कृष्ण जन्माष्टमी 2026 कब है? तिथि, पूजा विधि और महत्व की पूरी जानकारी

कृष्ण जन्माष्टमी हिंदू धर्म के प्रमुख और पवित्र त्योहारों में से एक है। यह पर्व भगवान श्रीकृष्ण के जन्मोत्सव के रूप में पूरे भारत और विश्व के अनेक देशों में श्रद्धा एवं उत्साह के साथ मनाया जाता है। हिंदू पंचांग के अनुसार यह त्योहार भाद्रपद माह के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को मनाया जाता है। इस दिन भक्त भगवान श्रीकृष्ण की पूजा-अर्चना करते हैं, व्रत रखते हैं और मध्यरात्रि में उनके जन्मोत्सव का आयोजन करते हैं। यह पर्व इसलिए मनाया जाता है क्योंकि भगवान श्रीकृष्ण ने पृथ्वी पर धर्म की स्थापना और अधर्म के विनाश के लिए अवतार लिया था। श्रीकृष्ण ने अपने जीवन और उपदेशों के माध्यम से मानवता को सत्य, प्रेम, कर्म और भक्ति का मार्ग दिखाया। उनके द्वारा दिए गए उपदेश आज भी लोगों के जीवन को सही दिशा प्रदान करते हैं।

कृष्ण जन्माष्टमी 2026 कब है? तिथि, पूजा विधि और महत्व की पूरी जानकारी

भगवान श्रीकृष्ण को भगवान विष्णु का आठवाँ अवतार माना जाता है। उनका जन्म मथुरा में राजा कंस के अत्याचारों से लोगों की रक्षा करने के लिए हुआ था। श्रीकृष्ण बचपन से ही अपनी लीलाओं, अद्भुत चमत्कारों और दिव्य व्यक्तित्व के लिए प्रसिद्ध रहे हैं। उनकी शिक्षाएँ, विशेष रूप से श्रीमद्भगवद्गीता में वर्णित उपदेश, आज भी करोड़ों लोगों के लिए प्रेरणा का स्रोत हैं।

कृष्ण जन्माष्टमी 2026 कब है? 

कृष्ण जन्माष्टमी भगवान श्रीकृष्ण के जन्मोत्सव के रूप में मनाया जाने वाला एक प्रमुख हिंदू पर्व है। यह त्योहार भाद्रपद माह के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को मनाया जाता है। वर्ष 2026 में भी श्रद्धालु पूरे उत्साह और भक्ति के साथ इस पावन पर्व को मनाएंगे। जन्माष्टमी के दिन भक्त उपवास रखते हैं, मंदिरों को सजाते हैं और मध्यरात्रि में भगवान श्रीकृष्ण के जन्म का उत्सव मनाते हैं।

जन्माष्टमी की तिथि:-

हिंदू पंचांग के अनुसार कृष्ण जन्माष्टमी भाद्रपद मास की कृष्ण पक्ष अष्टमी को मनाई जाती है। यह तिथि भगवान श्रीकृष्ण के जन्म दिवस के रूप में विशेष महत्व रखती है। विभिन्न क्षेत्रों में पंचांग के आधार पर तिथि में थोड़ा अंतर हो सकता है, इसलिए स्थानीय पंचांग की पुष्टि करना उचित रहता है। जन्माष्टमी का पर्व अष्टमी तिथि और रोहिणी नक्षत्र के विशेष संयोग को ध्यान में रखकर मनाया जाता है। अष्टमी तिथि के प्रारंभ और समाप्ति का समय हर वर्ष बदलता है। श्रद्धालु पूजा और व्रत का पालन पंचांग में बताए गए शुभ समय के अनुसार करते हैं, जिससे उन्हें व्रत का पूर्ण धार्मिक फल प्राप्त हो सके।

