भारतीय संस्कृति और लोक आस्था का सबसे अनूठा, पावन और कठिन पर्व छठ पूजा केवल एक त्यौहार नहीं, बल्कि प्रकृति, सूर्य देव और छठी मैया के प्रति अटूट श्रद्धा का जीवंत उदाहरण है। मुख्य रूप से बिहार, झारखंड, पूर्वी उत्तर प्रदेश और नेपाल के तराई क्षेत्रों में मनाया जाने वाला यह महापर्व आज देश ही नहीं, बल्कि विदेशों में भी पूरे हर्षोल्लास और भक्तिभाव के साथ मनाया जाता है। अन्य धार्मिक त्यौहारों की तुलना में छठ पूजा की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें किसी मूर्ति पूजा या कर्मकांड की आवश्यकता नहीं होती। यहाँ सीधे प्रत्यक्ष देवता—भगवान भास्कर (सूर्य देव)—और उनकी बहन छठी मैया (षष्ठी देवी) की आराधना की जाती है। प्रकृति से जुड़े इस पर्व में उगते सूर्य के साथ-साथ ढलते यानी डूबते हुए सूर्य को भी पूरे आदर के साथ अर्घ्य दिया जाता है, जो यह संदेश देता है कि जीवन में अस्त होने वाली हर वस्तु का पुनः उदय होना निश्चित है।
वर्ष 2026 में छठ पूजा का यह पावन चार दिवसीय अनुष्ठान 13 नवंबर 2026 से शुरू होकर 16 नवंबर 2026 तक चलेगा। यह पर्व कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि से शुरू होता है और सप्तमी तिथि को उगते सूर्य को अंतिम अर्घ्य देने के साथ संपन्न होता है। इस पर्व में व्रती (व्रत रखने वाले श्रद्धालु) लगभग 36 घंटे का कठिन निर्जला व्रत रखते हैं। इस दौरान अत्यंत कड़े नियमों, शुद्धता और पवित्रता का पालन किया जाता है। माना जाता है कि जो भी भक्त सच्चे मन से छठी मैया और सूर्य देव की उपासना करता है, उन्हें संतान सुख, दीर्घायु, आरोग्य और अखंड सौभाग्य की प्राप्ति होती है।
छठ पूजा 2026 की सही तिथि व कैलेंडर
नीचे दी गई तालिका के माध्यम से आप छठ पूजा 2026 के चारों दिनों की सटीक तिथियों और दिन की जानकारी एक नज़र में देख सकते हैं:
| छठ पूजा का दिन | अनुष्ठान का नाम | हिंदू तिथि (पंचांग) | अंग्रेजी कैलेंडर तिथि | मुख्य गतिविधि |
| पहला दिन | नहाय-खाय | कार्तिक शुक्ल चतुर्थी | 13 नवंबर 2026 (शुक्रवार) | पवित्र स्नान व कद्दू-भात का सात्विक भोजन |
| दूसरा दिन | खरना | कार्तिक शुक्ल पंचमी | 14 नवंबर 2026 (शनिवार) | दिनभर व्रत, शाम को गुड़ की खीर का प्रसाद व व्रत की शुरुआत |
| तीसरा दिन | संध्या अर्घ्य | कार्तिक शुक्ल षष्ठी | 15 नवंबर 2026 (रविवार) | डूबते सूर्य को प्रथम अर्घ्य अर्पित करना |
| चौथा दिन | उषा अर्घ्य एवं पारण | कार्तिक शुक्ल सप्तमी | 16 नवंबर 2026 (सोमवार) | उगते सूर्य को दूसरा अर्घ्य एवं व्रत का समापन (पारण) |
- छठ का मुख्य अर्घ्य 15 नवंबर 2026 (रविवार) को पड़ेगा। रविवार का दिन सूर्य देव को समर्पित माना जाता है, इसलिए इस बार का छठ पूजा का संयोग और भी अत्यंत शुभ और फलदायी माना जा रहा है।
- 14 नवंबर को खरना के बाद से ही घर में पूर्ण सात्विकता और पवित्रता का वातावरण बनाया जाता है, जहाँ रसोई घर में केवल छठ के प्रसाद सामग्री ही रखी जाती है।
