वट सावित्री व्रत 2026 कब है? जानें सही तिथि, शुभ मुहूर्त, पूजा विधि, व्रत कथा, मंत्र और महत्व

 वट सावित्री व्रत हिंदू धर्म का एक महत्वपूर्ण और पवित्र व्रत है, जिसे मुख्य रूप से विवाहित महिलाएं अपने पति की लंबी आयु, अच्छे स्वास्थ्य और अखंड सौभाग्य की कामना से रखती हैं। यह व्रत माता सावित्री और सत्यवान की अमर कथा पर आधारित है, जो प्रेम, समर्पण और अटूट निष्ठा का प्रतीक मानी जाती है। वट सावित्री व्रत ज्येष्ठ मास की अमावस्या तिथि को मनाया जाता है। इस दिन महिलाएं वट (बरगद) वृक्ष की पूजा करती हैं, उसकी परिक्रमा करती हैं तथा सावित्री-सत्यवान की कथा का श्रवण करती हैं।

वट सावित्री व्रत 2026 कब है? जानें सही तिथि, शुभ मुहूर्त, पूजा विधि, व्रत कथा, मंत्र और महत्व

'वट' का अर्थ बरगद का वृक्ष और 'सावित्री' का संबंध माता सावित्री से है। पौराणिक कथा के अनुसार माता सावित्री ने अपने तप, प्रेम और दृढ़ संकल्प के बल पर यमराज से अपने पति सत्यवान के प्राण वापस प्राप्त किए थे। उसी घटना की स्मृति में यह व्रत रखा जाता है। यह व्रत भारतीय संस्कृति में पति-पत्नी के अटूट प्रेम, विश्वास और समर्पण का प्रतीक माना जाता है। हिंदू धर्म में वट सावित्री व्रत का विशेष धार्मिक महत्व बताया गया है। मान्यता है कि इस दिन वट वृक्ष की पूजा करने से भगवान विष्णु, भगवान शिव और ब्रह्मा का आशीर्वाद प्राप्त होता है। वट वृक्ष को दीर्घायु, स्थिरता और अमरत्व का प्रतीक माना जाता है।धार्मिक मान्यताओं के अनुसार श्रद्धा और विधि-विधान से यह व्रत करने पर परिवार में सुख-शांति, समृद्धि और सकारात्मक ऊर्जा का वास होता है।

सुहागिन महिलाओं के लिए विशेष महत्व:-

वट सावित्री व्रत विशेष रूप से सुहागिन महिलाओं के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। महिलाएं इस दिन अपने पति की लंबी आयु, उत्तम स्वास्थ्य और सुखी वैवाहिक जीवन की कामना करती हैं। मान्यता है कि माता सावित्री की कृपा से वैवाहिक जीवन में प्रेम, विश्वास और मधुरता बनी रहती है तथा अखंड सौभाग्य का आशीर्वाद प्राप्त होता है। इसी कारण यह व्रत भारत के अनेक राज्यों में बड़े श्रद्धा और उत्साह के साथ मनाया जाता है। 

वट सावित्री व्रत 2026 कब है?

वट सावित्री व्रत हिंदू धर्म का एक प्रमुख व्रत है, जिसे विवाहित महिलाएं अपने पति की लंबी आयु, सुखी दांपत्य जीवन और अखंड सौभाग्य की कामना से रखती हैं। यह व्रत ज्येष्ठ मास की अमावस्या तिथि को मनाया जाता है और माता सावित्री तथा सत्यवान की पावन कथा से जुड़ा हुआ है। 

वट सावित्री व्रत 2026 कब है?

वर्ष 2026 में वट सावित्री व्रत 15 जून 2026, सोमवार को रखा जाएगा। इस दिन सुहागिन महिलाएं व्रत रखकर वट (बरगद) वृक्ष की पूजा करेंगी तथा पति की दीर्घायु की कामना करेंगी। अमावस्या तिथि:- 14 जून 2026 को रात्रि में प्रारंभ होगी और 15 जून 2026 को रात्रि तक रहेगी, जिसके कारण उदया तिथि के अनुसार व्रत और पूजा 15 जून को ही की जाएगी।

व्रत तिथि को लेकर भ्रम:-

हर वर्ष की तरह 2026 में भी वट सावित्री व्रत की तिथि को लेकर कुछ लोगों के मन में भ्रम हो सकता है। इसका कारण अमावस्या तिथि का एक दिन पहले शुरू होना और अगले दिन तक जारी रहना है। हिंदू पंचांग के अनुसार अधिकांश व्रत और त्योहार उदया तिथि (सूर्योदय के समय विद्यमान तिथि) के आधार पर मनाए जाते हैं। चूंकि 15 जून 2026 को सूर्योदय के समय अमावस्या तिथि रहेगी, इसलिए वट सावित्री व्रत 15 जून 2026, सोमवार को ही रखा जाएगा। यदि आप वट सावित्री व्रत 2026 कब है का उत्तर खोज रहे हैं, तो सही तिथि 15 जून 2026 (सोमवार) है। इसी दिन वट वृक्ष की पूजा, व्रत कथा का श्रवण और धार्मिक अनुष्ठान करना शुभ माना गया है। 

