख, शांति और समृद्धि का वास होता है। परिवार के सदस्यों के बीच प्रेम, सद्भाव और आपसी विश्वास बढ़ता है।
    • यह व्रत पति-पत्नी के रिश्ते में प्रेम, विश्वास और समर्पण को मजबूत करने का प्रतीक माना जाता है। सावित्री और सत्यवान की कथा दांपत्य जीवन में निष्ठा, त्याग और अटूट प्रेम का संदेश देती है। इसलिए यह व्रत वैवाहिक संबंधों को और अधिक सुदृढ़ बनाने वाला माना जाता है। 
    • वट पूर्णिमा पर व्रत, पूजा, कथा श्रवण और दान-पुण्य करने से धार्मिक पुण्य प्राप्त होता है। शास्त्रों के अनुसार इस दिन वट वृक्ष की पूजा और जरूरतमंदों को दान देने से शुभ फल की प्राप्ति होती है तथा जीवन में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।
    • व्रत और पूजा के माध्यम से व्यक्ति का मन भगवान की भक्ति में लगने लगता है। इससे आत्मिक शांति, मानसिक संतुलन और आध्यात्मिक उन्नति का अनुभव होता है।
    • वट पूर्णिमा व्रत केवल एक धार्मिक परंपरा नहीं, बल्कि प्रेम, समर्पण, विश्वास और पारिवारिक मूल्यों का प्रतीक है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस व्रत को श्रद्धा और विधि-विधान से करने पर अखंड सौभाग्य, पारिवारिक सुख-शांति, वैवाहिक जीवन में मजबूती और धार्मिक पुण्य की प्राप्ति होती है। 

    वट पूर्णिमा और वट सावित्री व्रत FAQs 

    1. वट पूर्णिमा 2026 कब है?

    वर्ष 2026 में वट पूर्णिमा व्रत 29 जून 2026, सोमवार को मनाया जाएगा। यह व्रत ज्येष्ठ मास की पूर्णिमा तिथि को रखा जाता है और सुहागिन महिलाएं अपने पति की दीर्घायु, सुखी दांपत्य जीवन तथा अखंड सौभाग्य की कामना से वट (बरगद) वृक्ष की पूजा करती हैं। 

    • पूर्णिमा तिथि प्रारंभ:- 29 जून 2026, प्रातः 03:06 बजे
    • पूर्णिमा तिथि समाप्त:- 30 जून 2026, प्रातः 05:26 बजे

    धार्मिक मान्यताओं के अनुसार वट पूर्णिमा के दिन वट वृक्ष की पूजा करने, सावित्री-सत्यवान की कथा सुनने तथा व्रत रखने से पति की आयु लंबी होती है, अखंड सौभाग्य की प्राप्ति होती है और परिवार में सुख-समृद्धि बनी रहती है। इस दिन महिलाएं वट वृक्ष की परिक्रमा कर कच्चा धागा बांधती हैं और माता सावित्री की पूजा करके अपने पति के स्वास्थ्य एवं दीर्घायु की कामना करती हैं।

    2. वट पूर्णिमा और वट सावित्री व्रत में क्या अंतर है?

    वट पूर्णिमा और वट सावित्री व्रत दोनों ही माता सावित्री और सत्यवान की कथा से जुड़े हुए हैं तथा पति की दीर्घायु और अखंड सौभाग्य के लिए रखे जाते हैं। हालांकि इन दोनों व्रतों में मुख्य अंतर **तिथि और क्षेत्रीय परंपरा** का होता है।

    आधार                       | वट सावित्री व्रत                      | वट पूर्णिमा व्रत                    

    तिथि                          | ज्येष्ठ अमावस्या                     | ज्येष्ठ पूर्णिमा                        

    मुख्य रूप से प्रचलित | उत्तर भारत                           | महाराष्ट्र, गुजरात, गोवा और पश्चिम भारत 

    पूजा                          | वट (बरगद) वृक्ष की पूजा       | वट (बरगद) वृक्ष की पूजा                 

    कथा                          | सावित्री-सत्यवान कथा           | सावित्री-सत्यवान कथा                    

