हिंदू धर्म में एकादशी तिथि भगवान विष्णु की आराधना के लिए समर्पित मानी जाती है। वर्ष भर में आने वाली 24 एकादशियों में निर्जला एकादशी का विशेष महत्व है। यह ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को मनाई जाती है। इस दिन भक्त बिना अन्न और जल ग्रहण किए भगवान विष्णु की पूजा-अर्चना करते हैं तथा व्रत का पालन करते हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस व्रत को श्रद्धा और नियमपूर्वक करने से व्यक्ति को समस्त पापों से मुक्ति मिलती है और भगवान विष्णु की विशेष कृपा प्राप्त होती है।
निर्जला एकादशी को सभी एकादशियों में सबसे श्रेष्ठ और पुण्यदायी माना गया है। पौराणिक मान्यता के अनुसार जो व्यक्ति वर्षभर की सभी एकादशियों का व्रत नहीं रख पाता, वह केवल निर्जला एकादशी का व्रत करके सभी एकादशियों के बराबर पुण्य प्राप्त कर सकता है। इस व्रत की विशेषता यह है कि इसमें जल तक ग्रहण नहीं किया जाता, इसलिए इसे सबसे कठिन एकादशी भी माना जाता है। मान्यता है कि इस दिन विधि-विधान से व्रत, पूजा और दान करने से सुख, समृद्धि, स्वास्थ्य तथा मोक्ष की प्राप्ति होती है। यही कारण है कि निर्जला एकादशी को "भीमसेनी एकादशी" और "महाएकादशी" के नाम से भी जाना जाता है।
निर्जला एकादशी 2026 कब है?
निर्जला एकादशी हिंदू धर्म की सबसे महत्वपूर्ण एकादशियों में से एक मानी जाती है। वर्ष 2026 में यह व्रत 25 जून, गुरुवार को रखा जाएगा। इस दिन भगवान विष्णु की विशेष पूजा-अर्चना की जाती है और श्रद्धालु निर्जल रहकर व्रत का पालन करते हैं।
24 या 25 जून का भ्रम क्यों है?
निर्जला एकादशी की तिथि को लेकर कई लोगों के मन में भ्रम रहता है क्योंकि हिंदू पंचांग में व्रत और त्योहारों की गणना सूर्योदय के समय विद्यमान तिथि के आधार पर की जाती है। कई कैलेंडरों और पंचांगों में एकादशी तिथि का प्रारंभ 24 जून को दिखाई देता है, जबकि उदया तिथि के अनुसार व्रत 25 जून को रखा जाता है। यही कारण है कि कुछ लोग 24 जून और कुछ 25 जून की तिथि बताते हैं। हालांकि धर्मशास्त्रों के अनुसार एकादशी व्रत उस दिन रखा जाता है जिस दिन सूर्योदय के समय एकादशी तिथि विद्यमान हो।
सही तिथि क्या है?
पंचांग के अनुसार निर्जला एकादशी व्रत 25 जून 2026 (गुरुवार) को रखा जाएगा। इसी दिन भगवान विष्णु की पूजा, व्रत और दान-पुण्य का विशेष महत्व रहेगा। व्रत का पारण अगले दिन द्वादशी तिथि में निर्धारित समय पर किया जाएगा। धार्मिक मान्यता है कि श्रद्धापूर्वक निर्जला एकादशी का व्रत रखने से वर्षभर की सभी एकादशियों के समान पुण्य फल प्राप्त होता है और भगवान विष्णु की विशेष कृपा प्राप्त होती है।
निर्जला एकादशी 2026 शुभ मुहूर्त
वर्ष 2026 में निर्जला एकादशी का व्रत 25 जून, गुरुवार को रखा जाएगा। भगवान विष्णु की कृपा प्राप्त करने के लिए इस दिन शुभ समय में पूजा और व्रत का पालन करना विशेष फलदायी माना जाता है।
एकादशी तिथि प्रारंभ:-
24 जून 2026 (बुधवार) रात्रि 09:52 बजे से
एकादशी तिथि समाप्त:-
25 जून 2026 (गुरुवार) रात्रि 11:09 बजे तक
व्रत पारण का समय (व्रत खोलना):-
26 जून 2026 (शुक्रवार) प्रातः 05:25 बजे से 08:13 बजे तक
पूजा का शुभ समय:-
निर्जला एकादशी के दिन प्रातः स्नान के बाद भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की पूजा करना अत्यंत शुभ माना जाता है। इस दिन तुलसी दल, पीले फूल, धूप, दीप और नैवेद्य अर्पित कर विष्णु सहस्रनाम का पाठ करने से विशेष पुण्य प्राप्त होता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार निर्जला एकादशी का व्रत रखने से वर्षभर की सभी 24 एकादशियों का पुण्य फल प्राप्त होता है। इसलिए इसे सभी एकादशियों में सबसे श्रेष्ठ माना गया है।
निर्जला एकादशी का महत्व:-
सभी एकादशियों का फल कैसे मिलता है?