वट सावित्री व्रत 2026 शुभ मुहूर्त

वट सावित्री व्रत के दिन शुभ मुहूर्त में पूजा करने का विशेष महत्व माना जाता है। इस दिन सुहागिन महिलाएं वट (बरगद) वृक्ष की पूजा कर पति की लंबी आयु, सुखी दांपत्य जीवन और अखंड सौभाग्य की कामना करती हैं वर्ष 2026 में वट सावित्री व्रत 15 जून, सोमवार को मनाया जाएगा। व्रत की पूजा सूर्योदय के बाद से पूर्वाह्न काल तक करना अत्यंत शुभ माना जाता है।  प्रातः 06:00 बजे से 11:00 बजे इस समय वट वृक्ष की पूजा, कथा श्रवण और परिक्रमा करना उत्तम माना जाता है।

वट वृक्ष पूजा मुहूर्त:- 

वट वृक्ष की पूजा सुबह स्नान और संकल्प के बाद करनी चाहिए। महिलाएं वट वृक्ष को जल अर्पित करें, रोली-अक्षत चढ़ाएं और कच्चा धागा बांधते हुए परिक्रमा करें। वैट वृक्ष की पूजा का शुभ मुहर्त प्रातः 07:00 बजे से 10:30 बजे तक। इस दौरान माता सावित्री और सत्यवान का स्मरण करते हुए पूजा करना शुभ फलदायी माना जाता है। वट सावित्री व्रत का पारण सामान्यतः अमावस्या तिथि समाप्त होने के बाद किया जाता है। कई स्थानों पर महिलाएं पूजा और कथा पूर्ण होने के बाद फलाहार ग्रहण करती हैं, जबकि कुछ परंपराओं में अगले दिन पारण किया जाता है। 16 जून 2026 को स्थानीय पंचांग एवं पारिवारिक परंपरा के अनुसारव्रत पारण यानि व्रत खोलने का समय बताया गया है।

नोट: पूजा मुहूर्त और पारण समय स्थान विशेष एवं पंचांग के अनुसार थोड़ा भिन्न हो सकते हैं। इसलिए अंतिम निर्णय के लिए अपने स्थानीय पंचांग का अवश्य पालन करें।

वट सावित्री व्रत का महत्व

वट सावित्री व्रत हिंदू धर्म में सुहागिन महिलाओं के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण और पुण्यदायी व्रत माना जाता है। यह व्रत माता सावित्री की अपने पति सत्यवान के प्रति अटूट निष्ठा, प्रेम और समर्पण का प्रतीक है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस व्रत को श्रद्धा और विधि-विधान से करने पर अखंड सौभाग्य, पति की लंबी आयु और पारिवारिक सुख-समृद्धि का आशीर्वाद प्राप्त होता है।

अखंड सौभाग्य की प्राप्ति:-

वट सावित्री व्रत को अखंड सौभाग्य प्रदान करने वाला व्रत माना जाता है। विवाहित महिलाएं अपने वैवाहिक जीवन की खुशहाली और सौभाग्य की रक्षा के लिए यह व्रत रखती हैं। मान्यता है कि माता सावित्री की कृपा से सुहाग की रक्षा होती है और जीवन में मंगलमयता बनी रहती है।

पति की दीर्घायु की कामना:-

इस व्रत का मुख्य उद्देश्य पति की लंबी आयु और अच्छे स्वास्थ्य की प्रार्थना करना है। पौराणिक कथा के अनुसार माता सावित्री ने अपने तप, साहस और दृढ़ संकल्प से यमराज से अपने पति सत्यवान के प्राण वापस प्राप्त किए थे। इसी कारण महिलाएं इस दिन व्रत रखकर अपने पति के स्वस्थ और दीर्घायु जीवन की कामना करती हैं।

सुखी दांपत्य जीवन:-

वट सावित्री व्रत पति-पत्नी के बीच प्रेम, विश्वास और समर्पण को मजबूत करने का प्रतीक माना जाता है। यह व्रत दांपत्य जीवन में मधुरता, आपसी सम्मान और पारिवारिक एकता को बढ़ावा देता है। माता सावित्री और सत्यवान की कथा आदर्श वैवाहिक जीवन की प्रेरणा देती है।

धार्मिक एवं आध्यात्मिक महत्व:-

धार्मिक दृष्टि से वट सावित्री व्रत अत्यंत शुभ माना जाता है। इस दिन वट (बरगद) वृक्ष की पूजा की जाती है, जिसे दीर्घायु, अमरत्व और स्थिरता का प्रतीक माना गया है। व्रत, पूजा, कथा श्रवण और दान-पुण्य करने से पुण्य फल की प्राप्ति होती है तथा मन में आध्यात्मिक शांति और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।