    उद्देश्य                        | पति की दीर्घायु और सौभाग्य | पति की दीर्घायु और अखंड सौभाग्य  

    वट सावित्री व्रत  **ज्येष्ठ मास की अमावस्या** को रखा जाता है। उत्तर भारत के कई राज्यों में यह व्रत अधिक प्रचलित है। इस दिन महिलाएं वट वृक्ष की पूजा कर सावित्री-सत्यवान की कथा सुनती हैं।

    वट पूर्णिमा व्रत **ज्येष्ठ मास की पूर्णिमा** को रखा जाता है। महाराष्ट्र और पश्चिम भारत के कई क्षेत्रों में यह व्रत विशेष रूप से मनाया जाता है। पूजा-विधि और कथा लगभग समान होती है, केवल तिथि का अंतर होता है।

    **वट सावित्री व्रत  और वट पूर्णिमा व्रत का उद्देश्य, पूजा-विधि और कथा लगभग एक जैसी है, लेकिन दोनों अलग-अलग तिथियों पर मनाए जाते हैं।** वट सावित्री व्रत अमावस्या को और वट पूर्णिमा व्रत पूर्णिमा को रखा जाता है। दोनों ही व्रत विवाहित महिलाओं के लिए अत्यंत शुभ और सौभाग्य प्रदान करने वाले माने जाते हैं। 

    3. वट पूर्णिमा पर बरगद की पूजा क्यों की जाती है?

    पूर्णिमा के दिन **बरगद (वट) वृक्ष** की पूजा करने की परंपरा का संबंध धार्मिक मान्यताओं, पौराणिक कथाओं और आध्यात्मिक महत्व से जुड़ा हुआ है। हिंदू धर्म में वट वृक्ष को **दीर्घायु, अमरत्व, स्थिरता और समृद्धि** का प्रतीक माना जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार वट वृक्ष में **ब्रह्मा, विष्णु और महेश (त्रिदेव)** का वास होता है। माना जाता है कि इसकी जड़ों में ब्रह्मा, तने में विष्णु और शाखाओं में भगवान शिव निवास करते हैं। इसलिए इसकी पूजा करने से त्रिदेवों का आशीर्वाद प्राप्त होता है।

    पौराणिक कथा के अनुसार माता सावित्री ने अपने पति सत्यवान के प्राण वट वृक्ष के नीचे ही यमराज से वापस प्राप्त किए थे। तभी से वट वृक्ष को अखंड सौभाग्य, पति की दीर्घायु और वैवाहिक सुख का प्रतीक माना जाता है। इसी कारण विवाहित महिलाएं वट पूर्णिमा के दिन बरगद की पूजा करती हैं। बरगद का वृक्ष सैकड़ों वर्षों तक जीवित रह सकता है और लगातार फैलता रहता है। इसकी विशाल जड़ें और मजबूत तना लंबी आयु, मजबूती और स्थिरता का संदेश देते हैं। इसलिए महिलाएं अपने पति और परिवार की दीर्घायु की कामना से इसकी पूजा करती हैं। वट पूर्णिमा के दिन महिलाएं बरगद के वृक्ष की परिक्रमा करके कच्चा धागा बांधती हैं। यह पति-पत्नी के अटूट रिश्ते, प्रेम, विश्वास और समर्पण का प्रतीक माना जाता है।

    4. वट पूर्णिमा का व्रत कौन रख सकता है?