रोहिणी नक्षत्र का महत्व:-

धार्मिक मान्यता के अनुसार भगवान श्रीकृष्ण का जन्म रोहिणी नक्षत्र में हुआ था। इसलिए जन्माष्टमी पर रोहिणी नक्षत्र का विशेष महत्व माना जाता है। जब अष्टमी तिथि और रोहिणी नक्षत्र का संयोग बनता है, तब इस पर्व का धार्मिक महत्व और भी बढ़ जाता है। मान्यता है कि इस शुभ योग में भगवान श्रीकृष्ण की पूजा-अर्चना करने से भक्तों को विशेष पुण्य और आशीर्वाद प्राप्त होता है।

कृष्ण जन्माष्टमी का धार्मिक महत्व

कृष्ण जन्माष्टमी हिंदू धर्म के सबसे महत्वपूर्ण और श्रद्धापूर्ण त्योहारों में से एक है। यह पर्व भगवान श्रीकृष्ण के जन्मोत्सव के रूप में मनाया जाता है, जिन्हें भगवान विष्णु का आठवां अवतार माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार भगवान श्रीकृष्ण ने पृथ्वी पर बढ़ते अधर्म, अन्याय और अत्याचार का अंत करने के लिए अवतार लिया था। यही कारण है कि जन्माष्टमी केवल एक त्योहार नहीं, बल्कि धर्म, सत्य और न्याय की विजय का प्रतीक भी है।

श्रीकृष्ण-कंस की कथा:-

पौराणिक कथाओं के अनुसार मथुरा के राजा कंस ने अपनी बहन देवकी और उनके पति वसुदेव को कारागार में बंद कर दिया था। भविष्यवाणी हुई थी कि देवकी का आठवां पुत्र कंस का वध करेगा। इस भय से कंस ने देवकी के पहले सात पुत्रों को मार दिया। जब भाद्रपद मास की कृष्ण पक्ष अष्टमी की मध्यरात्रि में भगवान श्रीकृष्ण का जन्म हुआ, तब भगवान की दिव्य शक्ति से कारागार के सभी बंधन खुल गए। वसुदेव नवजात श्रीकृष्ण को सुरक्षित रूप से गोकुल में नंद बाबा और यशोदा के घर छोड़ आए। वहीं से भगवान श्रीकृष्ण की बाल लीलाओं का प्रारंभ हुआ।

श्रीकृष्ण-कंस की कथा:-

कंस एक अत्याचारी और अहंकारी शासक था, जिसके अत्याचारों से प्रजा दुखी थी। धर्म और मानवता की रक्षा के लिए भगवान विष्णु ने श्रीकृष्ण के रूप में अवतार लिया। बड़े होने पर श्रीकृष्ण ने कंस का वध किया और मथुरा की जनता को उसके अत्याचारों से मुक्ति दिलाई। यह घटना बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक मानी जाती है। भगवान श्रीकृष्ण का जीवन हमें धर्म, सत्य, कर्म और भक्ति का मार्ग दिखाता है। उन्होंने महाभारत के युद्ध में अर्जुन को श्रीमद्भगवद्गीता का उपदेश देकर कर्मयोग और धर्मपालन का महत्व समझाया। श्रीकृष्ण का संदेश है कि व्यक्ति को सदैव सत्य और धर्म के मार्ग पर चलना चाहिए तथा अन्याय के विरुद्ध खड़ा होना चाहिए। जन्माष्टमी का पर्व हमें यही प्रेरणा देता है कि जीवन में चाहे कितनी भी कठिनाइयाँ आएँ, धर्म और सत्य की विजय निश्चित होती है।

कृष्ण जन्माष्टमी व्रत का महत्व

कृष्ण जन्माष्टमी का व्रत भगवान श्रीकृष्ण की भक्ति और श्रद्धा का प्रतीक माना जाता है। इस दिन भक्त उपवास रखकर भगवान श्रीकृष्ण का स्मरण करते हैं और मध्यरात्रि में उनके जन्मोत्सव का उत्सव मनाते हैं। धार्मिक मान्यता के अनुसार जन्माष्टमी का व्रत रखने से व्यक्ति के जीवन में सुख, शांति और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है। यह व्रत केवल शारीरिक संयम ही नहीं, बल्कि मन और विचारों की शुद्धि का भी माध्यम माना जाता है।