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार वर्षभर में आने वाली सभी एकादशियों का व्रत करना हर व्यक्ति के लिए संभव नहीं होता। महाभारत काल में भीमसेन भी अपनी भोजन-प्रियता के कारण सभी एकादशियों का व्रत नहीं रख पाते थे। तब महर्षि व्यास ने उन्हें केवल निर्जला एकादशी का व्रत रखने का उपदेश दिया। कहा जाता है कि श्रद्धा और नियमपूर्वक निर्जला एकादशी का व्रत करने से वर्षभर की सभी एकादशियों के समान पुण्य फल प्राप्त होता है। इसी कारण इसे "एकादशियों की महारानी" भी कहा जाता है। धार्मिक ग्रंथों में वर्णन मिलता है कि यह व्रत पापों का नाश करने वाला और पुण्य प्रदान करने वाला माना गया है।
भगवान विष्णु की कृपा का महत्व:-
निर्जला एकादशी का व्रत भगवान विष्णु की विशेष कृपा प्राप्त करने का श्रेष्ठ अवसर माना जाता है। मान्यता है कि इस दिन भगवान विष्णु की पूजा, मंत्र जाप, विष्णु सहस्रनाम का पाठ और दान-पुण्य करने से जीवन में सुख, शांति और समृद्धि आती है। धार्मिक विश्वास है कि भगवान विष्णु की कृपा से व्यक्ति के कष्ट दूर होते हैं, मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं तथा परिवार में सुख-समृद्धि बनी रहती है। इसके साथ ही यह व्रत आत्मिक शुद्धि और मोक्ष प्राप्ति का मार्ग भी प्रशस्त करता है। इसलिए भक्त पूरे वर्ष इस पावन एकादशी की प्रतीक्षा करते हैं और श्रद्धा भाव से इसका पालन करते हैं।
निर्जला एकादशी व्रत की पूजा विधि
- निर्जला एकादशी के दिन भगवान विष्णु की विधि-विधान से पूजा करने का विशेष महत्व माना जाता है। इस दिन श्रद्धा और नियमपूर्वक पूजा करने से भगवान विष्णु की कृपा प्राप्त होती है तथा सुख-समृद्धि का आशीर्वाद मिलता है।
- निर्जला एकादशी के दिन ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान करें और स्वच्छ वस्त्र धारण करें। संभव हो तो पीले रंग के वस्त्र पहनें, क्योंकि पीला रंग भगवान विष्णु को प्रिय माना जाता है। इसके बाद घर के मंदिर या पूजा स्थल की सफाई करें और व्रत का संकल्प लें।
- संकल्प लेते समय भगवान विष्णु से प्रार्थना करें कि वे आपको व्रत को सफलतापूर्वक पूर्ण करने की शक्ति प्रदान करें। इस दिन मन, वचन और कर्म से पवित्र रहने का प्रयास करें।
निर्जला एकादशी की पूजा के लिए निम्नलिखित सामग्री तैयार रखें:-
- भगवान विष्णु की प्रतिमा या चित्र
- माता लक्ष्मी का चित्र
- तुलसी दल
- पीले फूल
- धूप और दीपक
- चंदन
- अक्षत (चावल)
- पंचामृत
- फल
- नारियल
- कलश
- गंगाजल
- पीला वस्त्र
- नैवेद्य (भोग)
भगवान विष्णु की पूजा कैसे करें?