छठ पूजन के चार महत्वपूर्ण दिन
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पहला दिन: नहाय-खाय (13 नवंबर 2026, शुक्रवार)
छठ महापर्व का शुभारंभ मुख्य रूप से नहाय-खाय के साथ होता है, जो वर्ष 2026 में 13 नवंबर 2026 (शुक्रवार) को है। इस दिन से घर और मन की शुद्धि का अनूठा अनुष्ठान शुरू होता है।
नहाय-खाय के दिन की परंपरा (पवित्र स्नान और कद्दू-भात)
- नहाय-खाय के दिन व्रती सुबह जल्दी उठकर किसी पवित्र नदी (जैसे गंगा या अन्य स्थानीय जलस्त्रोत) में स्नान करते हैं। यदि नदी जाना संभव न हो, तो घर के पानी में ही थोड़ा सा गंगाजल मिलाकर स्नान किया जाता है
। - इस दिन व्रती और उनके परिवार के सदस्य केवल एक ही बार शुद्ध सात्विक भोजन ग्रहण करते हैं। इस भोजन में मुख्य रूप से लौकी (कद्दू), चने की दाल और चावल (अक्सर कद्दू-भात के रूप में) बनाए जाते हैं, जिसमें सेंधा नमक का प्रयोग किया जाता है। भोजन पूरी तरह से लहसुन-प्याज रहित और अत्यंत शुद्धता से तैयार होता है।
इस दिन के नियम और शुद्धता का महत्व
नहाय-खाय के साथ ही घर में कड़े नियमों का पालन शुरू हो जाता है। रसोई घर की पूरी तरह से साफ-सफाई की जाती है ताकि भोजन की पवित्रता बनी रहे। यह दिन व्रतियों के लिए मानसिक और शारीरिक रूप से खुद को इस कठिन महापर्व के लिए तैयार करने का पहला चरण होता है।
दूसरा दिन: खरना (14 नवंबर 2026, शनिवार)
छठ महापर्व का दूसरा अति महत्वपूर्ण दिन खरना कहलाता है, जो 14 नवंबर 2026 (शनिवार) को है।
खरना पूजा की विधि और प्रसाद
- इस दिन व्रती पूरे दिन निर्जला (बिना जल के) उपवास रखते हैं
। शाम के समय साफ-सुथरे नए चूल्हे पर आम की लकड़ी की आंच से विशेष प्रसाद तैयार किया जाता है । - खरना के मुख्य प्रसाद के रूप में गन्ने के रस या शुद्ध गुड़ और नए अरवा चावल से खीर बनाई जाती है, जिसे 'रसियाव' कहा जाता है
। इसके साथ ही घी चुपड़ी हुई गेहूं की रोटियां भी बनाई जाती हैं । सूर्यास्त के बाद व्रती स्नान करके छठी मैया को इसका भोग लगाते हैं और प्रसाद ग्रहण करते हैं ।
36 घंटे के निर्जला व्रत की शुरुआत
खरना का प्रसाद ग्रहण करने के बाद से ही व्रतियों का कठिन 36 घंटे का निर्जला उपवास आरंभ हो जाता है, जिसके दौरान वे अन्न और जल दोनों का त्याग रखते हैं
तीसरा दिन: संध्या अर्घ्य और सूर्यास्त का समय (15 नवंबर 2026, रविवार)
यह दिन यानी कार्तिक शुक्ल षष्ठी महापर्व का सबसे मुख्य केंद्र होता है, जो 15 नवंबर 2026 (रविवार) को पड़ेगा
अस्ताचलगामी (डूबते) सूर्य को अर्घ्य देने का धार्मिक महत्व
छठ पूजा दुनिया का इकलौता ऐसा पर्व है जिसमें डूबते हुए सूर्य की वंदना की जाती है
अर्घ्य का सही समय और विधि
- इस दिन बांस के सूप और दौरे में ठेकुआ, फल, कसार और मौसमी प्रसाद सजाए जाते हैं
