बसौड़ा 2027 कब है? जानें शीतला अष्टमी की तारीख, पूजा विधि, शुभ मुहूर्त और धार्मिक महत्व

हिंदू धर्म में शीतला अष्टमी का पर्व माता शीतला को समर्पित एक महत्वपूर्ण धार्मिक अवसर है। इस पर्व को कई क्षेत्रों में बसौड़ा या बसौड़ा अष्टमी के नाम से भी जाना जाता है। विशेष रूप से राजस्थान, गुजरात, मध्य प्रदेश और उत्तर भारत के कई हिस्सों में शीतला अष्टमी के दिन माता शीतला की विधि-विधान से पूजा की जाती है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, माता शीतला आरोग्य, शीतलता और परिवार की सुख-समृद्धि से जुड़ी देवी हैं। इसलिए श्रद्धालु इस दिन माता शीतला से परिवार के सदस्यों के अच्छे स्वास्थ्य और सुख-शांति की कामना करते हैं।

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वर्ष 2027 में शीतला अष्टमी यानी बसौड़ा का पर्व 30 मार्च 2027, मंगलवार को मनाया जाएगा। यह पर्व चैत्र मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को मनाया जाता है। शीतला अष्टमी की तिथि और पूजा का समय जानना इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि हिंदू पंचांग के अनुसार तिथि का प्रारंभ और समापन दिन के अलग-अलग समय पर हो सकता है। ऐसे में पूजा के लिए स्थानीय पंचांग के अनुसार शुभ समय देखना उचित माना जाता है। बसौड़ा के पर्व से जुड़ी एक प्रमुख परंपरा बासी भोजन से संबंधित है। कई स्थानों पर शीतला अष्टमी से एक दिन पहले भोजन तैयार किया जाता है और अगले दिन माता शीतला को उसका भोग लगाया जाता है। इसी कारण इस पर्व को बसौड़ा कहा जाता है। 

हालांकि, भोजन की परंपरा क्षेत्र और परिवार की मान्यताओं के अनुसार अलग-अलग हो सकती है। इस लेख में हम बसौड़ा 2027 की सही तारीख और वार, शीतला अष्टमी की तिथि, तिथि शुरू और समाप्त होने का समय, शीतला माता की पूजा का शुभ मुहूर्त, पूजा विधि, पूजा सामग्री, व्रत से जुड़ी मान्यताएं और इस पर्व का धार्मिक महत्व विस्तार से जानेंगे। यदि आप 2027 में शीतला माता का व्रत और पूजन करने की तैयारी कर रहे हैं, तो यह जानकारी आपके लिए उपयोगी रहेगी।

शीतला अष्टमी की पूजा सामग्री

शीतला अष्टमी यानी बसौड़ा के दिन माता शीतला की पूजा श्रद्धा और विधि-विधान से की जाती है। इस दिन पूजा के साथ माता को बासी भोजन का भोग लगाने की परंपरा भी कई क्षेत्रों में प्रचलित है। पूजा की सामग्री पहले से तैयार कर लेने से पूजा के समय किसी प्रकार की परेशानी नहीं होती। क्षेत्र और परिवार की परंपरा के अनुसार सामग्री में थोड़ा अंतर हो सकता है।

शीतला अष्टमी की पूजा सामग्री

शीतला माता की पूजा के लिए मुख्य सामग्री इस प्रकार रख सकते हैं

  • माता शीतला की तस्वीर या प्रतिमा
  • रोली और कुमकुम
  • हल्दी
  • अक्षत यानी चावल
  • मौली या कलावा
  • फूल और फूलों की माला
  • दीपक और घी/तेल
  • धूप या अगरबत्ती
  • कपूर
  • नैवेद्य और प्रसाद
  • फल और मिठाई
  • जल से भरा कलश
  • पान और सुपारी
  • नारियल
  • गुड़
  • गेहूं या अन्य अनाज, स्थानीय परंपरा के अनुसार
  • दही और ठंडे भोजन की सामग्री
  • बासी भोजन का भोग, जहां यह परंपरा प्रचलित हो

बसौड़ा के भोग में कई घरों में एक दिन पहले बनाए गए व्यंजन जैसे पूड़ी, पकौड़ी, मीठे चावल, दही, राबड़ी, गुड़ आदि तैयार किए जाते हैं। हालांकि, बासी भोजन का सेवन और भोग लगाने की परंपरा अलग-अलग क्षेत्रों में अलग हो सकती है। इसलिए अपने परिवार की परंपरा और स्थानीय मान्यता के अनुसार ही भोग तैयार करना उचित है।