व्रत रखने के लाभ:-

जन्माष्टमी व्रत रखने से कई आध्यात्मिक और मानसिक लाभ प्राप्त होते हैं। मान्यता है कि इस व्रत से भगवान श्रीकृष्ण की विशेष कृपा प्राप्त होती है और जीवन की कठिनाइयाँ कम होती हैं। उपवास करने से आत्मसंयम बढ़ता है तथा मन एकाग्र होता है। भक्त इस दिन भक्ति, जप और ध्यान के माध्यम से भगवान के प्रति अपनी श्रद्धा व्यक्त करते हैं। धार्मिक ग्रंथों में जन्माष्टमी व्रत को अत्यंत पुण्यदायी बताया गया है। माना जाता है कि इस दिन सच्चे मन से व्रत और पूजा करने से पापों का नाश होता है तथा भगवान श्रीकृष्ण का आशीर्वाद प्राप्त होता है। भक्त दिनभर उपवास रखकर रात्रि में श्रीकृष्ण के जन्म के बाद पूजा-अर्चना करते हैं। यह व्रत भक्ति, प्रेम और भगवान के प्रति समर्पण की भावना को मजबूत करता है।

भक्तों के लिए विशेष महत्व:-

कृष्ण जन्माष्टमी का व्रत भक्तों के लिए विशेष महत्व रखता है क्योंकि यह भगवान श्रीकृष्ण के जन्मोत्सव से जुड़ा हुआ है। श्रद्धालु मानते हैं कि इस दिन किया गया जप, भजन, कीर्तन और पूजा कई गुना अधिक फलदायी होती है। जन्माष्टमी का व्रत व्यक्ति को धर्म, सदाचार और भक्ति के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देता है तथा भगवान श्रीकृष्ण के प्रति आस्था को और गहरा बनाता है।

कृष्ण जन्माष्टमी 2026 की पूजा विधि

  • कृष्ण जन्माष्टमी के दिन भक्त भगवान श्रीकृष्ण की पूजा पूरे विधि-विधान और श्रद्धा के साथ करते हैं। मान्यता है कि इस दिन सच्चे मन से पूजा-अर्चना करने पर भगवान श्रीकृष्ण की कृपा प्राप्त होती है और जीवन में सुख-समृद्धि आती है। जन्माष्टमी की पूजा विशेष रूप से मध्यरात्रि में भगवान श्रीकृष्ण के जन्म समय पर की जाती है।
  • जन्माष्टमी के दिन सुबह जल्दी उठकर स्नान करें और स्वच्छ वस्त्र धारण करें। घर के मंदिर और पूजा स्थल की साफ-सफाई करें। भगवान श्रीकृष्ण की मूर्ति या बाल गोपाल की प्रतिमा को सुंदर वस्त्र और आभूषणों से सजाएं। पूजा के लिए फल, फूल, धूप, दीप, माखन, मिश्री और पंचामृत आदि सामग्री एकत्र कर लें।
  • स्नान के बाद भगवान श्रीकृष्ण का ध्यान करते हुए व्रत का संकल्प लें। भक्त अपनी श्रद्धा और क्षमता के अनुसार निर्जला, फलाहार या सामान्य उपवास रख सकते हैं। दिनभर भगवान श्रीकृष्ण के मंत्रों का जाप, भजन-कीर्तन और धार्मिक ग्रंथों का पाठ करना शुभ माना जाता है।
  • शाम के समय पूजा स्थल को सजाकर बाल गोपाल को झूले में विराजमान करें। भगवान को नए वस्त्र पहनाएं और चंदन, अक्षत, पुष्प तथा तुलसी दल अर्पित करें। इसके बाद माखन-मिश्री, फल और मिठाइयों का भोग लगाएं। श्रीकृष्ण के प्रिय भोग अर्पित करना अत्यंत शुभ माना जाता है।
  • धार्मिक मान्यता के अनुसार भगवान श्रीकृष्ण का जन्म मध्यरात्रि में हुआ था। इसलिए रात 12 बजे विशेष पूजा की जाती है। इस समय शंख और घंटियों की ध्वनि के साथ भगवान श्रीकृष्ण का जन्मोत्सव मनाया जाता है। भक्त "नंद के आनंद भयो, जय कन्हैया लाल की" जैसे भजनों का गायन करते हैं और भगवान का अभिषेक करते हैं।