। - 15 नवंबर को शाम के समय (लगभग 5:30 से 5:45 बजे के आसपास, स्थानीय समयानुसार) जल में खड़े होकर अस्ताचलगामी सूर्य को पहला अर्घ्य अर्पित किया जाता है
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चौथा दिन: उषा अर्घ्य, पारण और सूर्योदय का समय (16 नवंबर 2026, सोमवार)
चार दिवसीय इस लोक आस्था के महापर्व का समापन चौथे दिन 16 नवंबर 2026 (सोमवार) को होता है
उदीयमान (उगते) सूर्य को अर्घ्य देने की विधि
- सुबह के समय (लगभग 6:35 से 6:45 बजे के आसपास सूर्योदय के समय) व्रती और उनके परिवारजन पुनः नदी या तालाब के घाट पर इकट्ठा होते हैं
। - क्षितिज पर उगते हुए सूर्य को दूध और जल से दूसरा अर्घ्य दिया जाता है तथा परिवार की सुख-समृद्धि की कामना की जाती है
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व्रत का पारण (व्रत खोलने के नियम)
अर्घ्य संपन्न होने के बाद घाट पर छठ कथा सुनी जाती है
छठ पूजा के मुख्य नियम और सावधानियां
छठ महापर्व अपनी कठिन साधना और कड़े अनुशासन के लिए पूरी दुनिया में जाना जाता है। इस व्रत में जितनी निष्ठा और भक्ति की आवश्यकता होती है, उतनी ही सावधानी और पवित्रता की भी ज़रूरत होती है। मान्यता है कि छठ मैया की पूजा में छोटी सी भूल भी स्वीकार्य नहीं होती, इसलिए व्रतियों और उनके परिवारजनों को विशेष नियमों का पालन करना पड़ता है।
1. सफाई और स्वच्छता से जुड़े कड़े नियम
- नहाय-खाय से पहले ही पूरे घर और विशेषकर रसोईघर की दीप-सफाई की जाती है। जिस चूल्हे पर प्रसाद बनना है, उसे पूरी तरह से पवित्र किया जाता है।
- छठ पर्व की शुरुआत (नहाय-खाय) से लेकर पारण तक घर में लहसुन, प्याज या किसी भी प्रकार का तामसिक भोजन पकाना व खाना पूरी तरह वर्जित रहता है।
- प्रसाद बनाते समय या पूजा की सामग्री को छूने से पहले हाथ-पैर अच्छे से धोना अनिवार्य है। बिना स्नान किए या अशुद्ध हाथों से पूजा का कोई भी सामान नहीं छूना चाहिए।
2. पूजा के बर्तनों और वस्त्रों का रखरखाव
- अर्घ्य देने के लिए मुख्य रूप से बांस से बने सूप और दौरा (दौरी) का उपयोग होता है। ये एकदम नए और साफ होने चाहिए। इन्हें कभी भी जमीन पर सीधा नहीं रखा जाता, बल्कि साफ कपड़े या आसन पर रखा जाता है।
- व्रती को चारों दिन बिना सिले हुए नए सूती या रेशमी वस्त्र धारण करने चाहिए (जैसे बिना सिलाई की साड़ी या धोती)। पूजा के कपड़ों को सामान्य कपड़ों के साथ नहीं धोया जाता।
- अर्घ्य देने या प्रसाद बनाने के लिए तांबे, पीतल या मिट्टी के बर्तनों को शुभ माना जाता है। स्टील या प्लास्टिक के बर्तनों का प्रयोग वर्जित रहता है।
3. भूलकर भी न की जाने वाली गलतियां
- छठ पूजा के लिए बन रहे ठेकुआ या खीर का प्रसाद बनाते समय उसे बिना छठी मैया को भोग लगाए न तो खुद चखें और न ही बच्चों को दें।
- पर्व के दौरान घर के किसी भी सदस्य द्वारा मांसाहार, मदिरा या सिगरेट/तंबाकू का सेवन सख्त मना होता है।