- सबसे पहले पूजा स्थान पर भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की प्रतिमा या चित्र स्थापित करें। इसके बाद दीपक जलाकर पूजा प्रारंभ करें। भगवान विष्णु को गंगाजल, चंदन, अक्षत, पीले फूल और तुलसी दल अर्पित करें।
- इसके बाद धूप-दीप दिखाकर भगवान विष्णु के मंत्रों का जाप करें। विशेष रूप से "ॐ नमो भगवते वासुदेवाय" मंत्र का जाप करना शुभ माना जाता है। यदि संभव हो तो विष्णु सहस्रनाम का पाठ भी करें।
- पूजा के अंत में भगवान विष्णु की आरती करें और परिवार की सुख-समृद्धि, स्वास्थ्य तथा कल्याण की प्रार्थना करें। दिनभर भगवान का स्मरण करते हुए व्रत का पालन करें और अगले दिन द्वादशी तिथि में विधिपूर्वक पारण करें।
- धार्मिक मान्यता के अनुसार निर्जला एकादशी के दिन भगवान विष्णु की श्रद्धापूर्वक पूजा करने से सभी प्रकार के पापों का नाश होता है और जीवन में सुख, शांति तथा समृद्धि का आगमन होता है।
निर्जला एकादशी व्रत के नियम
निर्जला एकादशी का व्रत सभी एकादशियों में सबसे कठिन और पुण्यदायी माना जाता है। इस व्रत को विधि-विधान और नियमों के अनुसार करने से भगवान विष्णु की विशेष कृपा प्राप्त होती है। इसलिए व्रत रखने से पहले इसके नियमों की जानकारी होना आवश्यक है।
क्या खाएं और क्या नहीं?
निर्जला एकादशी के दिन व्रती पूर्ण उपवास रखते हैं। परंपरागत रूप से इस व्रत में अन्न, फल और जल तक का सेवन नहीं किया जाता। हालांकि जो लोग स्वास्थ्य कारणों से पूर्ण निर्जल व्रत नहीं रख सकते, वे अपनी क्षमता और स्वास्थ्य के अनुसार फलाहार या चिकित्सकीय सलाह का पालन कर सकते हैं।
क्या नहीं खाएं?
- चावल और गेहूं से बने खाद्य पदार्थ
- दालें और अनाज
- मांसाहार
- प्याज और लहसुन
- तामसिक भोजन
- नशीले पदार्थ
क्या कर सकते हैं?
- भगवान विष्णु का ध्यान और भजन
- मंत्र जाप
- धार्मिक ग्रंथों का पाठ
- दान-पुण्य और सेवा कार्य
पानी न पीने का नियम:-
"निर्जला" का अर्थ है "बिना जल के"। इस व्रत की सबसे बड़ी विशेषता यही है कि व्रती पूरे दिन और रात्रि तक जल ग्रहण नहीं करता। धार्मिक मान्यता है कि श्रद्धा और नियमपूर्वक निर्जल रहकर व्रत करने से वर्षभर की सभी एकादशियों का पुण्य फल प्राप्त होता है।
हालांकि धर्मशास्त्रों में स्वास्थ्य की रक्षा को भी महत्वपूर्ण माना गया है। यदि किसी व्यक्ति को स्वास्थ्य संबंधी परेशानी हो, तो वह अपनी क्षमता के अनुसार व्रत कर सकता है। भगवान भक्ति में भाव को अधिक महत्व दिया जाता है।
किन लोगों को सावधानी रखनी चाहिए?