पूजा के अंत में भगवान श्रीकृष्ण की आरती करें और परिवार के सभी सदस्यों को प्रसाद वितरित करें। माखन-मिश्री, पंचामृत और मिठाइयों का प्रसाद विशेष रूप से बांटा जाता है। आरती और प्रसाद के बाद भक्त अपना व्रत पूर्ण करते हैं और भगवान श्रीकृष्ण से सुख, शांति एवं समृद्धि की प्रार्थना करते हैं।

जन्माष्टमी पर क्या भोग लगाएँ?

कृष्ण जन्माष्टमी के पावन अवसर पर भगवान श्रीकृष्ण को उनकी प्रिय वस्तुओं का भोग अर्पित करने की परंपरा है। धार्मिक मान्यता के अनुसार सच्चे मन और श्रद्धा से लगाया गया भोग भगवान को अत्यंत प्रिय होता है। विशेष रूप से बाल गोपाल को माखन, मिश्री, पंचामृत और विभिन्न प्रकार के फल एवं मिठाइयाँ अर्पित की जाती हैं।

माखन-मिश्री:-

भगवान श्रीकृष्ण को माखन अत्यंत प्रिय था, इसलिए जन्माष्टमी के दिन माखन-मिश्री का भोग विशेष रूप से लगाया जाता है। पौराणिक कथाओं में भी श्रीकृष्ण की माखन चोरी की लीलाओं का वर्णन मिलता है। मान्यता है कि माखन-मिश्री का भोग लगाने से भगवान श्रीकृष्ण प्रसन्न होते हैं और भक्तों पर अपनी कृपा बनाए रखते हैं।

पंचामृत:-

पंचामृत जन्माष्टमी पूजा का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है। इसे दूध, दही, घी, शहद और शक्कर मिलाकर तैयार किया जाता है। भगवान श्रीकृष्ण के अभिषेक में पंचामृत का उपयोग किया जाता है और बाद में इसे प्रसाद के रूप में भक्तों में वितरित किया जाता है। पंचामृत को पवित्रता और शुभता का प्रतीक माना जाता है।

फल और मिठाइयाँ:-

जन्माष्टमी के दिन भगवान श्रीकृष्ण को ताजे फल और विभिन्न प्रकार की मिठाइयाँ भी अर्पित की जाती हैं। भक्त अपनी श्रद्धा के अनुसार केले, सेब, अंगूर, अनार तथा अन्य मौसमी फल चढ़ाते हैं। इसके अलावा पेड़ा, लड्डू, बर्फी और अन्य पारंपरिक मिठाइयों का भोग भी लगाया जाता है।

धनिया पंजीरी:-

धनिया पंजीरी जन्माष्टमी के अवसर पर बनाया जाने वाला एक विशेष प्रसाद है। इसे धनिया पाउडर, चीनी, सूखे मेवे और घी से तैयार किया जाता है। कई स्थानों पर भगवान श्रीकृष्ण को धनिया पंजीरी का भोग लगाना शुभ माना जाता है। यह प्रसाद स्वादिष्ट होने के साथ-साथ पौष्टिक भी होता है और भक्तों में विशेष श्रद्धा के साथ वितरित किया जाता है। जन्माष्टमी के दिन श्रद्धा और भक्ति से अर्पित किया गया भोग भगवान श्रीकृष्ण को प्रसन्न करने का एक महत्वपूर्ण माध्यम माना जाता है। इसलिए भक्त अपनी क्षमता और परंपरा के अनुसार विभिन्न प्रकार के प्रसाद और भोग अर्पित करते हैं।

जन्माष्टमी कैसे मनाई जाती है?