वट सावित्री व्रत केवल एक धार्मिक परंपरा नहीं, बल्कि प्रेम, निष्ठा, त्याग और समर्पण का पर्व है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार यह व्रत अखंड सौभाग्य, पति की दीर्घायु, सुखी दांपत्य जीवन और आध्यात्मिक उन्नति का आशीर्वाद प्रदान करता है। 

वट सावित्री व्रत की पूजा विधि

वट सावित्री व्रत विवाहित महिलाओं द्वारा पति की लंबी आयु, सुखी वैवाहिक जीवन और अखंड सौभाग्य की कामना से रखा जाता है। इस दिन माता सावित्री, सत्यवान और वट (बरगद) वृक्ष की पूजा का विशेष महत्व माना जाता है। श्रद्धा और विधि-विधान से की गई पूजा शुभ फल प्रदान करती है।

वट सावित्री व्रत की पूजा विधि

  • वट सावित्री व्रत के दिन प्रातः ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान करें। 
  • स्वच्छ वस्त्र धारण करें। 
  • सुहागिन महिलाएं पारंपरिक रूप से लाल, पीले या हरे रंग के वस्त्र पहनकर सोलह श्रृंगार करती हैं। 
  • तैयार होने बाद व्रत का संकल्प लें और माता सावित्री, सत्यवान तथा भगवान विष्णु का ध्यान करें।
  • पूजा से पहले घर के मंदिर और पूजा स्थल की साफ-सफाई कर लें तथा आवश्यक पूजा सामग्री एकत्रित कर लें।

वट सावित्री पूजा के लिए निम्नलिखित सामग्री की आवश्यकता होती है:

  • वट (बरगद) वृक्ष
  • कच्चा सूती धागा या मौली
  • रोली और कुमकुम
  • अक्षत (चावल)
  • हल्दी
  • फूल और माला
  • दीपक और धूपबत्ती
  • जल से भरा कलश
  • फल और मिठाई
  • नारियल
  • पान और सुपारी
  • सावित्री-सत्यवान का चित्र या प्रतिमा

वट वृक्ष की पूजा:-

वट वृक्ष के पास जाकर सबसे पहले जल अर्पित करें। इसके बाद रोली, अक्षत, फूल और कुमकुम चढ़ाएं। दीपक और धूप जलाकर विधिपूर्वक पूजा करें। पूजा के दौरान माता सावित्री और सत्यवान का स्मरण करें तथा पति की लंबी आयु और परिवार की सुख-समृद्धि की प्रार्थना करें। धार्मिक मान्यता के अनुसार वट वृक्ष में त्रिदेवों का वास माना जाता है, इसलिए श्रद्धा और भक्ति के साथ इसकी पूजा करना शुभ माना जाता है।

पूजा के बाद वट वृक्ष के चारों ओर कच्चा सूती धागा लपेटते हुए परिक्रमा करें। अधिकांश स्थानों पर 7, 11 या 21 परिक्रमा करने की परंपरा है, जबकि कुछ महिलाएं अपनी श्रद्धा के अनुसार अधिक परिक्रमा भी करती हैं। परिक्रमा करते समय पति की दीर्घायु, सुखी दांपत्य जीवन और अखंड सौभाग्य की कामना करें। इसके बाद सावित्री-सत्यवान की व्रत कथा सुनें या पढ़ें और भगवान से परिवार के कल्याण की प्रार्थना करें। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार वट सावित्री व्रत की पूजा श्रद्धा और नियमपूर्वक करने से अखंड सौभाग्य, पति की लंबी आयु, पारिवारिक सुख-शांति और वैवाहिक जीवन में मधुरता बनी रहती है। यह व्रत प्रेम, विश्वास और समर्पण का प्रतीक माना जाता है।

वट सावित्री व्रत कथा

वट सावित्री व्रत की कथा हिंदू धर्म की सबसे प्रेरणादायक पौराणिक कथाओं में से एक मानी जाती है। यह कथा माता सावित्री के अपने पति सत्यवान के प्रति अटूट प्रेम, समर्पण और दृढ़ संकल्प को दर्शाती है। इसी कथा के कारण विवाहित महिलाएं वट सावित्री व्रत रखती हैं और पति की लंबी आयु की कामना करती हैं। पौराणिक कथा के अनुसार प्राचीन समय में राजा अश्वपति की पुत्री सावित्री अत्यंत सुंदर, बुद्धिमान और तेजस्वी थीं। विवाह योग्य होने पर उन्होंने स्वयं सत्यवान को अपने पति के रूप में चुना।