- बच्चे अनजाने में पूजा की सामग्री या प्रसाद को जूठा न कर दें, इसलिए सामग्री को बच्चों की पहुंच से दूर और किसी ऊंचे व साफ स्थान पर रखें।
- व्रत रखने वाले श्रद्धालुओं को इन चार दिनों के दौरान बिस्तर या गद्दे पर सोने के बजाय जमीन पर चटाई या कंबल बिछाकर सोना चाहिए।
छठ पूजा केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि शारीरिक और मानसिक शुद्धि का महायज्ञ है। इन नियमों का सही ढंग से पालन करने से ही व्रत पूर्ण और सफल माना जाता है।
छठ पूजा का महत्व: सूर्य देव और छठी मैया की कृपा
लोक आस्था का महापर्व छठ केवल एक अनुष्ठान मात्र नहीं है, बल्कि यह अध्यात्म, प्रकृति प्रेम और अटूट विश्वास का एक अनूठा संगम है। इस पर्व का धार्मिक, पौराणिक और सामाजिक दृष्टिकोण से अत्यधिक महत्व है। आइए जानते हैं छठ पूजा से जुड़े मुख्य आध्यात्मिक और पौराणिक पहलुओं के बारे में:
सूर्य देव और छठी मैया की पूजा का पौराणिक महत्व
- सनातन संस्कृति में भगवान सूर्य को एकमात्र ऐसे देवता माना जाता है जो प्रत्यक्ष रूप से अपने दर्शन देते हैं। सूर्य देव को ऊर्जा, तेज, आयु, स्वास्थ्य और प्रकाश का प्रतीक माना जाता है। मान्यता है कि सूर्य की आराधना से व्यक्ति को जीवन में कभी भी ऊर्जा और आरोग्य की कमी नहीं होती।
- पौराणिक ग्रंथों और मान्यताओं के अनुसार, छठी मैया को ब्रह्मा जी की मानस पुत्री और प्रकृति की अधिष्ठात्री देवी माना जाता है। इन्हें बच्चों की रक्षा करने वाली, उन्हें लंबी आयु, अच्छा स्वास्थ्य व सौभाग्य प्रदान करने वाली देवी कहा जाता है।
संतान प्राप्ति, आरोग्य और सुख-समृद्धि से जुड़ी धार्मिक मान्यताएं
- छठ व्रत मुख्य रूप से माताएं अपनी संतान की रक्षा, अच्छे स्वास्थ्य, दीर्घायु और उज्जवल भविष्य के लिए रखती हैं। ऐसी दृढ़ मान्यता है कि जो माताएं सच्चे मन से यह 36 घंटे का कठिन निर्जला व्रत रखती हैं, छठी मैया उनके बच्चों के जीवन से सभी संकटों को दूर रखती हैं।
- धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, जिन परिवारों में संतान सुख नहीं होता, वे यदि पूरी निष्ठा और पवित्रता के साथ छठ व्रत का संकल्प लें और अनुष्ठान करें, तो छठी मैया उनकी झोली भर देती हैं। यही कारण है कि इस पर्व पर मन्नत पूरी होने पर विशेष रूप से दंडि मार्च और भव्य आयोजन किए जाते हैं।
- विज्ञान और अध्यात्म दोनों दृष्टियों से सूर्य की किरणों का विशेष महत्व है। अर्घ्य देने के दौरान जब व्रती जल में खड़े होकर सूर्य की उपासना करते हैं, तो उन्हें सूर्य की सकारात्मक ऊर्जा और प्राकृतिक विटामिन-डी प्राप्त होता है, जिससे शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता मजबूत होती है और मानसिक शांति मिलती है।
छठ पूजा का यह महापर्व हमें यह सिखाता है कि प्रकृति के संसाधनों—विशेषकर जल, सूर्य और अन्न—के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करना ही हमारे जीवन को सुखी और समृद्ध बनाता है।