    • वट पूर्णिमा का व्रत मुख्य रूप से विवाहित (सुहागिन) महिलाएं अपने पति की लंबी आयु, अच्छे स्वास्थ्य और सुखी दांपत्य जीवन की कामना से रखती हैं। यह व्रत माता सावित्री और सत्यवान की पवित्र कथा से जुड़ा हुआ है और अखंड सौभाग्य का प्रतीक माना जाता है।
    • वट पूर्णिमा व्रत रखने की परंपरा सबसे अधिक विवाहित महिलाओं में प्रचलित है। वे इस दिन वट (बरगद) वृक्ष की पूजा करती हैं, परिक्रमा करती हैं और अपने पति की दीर्घायु की प्रार्थना करती हैं।
    • कुछ क्षेत्रों में अविवाहित कन्याएं भी अच्छे और योग्य जीवनसाथी की कामना से वट पूर्णिमा की पूजा करती हैं। हालांकि यह परंपरा हर क्षेत्र में समान रूप से प्रचलित नहीं है।
    • धार्मिक दृष्टि से भगवान की पूजा पर किसी का अधिकार सीमित नहीं है। इसलिए पुरुष भी वट वृक्ष की पूजा, दान-पुण्य और धार्मिक अनुष्ठान कर सकते हैं। हालांकि व्रत रखने की परंपरा मुख्य रूप से महिलाओं से जुड़ी मानी जाती है।
    • बुजुर्ग महिलाएं भी परिवार की सुख-समृद्धि और संतान के कल्याण की कामना से यह व्रत रख सकती हैं।
    • यदि किसी व्यक्ति की स्वास्थ्य स्थिति उपवास की अनुमति नहीं देती, तो वह बिना कठोर उपवास के भी श्रद्धा और भक्ति के साथ पूजा-अर्चना कर सकता है। धर्म में भाव और श्रद्धा को सबसे अधिक महत्व दिया गया है।

    5. वट पूर्णिमा पर कितनी परिक्रमा करनी चाहिए?

    वट पूर्णिमा के दिन वट (बरगद) वृक्ष की परिक्रमा करने का विशेष महत्व माना जाता है। परिक्रमा की संख्या अलग-अलग क्षेत्रों और पारिवारिक परंपराओं के अनुसार भिन्न हो सकती है।

    1. 7 परिक्रमा – सबसे अधिक प्रचलित
    2. 11 परिक्रमा – शुभ मानी जाती है
    3. 21 परिक्रमा – कई परिवारों में परंपरानुसार
    4. 108 परिक्रमा – विशेष श्रद्धा और संकल्प के साथ
    5. वट वृक्ष के चारों ओर कच्चा सूती धागा या मौली लपेटें।
    6. माता सावित्री और सत्यवान का स्मरण करें।
    7. पति की दीर्घायु, सुखी दांपत्य जीवन और अखंड सौभाग्य की कामना करें।
    8. "ॐ नमो भगवते वासुदेवाय" या अन्य पूजन मंत्रों का जाप करें।

    6 .क्या 108 परिक्रमा जरूरी हैं?

    नहीं। 108 परिक्रमा करना अनिवार्य नहीं है। अधिकांश महिलाएं अपनी पारिवारिक परंपरा के अनुसार 7 या 11 परिक्रमा करती हैं। धर्म में संख्या से अधिक श्रद्धा, भक्ति और सच्चे मन से की गई पूजा को महत्व दिया गया है।

    प्रिय पाठकों,

    वट पूर्णिमा केवल एक धार्मिक व्रत नहीं, बल्कि प्रेम, विश्वास, समर्पण और अटूट वैवाहिक बंधन का प्रतीक है। माता सावित्री के आदर्श हमें यह सिखाते हैं कि सच्ची निष्ठा, धैर्य और श्रद्धा से जीवन की बड़ी से बड़ी कठिनाइयों पर भी विजय प्राप्त की जा सकती है। आशा है कि इस लेख के माध्यम से आपको वट पूर्णिमा 2026 की सही तिथि, शुभ मुहूर्त, पूजा विधि, व्रत कथा, मंत्र, महत्व और नियमों की संपूर्ण जानकारी प्राप्त हुई होगी। यदि यह जानकारी आपके लिए उपयोगी रही हो, तो इसे अपने परिवार और मित्रों के साथ अवश्य साझा करें। माता सावित्री और वट वृक्ष की कृपा से आपके जीवन में सुख, समृद्धि, अखंड सौभाग्य और पारिवारिक खुशहाली बनी रहे।

    वट पूर्णिमा की हार्दिक शुभकामनाएं! 

    आर्टिकल पढ़ने के लिए धन्यवाद 

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