कृष्ण जन्माष्टमी का पर्व पूरे भारत में श्रद्धा, भक्ति और उत्साह के साथ मनाया जाता है। इस दिन मंदिरों और घरों को आकर्षक ढंग से सजाया जाता है। भक्त भगवान श्रीकृष्ण के जन्मोत्सव को विशेष बनाने के लिए भजन-कीर्तन, झांकियों और विभिन्न धार्मिक कार्यक्रमों का आयोजन करते हैं। कई स्थानों पर सांस्कृतिक कार्यक्रम और दही-हांडी उत्सव भी आयोजित किए जाते हैं, जिनमें बड़ी संख्या में लोग भाग लेते हैं।

जन्माष्टमी कैसे मनाई जाती है?

    मंदिर सजावट:-

    जन्माष्टमी के अवसर पर मंदिरों को फूलों, रंग-बिरंगी रोशनी और सुंदर सजावट से सजाया जाता है। भगवान श्रीकृष्ण की प्रतिमा को नए वस्त्र और आभूषण पहनाए जाते हैं। कई मंदिरों में विशेष झूले सजाए जाते हैं, जिनमें बाल गोपाल को विराजमान किया जाता है। श्रद्धालु मंदिरों में दर्शन करने और पूजा-अर्चना करने के लिए बड़ी संख्या में पहुंचते हैं।

    झांकियाँ:-

    जन्माष्टमी पर भगवान श्रीकृष्ण के जीवन से जुड़ी विभिन्न लीलाओं की झांकियाँ सजाई जाती हैं। इनमें श्रीकृष्ण के जन्म, बाल लीलाओं, माखन चोरी, कालिया नाग दमन और गोवर्धन पर्वत उठाने जैसी घटनाओं को सुंदर ढंग से प्रदर्शित किया जाता है। ये झांकियाँ बच्चों और बड़ों दोनों के लिए आकर्षण का केंद्र होती हैं तथा धार्मिक संदेश भी देती हैं।

    भजन-कीर्तन:-

    इस पावन अवसर पर मंदिरों और घरों में भजन-कीर्तन का आयोजन किया जाता है। भक्त भगवान श्रीकृष्ण के भजन गाकर उनकी महिमा का गुणगान करते हैं। "हरे कृष्ण", "राधे-राधे" और अन्य भक्तिमय भजनों से वातावरण भक्तिमय हो जाता है। कई स्थानों पर पूरी रात भजन संध्या और कीर्तन का आयोजन किया जाता है।

    दही-हांडी उत्सव:-

    दही-हांडी उत्सव विशेष रूप से महाराष्ट्र और देश के कई अन्य हिस्सों में बड़े उत्साह के साथ मनाया जाता है। भगवान श्रीकृष्ण की बाल लीलाओं से प्रेरित इस परंपरा में ऊंचाई पर दही से भरी मटकी बांधी जाती है। युवाओं की टोली मानव पिरामिड बनाकर मटकी फोड़ने का प्रयास करती है। यह आयोजन उत्साह, टीम भावना और श्रीकृष्ण की बाल लीलाओं की याद दिलाता है।

    इस प्रकार जन्माष्टमी का पर्व केवल धार्मिक आस्था का ही नहीं, बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक एकता का भी प्रतीक माना जाता है।

      जन्माष्टमी से जुड़ी विशेष मान्यताएँ

      कृष्ण जन्माष्टमी केवल भगवान श्रीकृष्ण के जन्मोत्सव का पर्व नहीं है, बल्कि इससे कई धार्मिक और आध्यात्मिक मान्यताएँ भी जुड़ी हुई हैं। भक्त इन परंपराओं का पालन श्रद्धा और विश्वास के साथ करते हैं। माना जाता है कि इन मान्यताओं के पीछे भगवान श्रीकृष्ण के जीवन और उनकी लीलाओं का विशेष महत्व छिपा हुआ है।

      रात 12 बजे पूजा क्यों?