- गर्भवती महिलाएं
- स्तनपान कराने वाली माताएं
- बुजुर्ग व्यक्ति
- मधुमेह (डायबिटीज) के रोगी
- उच्च या निम्न रक्तचाप वाले लोग
- गंभीर बीमारी से पीड़ित व्यक्ति
- नियमित दवाएं लेने वाले लोग
इन लोगों को व्रत रखने से पहले चिकित्सक की सलाह अवश्य लेनी चाहिए। यदि स्वास्थ्य अनुमति न दे तो फलाहार या जल के साथ व्रत करने का विकल्प अपनाया जा सकता है।
धार्मिक मान्यता के अनुसार निर्जला एकादशी का व्रत केवल शरीर को कष्ट देने के लिए नहीं, बल्कि आत्मसंयम, भक्ति और भगवान विष्णु के प्रति श्रद्धा प्रकट करने का माध्यम है। इसलिए व्रत हमेशा अपनी शारीरिक क्षमता और स्वास्थ्य को ध्यान में रखकर ही करना चाहिए।
निर्जला एकादशी व्रत कथा
- निर्जला एकादशी की कथा का संबंध महाभारत काल के महान योद्धा भीमसेन और महर्षि वेदव्यास से है। यही कारण है कि इस एकादशी को "भीमसेनी एकादशी" या "पांडव एकादशी" भी कहा जाता है। धार्मिक मान्यता है कि इस व्रत की महिमा सुनने और पढ़ने मात्र से भी पुण्य की प्राप्ति होती है।
- पौराणिक कथा के अनुसार पांचों पांडवों में भीमसेन सबसे अधिक बलशाली थे। उन्हें भोजन अत्यंत प्रिय था और उनकी भूख भी बहुत अधिक थी। माता कुंती, द्रौपदी और अन्य पांडव वर्षभर आने वाली सभी एकादशियों का व्रत रखते थे, लेकिन भीमसेन के लिए उपवास करना अत्यंत कठिन था।
- एक दिन भीमसेन ने महर्षि वेदव्यास से कहा, "गुरुदेव! मैं भगवान विष्णु का भक्त हूं, लेकिन अधिक भूख लगने के कारण सभी एकादशियों का व्रत नहीं रख पाता। कृपया ऐसा कोई उपाय बताइए जिससे मुझे सभी एकादशियों का पुण्य प्राप्त हो सके।"
- तब महर्षि व्यास ने भीमसेन से कहा कि यदि वे ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को बिना अन्न और जल ग्रहण किए व्रत रखें, तो उन्हें वर्षभर की सभी एकादशियों के समान पुण्य फल प्राप्त होगा।
- महर्षि के निर्देशानुसार भीमसेन ने अत्यंत कठिन निर्जला एकादशी का व्रत किया। भगवान विष्णु की कृपा से उन्होंने व्रत सफलतापूर्वक पूर्ण किया और उन्हें सभी एकादशियों का पुण्य प्राप्त हुआ।
- क्योंकि इस विशेष एकादशी व्रत का पालन सबसे पहले भीमसेन ने महर्षि व्यास के उपदेश पर किया था, इसलिए इसे "भीमसेनी एकादशी" कहा जाने लगा। यह नाम आज भी पूरे भारत में प्रसिद्ध है।
- धार्मिक मान्यता के अनुसार जो श्रद्धालु नियमपूर्वक निर्जला एकादशी का व्रत रखते हैं, उन्हें सभी 24 एकादशियों के व्रत के समान पुण्य फल प्राप्त होता है। यही कारण है कि यह एकादशी हिंदू धर्म में अत्यंत महत्वपूर्ण और पुण्यदायी मानी जाती है।
इस कथा से हमें यह शिक्षा मिलती है कि सच्ची श्रद्धा, विश्वास और भक्ति के साथ किया गया एक व्रत भी भगवान की विशेष कृपा दिला सकता है।
निर्जला एकादशी पर क्या दान करें?
निर्जला एकादशी के दिन व्रत, पूजा और दान-पुण्य का विशेष महत्व माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस दिन जरूरतमंद लोगों को दान देने से भगवान विष्णु प्रसन्न होते हैं और जीवन में सुख, समृद्धि तथा पुण्य की प्राप्ति होती है। विशेष रूप से गर्मी के मौसम को ध्यान में रखते हुए जल और शीतलता प्रदान करने वाली वस्तुओं का दान शुभ माना गया है।
जल से भरा घड़ा:-