वट सावित्री व्रत कथा

    जब महर्षि नारद को यह ज्ञात हुआ तो उन्होंने राजा अश्वपति को बताया कि सत्यवान गुणवान और धर्मात्मा हैं, लेकिन उनकी आयु बहुत कम है और विवाह के एक वर्ष बाद उनकी मृत्यु हो जाएगी। यह जानने के बावजूद सावित्री अपने निर्णय पर अडिग रहीं और सत्यवान से विवाह कर लिया। विवाह के बाद सावित्री ने पूरे मन से अपने पति और परिवार की सेवा की। जैसे-जैसे सत्यवान की मृत्यु का दिन निकट आया, सावित्री ने कठोर तप और व्रत का संकल्प लिया। निर्धारित दिन सत्यवान जंगल में लकड़ी काटने गए और सावित्री भी उनके साथ थीं। अचानक सत्यवान को चक्कर आया और वे सावित्री की गोद में सिर रखकर लेट गए। कुछ ही क्षणों में उनके प्राण निकल गए।

    तभी यम स्वयं सत्यवान की आत्मा लेने आए। जब यमराज सत्यवान के प्राण लेकर जाने लगे, तब सावित्री भी उनके पीछे चल पड़ीं। यमराज ने कई बार उन्हें लौटने के लिए कहा, लेकिन सावित्री अपने पति के प्रति प्रेम और धर्म का पालन करते हुए उनके पीछे चलती रहीं। सावित्री की बुद्धिमत्ता, विनम्रता और पतिव्रता धर्म से प्रसन्न होकर यमराज ने उन्हें कई वरदान दिए। अंत में सावित्री ने ऐसा वरदान मांगा कि उन्हें सत्यवान से संतान प्राप्त हो। यमराज अपने वचन से बंध गए, क्योंकि बिना सत्यवान के जीवित हुए यह संभव नहीं था। तब उन्होंने सत्यवान के प्राण वापस लौटा दिए और उन्हें पुनः जीवन प्रदान किया।

    वट सावित्री व्रत की कथा हमें प्रेम, विश्वास, धैर्य और दृढ़ संकल्प का संदेश देती है। माता सावित्री का जीवन यह सिखाता है कि सच्ची निष्ठा, साहस और धर्म के मार्ग पर चलकर कठिन से कठिन परिस्थिति का सामना किया जा सकता है। यह कथा पति-पत्नी के अटूट प्रेम, समर्पण और विश्वास का आदर्श उदाहरण मानी जाती है। यही कारण है कि आज भी लाखों महिलाएं वट सावित्री व्रत रखकर माता सावित्री का स्मरण करती हैं और अपने परिवार की सुख-समृद्धि तथा पति की दीर्घायु की कामना करती हैं। धार्मिक मान्यता के अनुसार माता सावित्री की भक्ति, साहस और पतिव्रता धर्म ही वट सावित्री व्रत का मूल आधार है।

    वट सावित्री व्रत के नियम

    वट सावित्री व्रत श्रद्धा, संयम और नियमों का व्रत माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार व्रत के दौरान कुछ विशेष नियमों का पालन करने से व्रत का पूर्ण फल प्राप्त होता है। इसलिए व्रत रखने वाली महिलाओं को पूजा और उपवास से जुड़े नियमों का ध्यान रखना चाहिए।

    व्रत में क्या खाएं?

    व्रत के दौरान सात्विक भोजन और फलाहार ग्रहण करना उचित माना जाता है। अपनी परंपरा और स्वास्थ्य के अनुसार महिलाएं निम्न चीजों का सेवन कर सकती हैं:

    1. फल और सूखे मेवे
    2. दूध और दही
    3. मखाना
    4. नारियल
    5. साबूदाना
    6. सेंधा नमक से बने व्रत के व्यंजन
    7. फलों का रस
    8. यदि निर्जल या कठोर उपवास संभव न हो तो स्वास्थ्य के अनुसार फलाहार लिया जा सकता है।

    क्या नहीं खाएं?

    1. व्रत के दिन तामसिक और अशुद्ध भोजन से बचना चाहिए।
    2. मांसाहार
    3. शराब और नशीले पदार्थ
    4. लहसुन और प्याज
    5. सामान्य नमक
    6. अधिक तला-भुना भोजन
    7. क्रोध और नकारात्मकता बढ़ाने वाली आदतें
    8. धार्मिक मान्यता के अनुसार व्रत के दिन सात्विकता बनाए रखना आवश्यक माना जाता है।

    पूजा के दौरान सावधानियां:-

    1. वट (बरगद) वृक्ष को किसी प्रकार की हानि न पहुंचाएं।
    2. पूजा सामग्री को स्वच्छ रखें।
    3. श्रद्धा और शांत मन से पूजा करें।
    4. वृक्ष पर प्लास्टिक या हानिकारक वस्तुएं न बांधें।
    5. पूजा के समय विवाद, क्रोध और अपशब्दों से बचें।
    6. कथा श्रवण और मंत्र जाप पर ध्यान केंद्रित करें।