बसौड़ा 2027 की पूजा विधि

  • बसौड़ा यानी शीतला अष्टमी के दिन माता शीतला की पूजा श्रद्धा और विधि-विधान से करने की परंपरा है। इस दिन कई घरों में एक दिन पहले भोजन बनाकर रखा जाता है और शीतला अष्टमी के दिन माता को उसी भोजन का भोग लगाया जाता है। पूजा की विधि क्षेत्र और परिवार की परंपरा के अनुसार थोड़ी अलग हो सकती है। सामान्य रूप से शीतला माता की पूजा इस क्रम से की जा सकती है।
  • शीतला अष्टमी के दिन सुबह जल्दी उठकर स्नान करें और स्वच्छ वस्त्र धारण करें। इसके बाद घर और पूजा स्थल की साफ-सफाई करके माता शीतला की पूजा की तैयारी करें।
  • एक साफ चौकी या स्थान पर शीतला माता की तस्वीर या प्रतिमा स्थापित करें। इसके सामने जल से भरा कलश रखें और पूजा की सभी सामग्री व्यवस्थित कर लें।
  • हाथ में जल लेकर माता शीतला का ध्यान करें और परिवार के अच्छे स्वास्थ्य, सुख-शांति और समृद्धि की प्रार्थना करें।
  • माता शीतला को रोली, कुमकुम, हल्दी और अक्षत अर्पित करें। इसके बाद माता को फूल और माला चढ़ाएं।
  • पूजा स्थल पर दीपक जलाएं और धूप या अगरबत्ती अर्पित करें। इसके बाद माता शीतला की श्रद्धापूर्वक पूजा करें।
  • बसौड़ा की पूजा में भोग का विशेष महत्व माना जाता है। जिन परिवारों में बासी भोजन की परंपरा है, वहां एक दिन पहले तैयार किए गए भोजन को माता को भोग के रूप में अर्पित किया जाता है। भोग में पूड़ी, दही, मीठे व्यंजन, गुड़ और अन्य पारंपरिक पकवान शामिल किए जा सकते हैं।
  • पूजा के बाद शीतला माता की व्रत कथा का श्रवण या पाठ करें। कथा के दौरान माता से परिवार के सदस्यों के स्वास्थ्य और सुख-शांति की कामना करें।
  • अंत में शीतला माता की आरती करें और परिवार के सभी सदस्यों के लिए मंगलकामना करें। आरती के बाद माता को प्रणाम करके प्रसाद ग्रहण करें।
  • पूजा पूर्ण होने के बाद माता का भोग प्रसाद के रूप में परिवार के सदस्यों और अन्य श्रद्धालुओं में बांटा जा सकता है।

शीतला अष्टमी की पूजा और बासी भोजन से जुड़ी परंपराएं अलग-अलग क्षेत्रों में भिन्न हो सकती हैं। इसलिए पूजा करते समय अपने परिवार की परंपरा और स्थानीय मान्यताओं का पालन करना उचित है।

बसौड़ा पर बासी भोजन क्यों खाया जाता है?

बसौड़ा यानी शीतला अष्टमी के पर्व की सबसे प्रमुख परंपराओं में से एक एक दिन पहले भोजन बनाना और अगले दिन उसी भोजन का सेवन करना है। इसी कारण इस पर्व का नाम कई क्षेत्रों में बसौड़ा पड़ा है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, शीतला माता को शीतलता और आरोग्य की देवी माना जाता है। इसलिए शीतला अष्टमी के दिन घर में चूल्हा जलाने के बजाय पहले से तैयार किए गए भोजन का माता को भोग लगाया जाता है। परंपरा के अनुसार, शीतला अष्टमी से एक दिन पहले यानी सप्तमी के दिन घर में अलग-अलग प्रकार के पकवान बनाए जाते हैं। इन पकवानों में पूड़ी, दही, मीठे चावल, पुआ, पकौड़ी, राबड़ी और अन्य पारंपरिक व्यंजन शामिल हो सकते हैं। भोजन तैयार करने के बाद उसे सुरक्षित और स्वच्छ तरीके से रखा जाता है। 

                               बसौड़ा पर बासी भोजन क्यों खाया जाता है?

    अगले दिन अष्टमी के अवसर पर सबसे पहले माता शीतला को इसका भोग अर्पित किया जाता है और फिर परिवार के लोग प्रसाद के रूप में भोजन ग्रहण करते हैं। शीतला अष्टमी के दिन चूल्हा न जलाने की परंपरा भी इसी मान्यता से जुड़ी हुई है। माना जाता है कि इस दिन अग्नि से बने ताजे भोजन के बजाय शीतल यानी पहले से तैयार भोजन का सेवन किया जाना चाहिए। यह परंपरा माता शीतला के शीतल स्वरूप का प्रतीक भी मानी जाती है। हालांकि, आज के समय में भोजन की स्वच्छता और सुरक्षित भंडारण का विशेष ध्यान रखना जरूरी है। पुराने समय में मौसम, भोजन और उसे रखने के तरीकों की परिस्थितियाँ अलग थीं। इसलिए बासी भोजन का सेवन केवल तभी करना चाहिए जब वह सुरक्षित तरीके से रखा गया हो और खराब होने के कोई संकेत न हों। बच्चों, बुजुर्गों या कमजोर पाचन वाले लोगों के लिए विशेष सावधानी रखना उचित है।