निर्जला एकादशी पर जल से भरे हुए घड़े का दान अत्यंत पुण्यदायी माना जाता है। मान्यता है कि प्यासे व्यक्ति को जल उपलब्ध कराने से भगवान विष्णु की विशेष कृपा प्राप्त होती है। इस दिन मिट्टी के घड़े में जल भरकर दान करने की परंपरा प्राचीन काल से चली आ रही है।
पंखा:-
गर्मी के मौसम में पंखे का दान भी शुभ माना जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार जरूरतमंद व्यक्ति को पंखा दान करने से जीवन में सुख और शांति का आशीर्वाद प्राप्त होता है। पहले के समय में हाथ से चलने वाले पंखों का दान किया जाता था, जबकि आज के समय में अपनी क्षमता के अनुसार पंखा दान किया जा सकता है।
छाता:-
निर्जला एकादशी पर छाते का दान भी विशेष महत्व रखता है। छाता धूप और वर्षा से रक्षा का प्रतीक माना जाता है। मान्यता है कि इस दिन छाता दान करने से व्यक्ति को भगवान विष्णु की कृपा प्राप्त होती है और जीवन की कठिनाइयों से रक्षा होती है।
वस्त्र:-
गरीब और जरूरतमंद लोगों को वस्त्र दान करना अत्यंत पुण्यकारी माना गया है। विशेष रूप से सफेद या हल्के रंग के वस्त्र दान करना शुभ माना जाता है। वस्त्र दान से दानदाता को पुण्य फल प्राप्त होता है और समाज में सेवा भाव बढ़ता है।
फल और अन्न:-
निर्जला एकादशी के दिन फल, अन्न और अन्य खाद्य सामग्री का दान भी महत्वपूर्ण माना जाता है। हालांकि व्रती स्वयं अन्न का सेवन नहीं करते, लेकिन जरूरतमंदों को भोजन और फल प्रदान करना महान दान माना गया है। इससे भूखे लोगों की सहायता होती है और दान का पुण्य प्राप्त होता है।
दान हमेशा श्रद्धा, विनम्रता और निस्वार्थ भाव से करना चाहिए। धार्मिक ग्रंथों के अनुसार दिखावे के लिए किया गया दान अपेक्षित फल नहीं देता, जबकि सच्चे मन से किया गया छोटा-सा दान भी अत्यंत पुण्यदायी माना जाता है। इसलिए निर्जला एकादशी पर अपनी सामर्थ्य के अनुसार दान करें और भगवान विष्णु से सुख, शांति एवं कल्याण की प्रार्थना करें।
निर्जला एकादशी पर क्या करें और क्या नहीं?
निर्जला एकादशी भगवान विष्णु की आराधना और आत्मसंयम का पर्व है। इस दिन किए गए शुभ कार्यों से विशेष पुण्य प्राप्त होता है, जबकि कुछ कार्यों से बचने की सलाह दी जाती है। इसलिए व्रत के दौरान धार्मिक नियमों का पालन करना महत्वपूर्ण माना जाता है।
क्या करें?
- निर्जला एकादशी के दिन भगवान विष्णु के पवित्र नामों का स्मरण और विष्णु सहस्रनाम का पाठ करना अत्यंत शुभ माना जाता है। धार्मिक मान्यता है कि इससे भगवान विष्णु प्रसन्न होते हैं और भक्त की मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं।
- इस दिन जल से भरा घड़ा, छाता, पंखा, वस्त्र, फल और अन्य आवश्यक वस्तुओं का दान करना विशेष फलदायी माना गया है। दान-पुण्य से जरूरतमंद लोगों की सहायता होती है और पुण्य की प्राप्ति होती है।
- निर्जला एकादशी के दिन भगवान विष्णु के भजन गाना, कीर्तन करना और धार्मिक ग्रंथों का पाठ करना शुभ माना जाता है। इससे मन में सकारात्मकता और आध्यात्मिक शांति का अनुभव होता है।
- भगवान विष्णु को तुलसी अत्यंत प्रिय है। इसलिए इस दिन तुलसी पूजा और तुलसी के पौधे की सेवा करना भी शुभ माना जाता है।
- पूरे दिन मन, वचन और कर्म से पवित्र रहने का प्रयास करें। दूसरों के प्रति प्रेम, करुणा और सम्मान का भाव रखें।
क्या नहीं करें?