      धार्मिक मान्यताओं के अनुसार भगवान श्रीकृष्ण का जन्म भाद्रपद मास की कृष्ण पक्ष अष्टमी तिथि को मध्यरात्रि में हुआ था। इसलिए जन्माष्टमी के दिन रात 12 बजे विशेष पूजा-अर्चना की जाती है। इस समय मंदिरों में शंख, घंटी और जयकारों के साथ भगवान श्रीकृष्ण का जन्मोत्सव मनाया जाता है। श्रद्धालु मानते हैं कि मध्यरात्रि में की गई पूजा और प्रार्थना से भगवान श्रीकृष्ण की विशेष कृपा प्राप्त होती है।

      झूला झुलाने की परंपरा:-

      जन्माष्टमी पर बाल गोपाल को सुंदर झूले में विराजमान कर झुलाने की परंपरा प्राचीन समय से चली आ रही है। यह परंपरा भगवान श्रीकृष्ण के बाल स्वरूप के प्रति प्रेम और श्रद्धा को दर्शाती है। भक्त फूलों और रंग-बिरंगी सजावट से झूला सजाते हैं तथा भजन गाते हुए बाल गोपाल को झुलाते हैं। माना जाता है कि ऐसा करने से घर में सुख, शांति और समृद्धि का आगमन होता है।

      बाल गोपाल की पूजा का महत्व:-

      जन्माष्टमी के दिन भगवान श्रीकृष्ण के बाल स्वरूप अर्थात बाल गोपाल की पूजा का विशेष महत्व माना जाता है। भक्त उन्हें नए वस्त्र पहनाते हैं, माखन-मिश्री का भोग लगाते हैं और विधि-विधान से पूजा करते हैं। धार्मिक मान्यता है कि बाल गोपाल की पूजा करने से परिवार में खुशहाली, प्रेम और सकारात्मक ऊर्जा बनी रहती है। साथ ही भक्तों की मनोकामनाएँ पूर्ण होने और जीवन में सुख-समृद्धि आने का आशीर्वाद प्राप्त होता है।

      इन विशेष मान्यताओं के कारण जन्माष्टमी का पर्व भक्तों के लिए आस्था, भक्ति और आनंद का अनूठा संगम बन जाता है।

      निष्कर्ष:-

      कृष्ण जन्माष्टमी केवल भगवान श्रीकृष्ण के जन्म का उत्सव नहीं है, बल्कि यह धर्म, सत्य, प्रेम और भक्ति का भी प्रतीक है। यह पावन पर्व हमें याद दिलाता है कि जीवन में चाहे कितनी भी कठिन परिस्थितियाँ क्यों न आएँ, सत्य और धर्म का मार्ग कभी नहीं छोड़ना चाहिए। भगवान श्रीकृष्ण का अवतार अधर्म के नाश और धर्म की स्थापना के लिए हुआ था, इसलिए जन्माष्टमी का संदेश आज भी उतना ही प्रासंगिक है जितना हजारों वर्ष पहले था।

      भगवान श्रीकृष्ण का जीवन हमें प्रेम, करुणा, निस्वार्थ कर्म और कर्तव्य पालन की प्रेरणा देता है। उन्होंने अपने जीवन के माध्यम से सिखाया कि व्यक्ति को हर परिस्थिति में धैर्य और विवेक बनाए रखना चाहिए। जन्माष्टमी का पर्व हमें अच्छाई को अपनाने, बुराई से दूर रहने और मानवता की सेवा करने का संदेश देता है। यह त्योहार परिवार, समाज और राष्ट्र में प्रेम तथा सद्भाव बढ़ाने का भी प्रतीक माना जाता है। भगवान श्रीकृष्ण द्वारा श्रीमद्भगवद्गीता में दिए गए उपदेश आज भी मानव जीवन के लिए मार्गदर्शक हैं। उन्होंने कर्मयोग, सत्य, आत्मविश्वास और कर्तव्यनिष्ठा का महत्व बताया। श्रीकृष्ण की शिक्षाएँ हमें सिखाती हैं कि फल की चिंता किए बिना अपने कर्तव्यों का पालन करना चाहिए। उनके विचार व्यक्ति को मानसिक शांति, सकारात्मक सोच और सफल जीवन की ओर प्रेरित करते हैं। इसलिए जन्माष्टमी केवल एक धार्मिक पर्व नहीं, बल्कि जीवन को सही दिशा देने वाली प्रेरणा का भी स्रोत है।