छठ पूजा का मुख्य प्रसाद और पूजन सामग्री लिस्ट
छठ महापर्व में प्रसाद और पूजन सामग्री की शुद्धता और विशिष्टता का बहुत बड़ा स्थान है। इस पर्व में उपयोग होने वाली अधिकांश सामग्रियां पूरी तरह से प्राकृतिक, मौसमी और शुद्ध होती हैं, जो प्रकृति और किसानों के प्रति कृतज्ञता को दर्शाती हैं। छठ पूजा की थाली और टोकरी में निम्नलिखित मुख्य प्रसाद और सामग्री शामिल होते हैं:
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मुख्य प्रसाद और खाद्य सामग्री
- ठेकुआ छठ पूजा का सबसे मुख्य और प्रसिद्ध प्रसाद है। इसे गेहूं के आटे, शुद्ध घी और गुड़ (या चीनी) से बहुत ही पवित्रता के साथ तैयार किया जाता है।
- नए चावल के आटे और गुड़ या चीनी से बने कसार के लड्डू इस पर्व का एक अन्य महत्वपूर्ण प्रसाद हैं।
- सुथनी एक प्रकार का कंदमूल है जो जमीन के अंदर उगता है और इसे बहुत शुभ माना जाता है। इसके साथ ही बड़े आकार का पीला 'डाभ नींबू' भी पूजन सामग्री में अनिवार्य रूप से शामिल किया जाता है।
- पानी वाला नारियल (जटा सहित), कच्चा केला, सेब, संतरा, और सिंघाड़ा जैसे ताजे मौसमी फल प्रसाद का अहम हिस्सा होते हैं।
- पत्तों सहित हरा और ताजा गन्ना छठ पूजा का प्रतीक माना जाता है। घाट पर गन्ने का मंडप बनाया जाता है और इसे भगवान सूर्य को अर्पित किया जाता है।
अर्घ्य के लिए बांस का सूप और दौरा का महत्व
छठ पूजा में प्लास्टिक या अन्य कृत्रिम धातुओं के बर्तनों का प्रयोग वर्जित माना जाता है। इसके स्थान पर प्राकृतिक और हस्तनिर्मित बांस की वस्तुओं का विशेष महत्व होता है:-
- संध्या और सुबह अर्घ्य देते समय सभी प्रकार के प्रसाद, फल और दीये बांस के सूप में सजाए जाते हैं। बांस को वंश वृद्धि, पवित्रता और पर्यावरण के अनुकूल माना गया है।
- बांस से बनी बड़ी टोकरी को 'दौरा' कहा जाता है। इसमें सारा प्रसाद और पूजन सामग्री रखकर परिवार के सदस्य सिर या हाथ में उठाकर नदी घाट तक ले जाते हैं।
यह पूरी पूजन सामग्री न केवल धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है, बल्कि यह हमारी पारंपरिक और प्राकृतिक जीवनशैली से भी गहरी जुड़ी हुई है।
अक्सर पूछे जाने वाले अन्य सवाल (FAQs)
Q1: छठ पूजा में बांस के सूप और दौरे (टोकरी) का ही उपयोग क्यों किया जाता है?
उत्तर: धार्मिक मान्यताओं और वैज्ञानिक दृष्टिकोण दोनों लिहाज से बांस के बर्तनों को बहुत पवित्र और शुद्ध माना जाता है। बांस को पर्यावरण-अनुकूल (Eco-friendly) माना जाता है और बांस के पौधे को वंश वृद्धि का प्रतीक माना जाता है। इसके अलावा, पारंपरिक रूप से ग्रामीण भारत में कुम्हारों और दस्तकारों द्वारा बनाए जाने वाले इन प्राकृतिक बर्तनों से स्थानीय कारीगरों को भी बढ़ावा मिलता है।
Q2: यदि कोई महिला गर्भवती है या उसका स्वास्थ्य ठीक नहीं है, तो क्या वह छठ का व्रत रख सकती है?