- निर्जला एकादशी के दिन क्रोध, विवाद और कटु वचन बोलने से बचना चाहिए। धार्मिक मान्यता है कि क्रोध व्यक्ति के पुण्य को कम कर सकता है।
- इस पवित्र दिन सत्य का पालन करना चाहिए। झूठ, छल और धोखाधड़ी जैसे कार्यों से दूर रहना चाहिए।
- व्रत के दौरान मांसाहार, शराब, प्याज, लहसुन और अन्य तामसिक पदार्थों से दूर रहना चाहिए। ये वस्तुएं धार्मिक दृष्टि से वर्जित मानी जाती हैं।
- किसी भी व्यक्ति का अपमान करना, बुराई करना या कटु व्यवहार करना उचित नहीं माना जाता। इस दिन सद्भाव और विनम्रता बनाए रखें।
- ईर्ष्या, द्वेष और नकारात्मक सोच से दूर रहकर भगवान विष्णु के ध्यान में मन लगाएं।
निर्जला एकादशी केवल उपवास का पर्व नहीं, बल्कि आत्मसंयम, भक्ति और सदाचार का संदेश देने वाला पावन दिन है। इस दिन शुभ कार्यों, दान-पुण्य और भगवान विष्णु की भक्ति में समय बिताने से आध्यात्मिक उन्नति और पुण्य की प्राप्ति होती है। वहीं क्रोध, झूठ और तामसिक प्रवृत्तियों से दूर रहकर व्रत का पूर्ण लाभ प्राप्त किया जा सकता है।
निर्जला एकादशी के दिन मंत्र जाप
निर्जला एकादशी के दिन भगवान विष्णु की पूजा के साथ मंत्र जाप का विशेष महत्व माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार मंत्रों का श्रद्धापूर्वक जाप करने से मन को शांति मिलती है और भगवान विष्णु की कृपा प्राप्त होती है। इस दिन विशेष रूप से "ॐ नमो भगवते वासुदेवाय" तथा विष्णु गायत्री मंत्र का जाप करना शुभ माना जाता है।
1. ॐ नमो भगवते वासुदेवाय:-
यह भगवान विष्णु का अत्यंत पवित्र और शक्तिशाली मंत्र माना जाता है। निर्जला एकादशी के दिन इस मंत्र का जाप करने से मानसिक शांति, सकारात्मक ऊर्जा और भगवान विष्णु की कृपा प्राप्त होती है।
मंत्र का अर्थ:- मैं भगवान वासुदेव (भगवान विष्णु) को नमन करता हूँ और उनकी शरण ग्रहण करता हूँ।
जाप विधि:-
- प्रातः स्नान के बाद भगवान विष्णु के सामने बैठें।
- तुलसी की माला से 108 बार मंत्र का जाप करें।
- मन को एकाग्र रखकर भगवान का ध्यान करें।
2. विष्णु गायत्री मंत्र:-
विष्णु गायत्री मंत्र भगवान विष्णु की कृपा प्राप्त करने के लिए अत्यंत प्रभावशाली माना जाता है। इस मंत्र के जाप से आध्यात्मिक उन्नति और मन की शुद्धि होती है।
मंत्र का अर्थ:-
हम भगवान नारायण को जानते हैं, वासुदेव का ध्यान करते हैं और भगवान विष्णु हमारी बुद्धि को सद्मार्ग की ओर प्रेरित करें।
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मंत्र जाप का महत्व:-
- भगवान विष्णु की कृपा प्राप्त होती है।
- मन और बुद्धि में सकारात्मकता आती है।
- आध्यात्मिक उन्नति का मार्ग प्रशस्त होता है।
- जीवन में सुख, शांति और समृद्धि बनी रहती है।
- मंत्र जाप करते समय ध्यान रखें
- स्वच्छ स्थान पर बैठकर मंत्र जाप करें।
- भगवान विष्णु का ध्यान करते हुए श्रद्धा और भक्ति के साथ मंत्र बोलें।
- संभव हो तो तुलसी की माला का उपयोग करें।
- मंत्र जाप के बाद भगवान विष्णु की आरती अवश्य करें।
धार्मिक मान्यता के अनुसार निर्जला एकादशी के दिन इन मंत्रों का जाप करने से व्रत का पुण्य फल बढ़ता है और भगवान विष्णु की विशेष कृपा प्राप्त होती है।
निर्जला एकादशी के लाभ
- निर्जला एकादशी हिंदू धर्म की सबसे पुण्यदायी एकादशियों में से एक मानी जाती है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस दिन श्रद्धा और नियमपूर्वक व्रत रखने, भगवान विष्णु की पूजा करने तथा दान-पुण्य करने से अनेक आध्यात्मिक और धार्मिक लाभ प्राप्त होते हैं। यही कारण है कि लाखों श्रद्धालु हर वर्ष इस पावन व्रत का पालन करते हैं।