      भारतीय संस्कृति और सनातन परंपराओं से जुड़े त्योहार केवल उत्सव नहीं, बल्कि जीवन को सही दिशा देने वाली प्रेरणाएँ हैं। कृष्ण जन्माष्टमी हमें प्रेम, कर्तव्य, सत्य और धर्म का मार्ग दिखाती है। यदि आपको यह लेख उपयोगी लगा हो, तो इसे अपने मित्रों और परिवारजनों के साथ साझा अवश्य करें।

      FAQ Section 

      Q1. कृष्ण जन्माष्टमी 2026 कब है?

      उत्तर: कृष्ण जन्माष्टमी वर्ष 2026 में भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को मनाई जाएगी। इस दिन भक्त भगवान श्रीकृष्ण के जन्मोत्सव के उपलक्ष्य में व्रत रखते हैं, पूजा-अर्चना करते हैं और मध्यरात्रि में विशेष जन्मोत्सव मनाते हैं। जन्माष्टमी की सटीक तिथि और शुभ मुहूर्त के लिए स्थानीय पंचांग अवश्य देखें।

      Q2. जन्माष्टमी का व्रत कैसे रखा जाता है?

      उत्तर: जन्माष्टमी के दिन भक्त प्रातःकाल स्नान करके भगवान श्रीकृष्ण का स्मरण करते हुए व्रत का संकल्प लेते हैं। श्रद्धालु अपनी क्षमता के अनुसार निर्जला, फलाहार या उपवास रखते हैं। दिनभर भजन-कीर्तन, मंत्र जाप और श्रीकृष्ण की पूजा की जाती है। रात्रि 12 बजे भगवान श्रीकृष्ण के जन्मोत्सव के बाद विशेष पूजा, आरती और प्रसाद वितरण किया जाता है। इसके पश्चात भक्त अपना व्रत पूर्ण करते हैं।

      Q3. जन्माष्टमी पर कौन सा भोग लगाया जाता है?

      उत्तर: जन्माष्टमी के दिन भगवान श्रीकृष्ण को माखन-मिश्री, पंचामृत, धनिया पंजीरी, फल और विभिन्न प्रकार की मिठाइयों का भोग लगाया जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार माखन भगवान श्रीकृष्ण को अत्यंत प्रिय था, इसलिए माखन-मिश्री का भोग विशेष महत्व रखता है। इसके अलावा पेड़ा, लड्डू, बर्फी और मौसमी फलों का प्रसाद भी श्रद्धापूर्वक अर्पित किया जाता है।

      Q4. रात 12 बजे पूजा क्यों की जाती है?

      उत्तर: धार्मिक मान्यताओं के अनुसार भगवान श्रीकृष्ण का जन्म भाद्रपद मास की कृष्ण पक्ष अष्टमी तिथि की मध्यरात्रि में हुआ था। इसी कारण जन्माष्टमी के दिन रात 12 बजे विशेष पूजा-अर्चना की जाती है। इस समय भक्त भगवान श्रीकृष्ण का अभिषेक करते हैं, आरती उतारते हैं और उनके जन्मोत्सव का उत्सव मनाते हैं। माना जाता है कि मध्यरात्रि में श्रद्धापूर्वक की गई पूजा से भगवान श्रीकृष्ण की विशेष कृपा और आशीर्वाद प्राप्त होता है।

      Q.5 कृष्ण जन्माष्टमी 2026 कब मनाई जाएगी?

      कृष्ण जन्माष्टमी 2026 शुक्रवार, 4 सितंबर, 2026 को मनाई जाएगी। शुभ निशिता पूजा मुहूर्त रात 11:57 बजे से 12:43 बजे तक है। अष्टमी तिथि 4 सितंबर को सुबह 10:48 बजे शुरू होगी और 5 सितंबर, 2026 को सुबह 11:23 बजे समाप्त होगी।

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