    व्रत का संकल्प:-

    व्रत की शुरुआत में स्नान करके भगवान विष्णु, माता सावित्री और सत्यवान का स्मरण करते हुए संकल्प लें। संकल्प में पति की दीर्घायु, परिवार की सुख-समृद्धि और अखंड सौभाग्य की कामना की जाती है।

    संकल्प के समय मन में यह भावना रखें कि आप श्रद्धा, भक्ति और नियमपूर्वक व्रत का पालन करेंगे। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार सच्चे मन से लिया गया संकल्प व्रत को सफल और फलदायी बनाता है। वट सावित्री व्रत के नियमों का पालन करने से व्रत का आध्यात्मिक और धार्मिक महत्व बढ़ जाता है। श्रद्धा, संयम, सात्विकता और भक्ति के साथ किया गया यह व्रत अखंड सौभाग्य, पति की दीर्घायु और पारिवारिक सुख-समृद्धि का आशीर्वाद प्रदान करने वाला माना जाता है। 

    वट सावित्री पर क्या दान करें?

    वट सावित्री पर क्या दान करें?

      वट सावित्री व्रत के दिन दान-पुण्य का विशेष महत्व माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस दिन श्रद्धा और सामर्थ्य के अनुसार दान करने से पुण्य फल की प्राप्ति होती है तथा परिवार में सुख-समृद्धि बनी रहती है। दान को सेवा, करुणा और धर्म का महत्वपूर्ण अंग माना गया है।

      वस्त्र दान:-

      वट सावित्री के दिन जरूरतमंद लोगों को वस्त्र दान करना अत्यंत शुभ माना जाता है। मान्यता है कि वस्त्र दान करने से जीवन में सुख, शांति और समृद्धि का आशीर्वाद प्राप्त होता है। श्रद्धा से किया गया छोटा दान भी पुण्यदायी माना जाता है।

      फल दान:-

      फल दान को सात्विक और शुभ माना गया है। इस दिन गरीबों, साधु-संतों या जरूरतमंद लोगों को फल दान करने से पुण्य की प्राप्ति होती है। फल दान स्वास्थ्य और समृद्धि का प्रतीक भी माना जाता है।

      जल से भरा घड़ा या कलश:-

      ज्येष्ठ मास की गर्मी में जल का दान विशेष महत्व रखता है। वट सावित्री व्रत पर जल से भरा घड़ा, मटका या कलश दान करना अत्यंत पुण्यकारी माना जाता है। धार्मिक मान्यता है कि प्यासे व्यक्ति को जल उपलब्ध कराना सबसे श्रेष्ठ दानों में से एक है।

      अन्न दान:-

      हिंदू धर्म में अन्न दान को महादान कहा गया है। वट सावित्री के दिन जरूरतमंद लोगों को अन्न दान करने से भगवान की कृपा प्राप्त होती है और घर में अन्न-धन की कमी नहीं रहती। कई श्रद्धालु इस दिन भोजन वितरण का भी आयोजन करते हैं।

      दक्षिणा:-

      ब्राह्मणों, विद्वानों या जरूरतमंद लोगों को श्रद्धा अनुसार दक्षिणा देना भी शुभ माना जाता है। दक्षिणा का दान धार्मिक कार्यों और सेवा भावना को बढ़ावा देता है तथा पुण्य फल प्रदान करने वाला माना जाता है।

      दान करते समय ध्यान रखें

      • दान सदैव अपनी क्षमता के अनुसार करें।
      • दान में दिखावा या अहंकार न रखें।
      • जरूरतमंद और योग्य व्यक्ति को दान दें।
      • श्रद्धा और निस्वार्थ भाव से किया गया दान अधिक फलदायी माना जाता है।

      वट सावित्री व्रत पर वस्त्र, फल, जल से भरा घड़ा/कलश, अन्न और दक्षिणा का दान विशेष पुण्यदायी माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस दिन किया गया दान सुख, समृद्धि, पारिवारिक खुशहाली और आध्यात्मिक उन्नति का मार्ग प्रशस्त करता है।

      वट सावित्री व्रत पर क्या करें और क्या न करें?

      वट सावित्री व्रत श्रद्धा, भक्ति और संयम का पर्व है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस दिन कुछ विशेष कार्य करना शुभ माना जाता है, वहीं कुछ कार्यों से बचने की सलाह दी जाती है। व्रत के नियमों का पालन करने से पूजा का महत्व और बढ़ जाता है।

      क्या करें?