- धार्मिक ग्रंथों में वर्णित है कि निर्जला एकादशी का व्रत करने से व्यक्ति के जाने-अनजाने में हुए पापों का नाश होता है। भगवान विष्णु की कृपा से मन और आत्मा की शुद्धि होती है तथा व्यक्ति धर्म और सदाचार के मार्ग पर आगे बढ़ता है।
- मान्यता है कि जो भक्त श्रद्धा और भक्ति के साथ निर्जला एकादशी का व्रत रखते हैं, उन्हें वर्षभर की सभी एकादशियों के समान पुण्य फल प्राप्त होता है और उनके पापों का क्षय होता है।
- निर्जला एकादशी का व्रत भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की कृपा प्राप्त करने का श्रेष्ठ अवसर माना जाता है। धार्मिक विश्वास है कि इस दिन पूजा-अर्चना और दान-पुण्य करने से घर में सुख, शांति और समृद्धि का वास होता है।
- भक्तों का मानना है कि भगवान विष्णु की कृपा से जीवन की बाधाएं दूर होती हैं, आर्थिक स्थिति में सुधार आता है और परिवार में खुशहाली बनी रहती है। इसलिए इस दिन विशेष रूप से दान और सेवा कार्यों का महत्व बताया गया है।
- हिंदू धर्म में मोक्ष को जीवन का सर्वोच्च लक्ष्य माना गया है। धार्मिक मान्यता के अनुसार निर्जला एकादशी का व्रत आत्मा की शुद्धि और आध्यात्मिक उन्नति में सहायक माना जाता है।
- कहा जाता है कि जो व्यक्ति श्रद्धापूर्वक भगवान विष्णु का स्मरण करते हुए इस व्रत का पालन करता है, उसे भगवान की विशेष कृपा प्राप्त होती है और मोक्ष प्राप्ति का मार्ग प्रशस्त होता है। यही कारण है कि इस एकादशी को केवल धार्मिक अनुष्ठान ही नहीं, बल्कि आत्मिक कल्याण का पर्व भी माना जाता है।
- निर्जला एकादशी का व्रत केवल उपवास तक सीमित नहीं है, बल्कि यह आत्मसंयम, भक्ति, दान और आध्यात्मिक साधना का प्रतीक है। पापों से मुक्ति, सुख-समृद्धि की प्राप्ति और मोक्ष की कामना के लिए यह व्रत अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। श्रद्धा और नियमपूर्वक किया गया यह व्रत भगवान विष्णु की कृपा प्राप्त करने का श्रेष्ठ माध्यम माना गया है।
निर्जला एकादशी 2026 से संबंधित FAQs:-
1. निर्जला एकादशी 2026 कब है?
- वर्ष 2026 में निर्जला एकादशी 25 जून 2026, गुरुवार को मनाई जाएगी। यह ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को पड़ती है और भगवान विष्णु को समर्पित सबसे महत्वपूर्ण एकादशियों में से एक मानी जाती है।
- धार्मिक मान्यताओं के अनुसार निर्जला एकादशी का व्रत रखने से वर्षभर की सभी 24 एकादशियों के समान पुण्य फल प्राप्त होता है। इस दिन श्रद्धालु भगवान विष्णु की पूजा करते हैं, दान-पुण्य करते हैं और अपनी क्षमता के अनुसार निर्जल या उपवास का पालन करते हैं।
- तिथि प्रारंभ: 24 जून 2026, रात्रि 09:52 बजे
- तिथि समाप्त: 25 जून 2026, रात्रि 11:09 बजे
- व्रत तिथि: 25 जून 2026 (गुरुवार)
- पारण: 26 जून 2026 (शुक्रवार) को द्वादशी तिथि में
इसी कारण 24 और 25 जून को लेकर भ्रम होता है, लेकिन उदया तिथि के अनुसार निर्जला एकादशी का व्रत 25 जून 2026 को रखा जाएगा।
2. निर्जला एकादशी का पारण कब करें?
- वर्ष 2026 में निर्जला एकादशी का व्रत 25 जून (गुरुवार) को रखा जाएगा। व्रत का पारण 26 जून 2026 (शुक्रवार) को द्वादशी तिथि में किया जाएगा।
- पारण का अर्थ है व्रत को विधिपूर्वक समाप्त करना। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार एकादशी व्रत का पारण द्वादशी तिथि में ही करना चाहिए।
- पारण समय: 26 जून 2026 को प्रातःकाल द्वादशी तिथि में (स्थानीय पंचांग के अनुसार समय थोड़ा भिन्न हो सकता है)।
- पारण से पहले भगवान विष्णु की पूजा करें, तुलसी युक्त जल अर्पित करें और फिर जल ग्रहण करके व्रत खोलें। इसके बाद सात्विक भोजन करना शुभ माना जाता है।
धार्मिक मान्यता है कि विधि-विधान से पारण करने पर ही एकादशी व्रत का पूर्ण फल प्राप्त होता है
3. क्या निर्जला एकादशी में पानी पी सकते हैं?