उत्तर: छठ का व्रत काफी कठिन होता है क्योंकि इसमें लगभग 36 घंटे तक निर्जला (बिना पानी के) रहना पड़ता है। यदि कोई महिला गर्भवती है या स्वास्थ्य संबंधी कोई गंभीर समस्या है, तो शास्त्रों और बुजुर्गों के अनुसार उन्हें सीधे यह कठिन व्रत रखने की सलाह नहीं दी जाती। ऐसे में परिवार की कोई अन्य महिला या संकल्प लेकर दूसरा व्यक्ति व्रत कर सकता है, और गर्भवती महिला केवल पूजा-अर्चना व प्रसाद वितरण में सहयोग कर सकती है।
Q3: छठ पूजा का मुख्य प्रसाद 'ठेकुआ' कैसे बनता है और इसका क्या महत्व है?
उत्तर: ठेकुआ छठ पर्व का सबसे मुख्य और पवित्र प्रसाद है। इसे गेहूं के आटे, शुद्ध घी, और गुड़ (या चीनी) के मिश्रण से तैयार किया जाता है। कई जगहों पर इसमें सूखे मेवे (ड्राई फ्रूट्स) भी मिलाए जाते हैं। इसे बहुत ही पवित्रता के साथ पारंपरिक सांचे या हाथों से आकार देकर घी या ठेवे में तला जाता है। छठी मैया को यह प्रसाद अत्यंत प्रिय माना जाता है।
Q4: छठ पूजा केवल महिलाओं द्वारा ही की जाती है या पुरुष भी यह व्रत रख सकते हैं?
उत्तर: आम तौर पर लोग यही सोचते हैं कि छठ का व्रत केवल महिलाएं रखती हैं, लेकिन यह एक आम धारणा है। नियम और निष्ठा पूरी होने पर पुरुष (व्रती) भी छठ का यह कठिन उपवास रख सकते हैं। कई पुरुष और परिवार मिलकर भी इस लोक आस्था के महापर्व में समान रूप से व्रत का पालन करते हैं।
Q5: यदि किसी कारणवश व्रतः के दौरान कोई अपशकुन हो जाए या नियम टूट जाए, तो क्या करना चाहिए?
उत्तर: छठ पूजा में शुद्धता और नियमों का विशेष ध्यान रखा जाता है। यदि अनजाने में कोई त्रुटि या नियम टूट जाए, तो तुरंत छठी मैया और सूर्य देव से क्षमा प्रार्थना (क्षमापना) करनी चाहिए। मन में पूरी श्रद्धा और सच्चे प्रायश्चित भाव के साथ भगवान से प्रार्थना करने पर मैया भक्तों की भूल को क्षमा कर देती हैं।
निष्कर्ष
छठ महापर्व केवल एक धार्मिक अनुष्ठान या परंपरा मात्र नहीं है, बल्कि यह प्रकृति, अनुशासन, समानता और अटूट मानवीय आस्था का सबसे बड़ा संदेश है। आधुनिक भागदौड़ भरी जिंदगी में यह पर्व हमें हमारी जड़ों, पर्यावरण और उन प्राकृतिक संसाधनों (सूर्य, जल, वायु और अन्न) से जोड़ता है जिनके बिना जीवन की कल्पना भी असंभव है। वर्ष 2026 में 13 नवंबर से 16 नवंबर तक मनाया जाने वाला यह महापर्व सभी के जीवन में सुख, शांति, आरोग्य और समृद्धि लेकर आए। छठी मैया और सूर्य देव की कृपा से हर घर में खुशियों का उजाला हो।
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छठ पूजा 2026 कब है? जानें सही तिथि, नियम और अर्घ्य का समय
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