      वट वृक्ष की पूजा:-

      वट सावित्री व्रत के दिन वट (बरगद) वृक्ष की विधि-विधान से पूजा करें। वृक्ष को जल अर्पित करें, रोली-अक्षत चढ़ाएं और कच्चा धागा बांधते हुए परिक्रमा करें। धार्मिक मान्यता है कि वट वृक्ष की पूजा से अखंड सौभाग्य और पति की दीर्घायु का आशीर्वाद प्राप्त होता है।

      कथा श्रवण:-

      माता सावित्री और सत्यवान की पावन कथा अवश्य सुनें या पढ़ें। यह कथा प्रेम, निष्ठा, साहस और समर्पण का संदेश देती है तथा व्रत का अभिन्न अंग मानी जाती है।

      दान-पुण्य:-

      इस दिन जरूरतमंद लोगों को वस्त्र, अन्न, फल, जल से भरा घड़ा या दक्षिणा का दान करना शुभ माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार दान-पुण्य से पुण्य फल की प्राप्ति होती है।

      मंत्र जाप:-

      पूजा के दौरान भगवान विष्णु, माता सावित्री और वट वृक्ष से संबंधित मंत्रों का श्रद्धापूर्वक जाप करें। मंत्र जाप से मन को शांति मिलती है और आध्यात्मिक उन्नति का मार्ग प्रशस्त होता है।

      क्या न करें?

      क्रोध न करें:-

      व्रत के दिन क्रोध, गुस्सा और नकारात्मक विचारों से दूर रहें। शांत और सकारात्मक मन से पूजा करना अधिक शुभ माना जाता है।

      अपशब्द न बोलें:-

      किसी का अपमान न करें और कटु वचन बोलने से बचें। मधुर वाणी और विनम्र व्यवहार व्रत की पवित्रता को बनाए रखते हैं।

      झूठ और विवाद से बचें:-

      वट सावित्री व्रत के दिन झूठ बोलना, विवाद करना या किसी से अनावश्यक बहस करना उचित नहीं माना जाता। सत्य और सदाचार का पालन करना चाहिए।

      वृक्ष को नुकसान न पहुंचाएं:-

      वट वृक्ष की पूजा करते समय उसकी शाखाएं न तोड़ें, छाल को नुकसान न पहुंचाएं और उस पर प्लास्टिक या हानिकारक वस्तुएं न बांधें। वृक्ष की रक्षा करना भी धार्मिक कर्तव्य माना गया है।

      वट सावित्री व्रत पर वट वृक्ष की पूजा, कथा श्रवण, दान-पुण्य और मंत्र जाप करना शुभ माना जाता है, जबकि क्रोध, अपशब्द, झूठ, विवाद और वृक्ष को नुकसान पहुंचाने से बचना चाहिए। श्रद्धा, संयम और भक्ति के साथ किया गया यह व्रत सुख, सौभाग्य और पारिवारिक खुशहाली का आशीर्वाद प्रदान करने वाला माना जाता है।

      वट सावित्री व्रत मंत्र

      वट सावित्री व्रत मंत्र

      वट सावित्री व्रत के दिन मंत्र जाप का विशेष महत्व माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार श्रद्धा और भक्ति के साथ मंत्रों का उच्चारण करने से पूजा का फल बढ़ता है तथा मन को शांति और सकारात्मक ऊर्जा प्राप्त होती है। इस दिन भगवान विष्णु, माता सावित्री, सत्यवान और वट (बरगद) वृक्ष की पूजा के दौरान इन मंत्रों का जाप किया जा सकता है।

      ॐ नमो भगवते वासुदेवाय:-

      यह भगवान विष्णु का अत्यंत पवित्र और प्रभावशाली मंत्र माना जाता है।

      ॐ नमो भगवते वासुदेवाय॥

      • भगवान विष्णु की कृपा प्राप्त होती है।
      • मन में शांति और सकारात्मकता आती है।
      • जीवन में सुख, समृद्धि और मंगल का वास होता है।
      • परिवार में सुख-शांति बनी रहती है।

      सावित्री-सत्यवान स्मरण मंत्र:-

      वट सावित्री व्रत के दिन माता सावित्री और सत्यवान का स्मरण करना अत्यंत शुभ माना जाता है।

      ॐ सावित्र्यै नमः।

      सत्यवानाय नमः॥ 

      या

      ॐ सावित्र्यै स्वाहा, सत्यवानाय स्वाहा॥

      • वैवाहिक जीवन में प्रेम और विश्वास बढ़ता है।
      • अखंड सौभाग्य का आशीर्वाद प्राप्त होता है।
      • पति-पत्नी के संबंधों में मधुरता बनी रहती है।
      • दांपत्य जीवन सुखमय होता है।

      वट वृक्ष की पूजा करते समय यह मंत्र बोला जाता है::-

      "मूलतो ब्रह्मरूपाय मध्यतो विष्णुरूपिणे।

      अग्रतः शिवरूपाय वृक्षराजाय ते नमः॥"

      (इस मंत्र में वट वृक्ष को ब्रह्मा, विष्णु और महेश का स्वरूप मानकर प्रणाम किया जाता है। धार्मिक मान्यता है कि वट वृक्ष में त्रिदेवों का निवास होता है, इसलिए इसकी पूजा विशेष फलदायी मानी जाती है।)