पारंपरिक रूप से निर्जला एकादशी का व्रत बिना अन्न और बिना जल ग्रहण किए रखा जाता है। "निर्जला" शब्द का अर्थ ही "जल के बिना" होता है। इसलिए इस व्रत में पानी पीने की अनुमति नहीं मानी जाती। हालांकि, धर्मशास्त्रों में स्वास्थ्य की रक्षा को भी महत्वपूर्ण बताया गया है। यदि कोई व्यक्ति बीमार है, बुजुर्ग है, गर्भवती है, स्तनपान कराने वाली माता है या किसी अन्य स्वास्थ्य समस्या से ग्रस्त है, तो वह अपनी क्षमता के अनुसार जल या फलाहार के साथ व्रत कर सकता है।
धार्मिक मान्यता के अनुसार भगवान विष्णु भक्ति और श्रद्धा को अधिक महत्व देते हैं। इसलिए यदि स्वास्थ्य कारणों से पूर्ण निर्जल व्रत संभव न हो, तो अपनी स्थिति के अनुसार व्रत का पालन करना उचित माना जाता है। विशेष बात: यदि आप पूर्ण निर्जल व्रत रख सकते हैं, तो यह सबसे श्रेष्ठ माना जाता है। लेकिन स्वास्थ्य को नुकसान पहुँचाकर व्रत रखना उचित नहीं माना जाता।
4. निर्जला एकादशी पर क्या दान करना चाहिए?
निर्जला एकादशी के दिन दान-पुण्य का विशेष महत्व माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस दिन किए गए दान से भगवान विष्णु प्रसन्न होते हैं और पुण्य फल की प्राप्ति होती है। विशेष रूप से गर्मी के मौसम को देखते हुए जल और शीतलता प्रदान करने वाली वस्तुओं का दान शुभ माना जाता है।
निर्जला एकादशी पर दान की जाने वाली प्रमुख वस्तुएँ:-
- 🏺 जल से भरा घड़ा (मटका)
- ☂️ छाता
- 🪭 पंखा
- 👕 वस्त्र
- 🍎 फल
- 🌾 अन्न
- 🥥 नारियल
- 💰 दक्षिणा
- 📖 धार्मिक ग्रंथ
- 🥤 शरबत या ठंडे पेय पदार्थों का वितरण
धार्मिक मान्यता है कि इस दिन प्यासे और जरूरतमंद लोगों को जल उपलब्ध कराना अत्यंत पुण्यदायी कार्य माना जाता है। इसलिए कई श्रद्धालु प्याऊ लगवाते हैं या जल से भरे घड़ों का दान करते हैं। दान हमेशा अपनी सामर्थ्य के अनुसार और निस्वार्थ भाव से करना चाहिए। श्रद्धा से किया गया छोटा-सा दान भी अत्यंत फलदायी माना जाता है।
5. निर्जला एकादशी को भीमसेनी एकादशी क्यों कहते हैं?
- निर्जला एकादशी को भीमसेनी एकादशी इसलिए कहा जाता है क्योंकि इसका संबंध महाभारत के महान योद्धा भीमसेन से माना जाता है।
- पौराणिक कथा के अनुसार पांडवों में भीमसेन अत्यंत बलशाली थे, लेकिन उन्हें बहुत अधिक भूख लगती थी। इसी कारण वे वर्षभर आने वाली सभी एकादशियों का व्रत नहीं रख पाते थे। तब उन्होंने महर्षि वेदव्यास से इसका समाधान पूछा।
- महर्षि व्यास ने भीमसेन को बताया कि यदि वे ज्येष्ठ शुक्ल एकादशी के दिन बिना अन्न और जल ग्रहण किए निर्जला व्रत रखें, तो उन्हें वर्षभर की सभी एकादशियों के व्रत के समान पुण्य फल प्राप्त होगा।
- भीमसेन ने महर्षि के आदेश का पालन करते हुए यह कठिन व्रत रखा और भगवान विष्णु की कृपा प्राप्त की। तभी से इस एकादशी को "भीमसेनी एकादशी" तथा "पांडव एकादशी" के नाम से भी जाना जाता है।
- धार्मिक मान्यता है कि श्रद्धापूर्वक निर्जला एकादशी का व्रत रखने से सभी 24 एकादशियों के समान पुण्य फल प्राप्त होता है और भगवान विष्णु की विशेष कृपा मिलती है।
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