      मंत्र जाप करते समय ध्यान रखें:-

      • स्वच्छ मन और श्रद्धा के साथ मंत्रों का जाप करें।
      • वट वृक्ष की परिक्रमा करते समय मंत्रों का उच्चारण करें।
      • माता सावित्री, सत्यवान और भगवान विष्णु का ध्यान करें।
      • संभव हो तो 108 बार मंत्र जाप करें।

      वट सावित्री व्रत पर ॐ नमो भगवते वासुदेवाय, सावित्री-सत्यवान स्मरण मंत्र और वट वृक्ष पूजा मंत्र का श्रद्धापूर्वक जाप करना शुभ माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इन मंत्रों के जाप से अखंड सौभाग्य, पति की दीर्घायु, पारिवारिक सुख-शांति और आध्यात्मिक उन्नति का आशीर्वाद प्राप्त होता है।

      वट सावित्री व्रत के लाभ

      वट सावित्री व्रत हिंदू धर्म में अत्यंत पुण्यदायी और शुभ व्रत माना जाता है। यह व्रत माता सावित्री की अपने पति सत्यवान के प्रति अटूट निष्ठा, प्रेम और समर्पण का प्रतीक है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार श्रद्धा और विधि-विधान से यह व्रत करने पर अनेक आध्यात्मिक, पारिवारिक और वैवाहिक लाभ प्राप्त होते हैं।

      अखंड सौभाग्य:-

      वट सावित्री व्रत का सबसे बड़ा लाभ अखंड सौभाग्य की प्राप्ति माना जाता है। सुहागिन महिलाएं अपने वैवाहिक जीवन की खुशहाली और सौभाग्य की रक्षा के लिए यह व्रत रखती हैं। मान्यता है कि माता सावित्री की कृपा से जीवन में मंगल और शुभता बनी रहती है।

      पति की लंबी आयु:-

      इस व्रत का मुख्य उद्देश्य पति की दीर्घायु और अच्छे स्वास्थ्य की कामना करना है। पौराणिक कथा के अनुसार माता सावित्री ने अपने तप और दृढ़ संकल्प से यमराज से अपने पति सत्यवान के प्राण वापस प्राप्त किए थे। इसी कारण यह व्रत पति की लंबी आयु प्रदान करने वाला माना जाता है।

      पारिवारिक सुख-शांति:-

      धार्मिक मान्यताओं के अनुसार वट सावित्री व्रत करने से परिवार में सुख, शांति और समृद्धि का वास होता है। परिवार के सदस्यों के बीच प्रेम, सहयोग और आपसी विश्वास बढ़ता है, जिससे घर का वातावरण सकारात्मक बना रहता है।

      वैवाहिक जीवन में मजबूती:-

      वट सावित्री व्रत पति-पत्नी के रिश्ते में प्रेम, विश्वास और समर्पण को मजबूत बनाने का प्रतीक माना जाता है। माता सावित्री और सत्यवान की कथा वैवाहिक जीवन में निष्ठा और त्याग का आदर्श प्रस्तुत करती है, जिससे दांपत्य संबंध और अधिक मजबूत होते हैं।

      धार्मिक पुण्य:-

      व्रत, पूजा, कथा श्रवण, मंत्र जाप और दान-पुण्य करने से धार्मिक पुण्य की प्राप्ति होती है। शास्त्रों के अनुसार इस दिन श्रद्धा और भक्ति से किए गए धार्मिक कार्य व्यक्ति के आध्यात्मिक विकास में सहायक होते हैं तथा मन को शांति प्रदान करते हैं।

      वट सावित्री व्रत केवल एक धार्मिक परंपरा नहीं, बल्कि प्रेम, निष्ठा, विश्वास और समर्पण का पावन पर्व है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस व्रत को श्रद्धापूर्वक करने से अखंड सौभाग्य, पति की लंबी आयु, पारिवारिक सुख-शांति, वैवाहिक जीवन में मजबूती और धार्मिक पुण्य की प्राप्ति होती है।

      वट सावित्री व्रत 2026 FAQs

      1. वट सावित्री व्रत 2026 कब है?

      वर्ष 2026 में वट सावित्री व्रत 15 जून 2026, सोमवार को मनाया जाएगा। यह व्रत ज्येष्ठ मास की अमावस्या तिथि को रखा जाता है। इस दिन विवाहित महिलाएं वट (बरगद) वृक्ष की पूजा कर पति की लंबी आयु और अखंड सौभाग्य की कामना करती हैं।

      2. वट सावित्री और वट पूर्णिमा में क्या अंतर है?

      वट सावित्री और वट पूर्णिमा में क्या अंतर है?

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      वट सावित्री व्रत और वट पूर्णिमा का उद्देश्य समान है, लेकिन दोनों की तिथि अलग होती है।

      • वट सावित्री व्रत → ज्येष्ठ अमावस्या को मनाया जाता है।
      • वट पूर्णिमा व्रत → ज्येष्ठ पूर्णिमा को मनाया जाता है।

      उत्तर भारत में वट सावित्री व्रत अधिक प्रचलित है, जबकि महाराष्ट्र, गुजरात और पश्चिम भारत के कई क्षेत्रों में वट पूर्णिमा मनाई जाती है।

      3. वट सावित्री व्रत कौन रख सकता है?

      वट सावित्री व्रत मुख्य रूप से विवाहित (सुहागिन) महिलाएं अपने पति की लंबी आयु और सुखी दांपत्य जीवन की कामना से रखती हैं। कुछ स्थानों पर अविवाहित कन्याएं भी योग्य जीवनसाथी की प्राप्ति के लिए यह व्रत और पूजा करती हैं।

      4. वट वृक्ष की पूजा क्यों की जाती है?

      धार्मिक मान्यताओं के अनुसार वट (बरगद) वृक्ष दीर्घायु, अमरत्व और स्थिरता का प्रतीक माना जाता है। पौराणिक कथा के अनुसार माता सावित्री ने वट वृक्ष के नीचे ही यमराज से अपने पति सत्यवान के प्राण वापस प्राप्त किए थे। इसी कारण वट वृक्ष की पूजा का विशेष महत्व है।

      5. वट सावित्री व्रत में कितनी परिक्रमा करनी चाहिए?

      वट सावित्री व्रत के दिन महिलाएं परंपरा और श्रद्धा के अनुसार वट वृक्ष की 7, 11 या 21 परिक्रमा करती हैं। कुछ स्थानों पर 108 परिक्रमा करने की भी परंपरा है, लेकिन यह अनिवार्य नहीं है।

      6. व्रत का पारण कब करें?

      वट सावित्री व्रत का पारण सामान्यतः पूजा और व्रत की सभी धार्मिक प्रक्रियाएं पूर्ण होने के बाद किया जाता है। कुछ परंपराओं में महिलाएं उसी दिन पूजा के बाद फलाहार ग्रहण करती हैं, जबकि कुछ स्थानों पर अमावस्या तिथि समाप्त होने के बाद पारण किया जाता है। पारण का समय स्थानीय पंचांग और पारिवारिक परंपरा के अनुसार निर्धारित करना उचित माना जाता है। 

      प्रिय पाठकों,

      वट सावित्री व्रत भारतीय संस्कृति और सनातन परंपरा का एक महत्वपूर्ण पर्व है, जो प्रेम, विश्वास, समर्पण और अखंड सौभाग्य का संदेश देता है। माता सावित्री का जीवन हमें सिखाता है कि दृढ़ निश्चय, भक्ति और सच्चे प्रेम से जीवन की कठिन से कठिन परिस्थितियों पर भी विजय प्राप्त की जा सकती है। आशा है कि इस लेख के माध्यम से आपको वट सावित्री व्रत 2026 की सही तिथि, शुभ मुहूर्त, पूजा विधि, व्रत कथा, मंत्र, नियम, महत्व और लाभ से जुड़ी संपूर्ण जानकारी प्राप्त हुई होगी।

      वट सावित्री व्रत सुहागिन महिलाओं द्वारा पति की लंबी आयु, सुखी दांपत्य जीवन और अखंड सौभाग्य की कामना से रखा जाने वाला पवित्र व्रत है। इस दिन वट वृक्ष की पूजा, सावित्री-सत्यवान कथा का श्रवण, मंत्र जाप और दान-पुण्य का विशेष महत्व माना जाता है। माता सावित्री, सत्यवान और वट वृक्ष की कृपा आप और आपके परिवार पर सदैव बनी रहे। आपके जीवन में सुख, शांति, समृद्धि, उत्तम स्वास्थ्य और खुशहाली का वास हो।आशा है कि इस लेख के माध्यम से आपको वट सावित्री व्रत 2026 की सही तिथि, शुभ मुहूर्त, पूजा विधि, व्रत कथा, मंत्र, महत्व, नियम और लाभों की संपूर्ण जानकारी प्राप्त हुई होगी। यदि यह लेख आपके लिए उपयोगी रहा हो, तो इसे अपने परिवार, मित्रों और प्रियजनों के साथ अवश्य साझा करें, ताकि वे भी इस पावन व्रत से जुड़ी महत्वपूर्ण जानकारी प्राप्त कर सकें।

      "माता सावित्री और सत्यवान की कृपा से आपके जीवन में सुख, समृद्धि, उत्तम स्वास्थ्य, वैवाहिक सौहार्द और अखंड सौभाग्य बना रहे। श्रद्धा और विश्वास के साथ किया गया वट सावित्री व्रत आपके जीवन में सकारात्मक ऊर्जा, खुशहाली और मंगल लेकर आए।"

      वट सावित्री व्रत 2026 की हार्दिक शुभकामनाएं! 


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