    इस प्रकार बसौड़ा की परंपरा केवल भोजन से जुड़ी हुई नहीं है, बल्कि इसके पीछे माता शीतला के प्रति श्रद्धा, शीतलता की भावना और पुरानी पारिवारिक एवं सामाजिक परंपराओं का भी महत्व है।

    शीतला माता और बसौड़ा की पौराणिक कथा

    शीतला माता को हिंदू धर्म में आरोग्य, शीतलता और रोगों से रक्षा करने वाली देवी के रूप में पूजा जाता है। शीतला माता से जुड़ी अनेक लोककथाएं और धार्मिक मान्यताएं अलग-अलग क्षेत्रों में प्रचलित हैं। विशेष रूप से बसौड़ा और शीतला अष्टमी के अवसर पर माता की कथा सुनने और उनका स्मरण करने की परंपरा है।

    शीतला माता और बसौड़ा की पौराणिक कथा

    एक प्रसिद्ध लोककथा के अनुसार, एक गांव में शीतला माता एक वृद्ध महिला का रूप धारण करके पहुंचीं। वह लोगों के घरों में गईं और शीतल भोजन तथा माता की पूजा से जुड़ी परंपराओं का पालन करने की बात कही। लेकिन गांव के लोगों ने उनका उचित सम्मान नहीं किया। इसके बाद गांव में अनेक प्रकार की परेशानियां और रोग फैलने लगे। जब लोगों को अपनी भूल का एहसास हुआ, तो उन्होंने माता शीतला की श्रद्धापूर्वक पूजा की और उनसे क्षमा मांगी। माता प्रसन्न हुईं और गांव के लोगों को सुख-शांति तथा आरोग्य का आशीर्वाद दिया। यह कथा इस बात का प्रतीक मानी जाती है कि श्रद्धा, स्वच्छता और संयम के साथ माता की पूजा करने से जीवन में शांति और मंगल की भावना आती है।

    एक अन्य धार्मिक मान्यता में शीतला माता को भगवान शिव के परिवार और देवी शक्ति के स्वरूप से जोड़ा जाता है। माता के हाथों में झाड़ू, कलश और शीतल जल जैसी वस्तुओं का वर्णन मिलता है। इन प्रतीकों को स्वच्छता, शीतलता और रोगों से बचाव की भावना से जोड़ा जाता है। हालांकि, शीतला माता से जुड़ी कथाओं के अलग-अलग क्षेत्रीय रूप मिलते हैं। इसलिए इन कथाओं को धार्मिक और लोकपरंपरा के रूप में समझना चाहिए। बसौड़ा के अवसर पर इन कथाओं का श्रवण श्रद्धालुओं को माता के प्रति आस्था और अपनी परंपराओं से जुड़ने का अवसर देता है।

    बसौड़ा का धार्मिक महत्व

    बसौड़ा या शीतला अष्टमी का पर्व धार्मिक दृष्टि से विशेष महत्व रखता है। 

    • इस दिन श्रद्धालु शीतला माता की पूजा करके परिवार के अच्छे स्वास्थ्य, सुख-शांति और समृद्धि की कामना करते हैं। 
    • धार्मिक मान्यता है कि माता शीतला की आराधना करने से परिवार पर उनकी कृपा बनी रहती है और रोगों से रक्षा होती है। 
    • इस पर्व का संबंध शीतलता और आरोग्य से भी माना जाता है। 
    • शीतला माता के पूजन में ठंडे जल, शीतल भोजन और स्वच्छता को विशेष स्थान दिया जाता है। 
    • कई परिवारों में अष्टमी के दिन चूल्हा नहीं जलाया जाता और सप्तमी के दिन तैयार किए गए भोजन का माता को भोग लगाया जाता है। 
    • यह परंपरा माता के शीतल स्वरूप के प्रति श्रद्धा को दर्शाती है।
    • बसौड़ा के अवसर पर महिलाएं विशेष रूप से माता शीतला की पूजा और व्रत करती हैं तथा अपने परिवार के सदस्यों की सुख-समृद्धि और आरोग्य की प्रार्थना करती हैं। 
    • कई स्थानों पर परिवार के लोग सामूहिक रूप से माता के मंदिर में जाकर पूजा-अर्चना करते हैं और प्रसाद चढ़ाते हैं।
    • धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, शीतला माता की पूजा करने से परिवार में सुख-शांति, समृद्धि और स्वास्थ्य बना रहता है। 
    • हालांकि, ये धार्मिक आस्थाएं और लोकविश्वास हैं; इन्हें वैज्ञानिक चिकित्सा का विकल्प नहीं माना जाना चाहिए।

    इस प्रकार बसौड़ा केवल एक धार्मिक पर्व नहीं, बल्कि आस्था, पारिवारिक परंपरा, स्वच्छता और आरोग्य की भावना से जुड़ा महत्वपूर्ण अवसर है। यह पर्व लोगों को अपनी संस्कृति और धार्मिक परंपराओं से जुड़ने का अवसर भी प्रदान करता है।

    बसौड़ा पर क्या करें और क्या न करें?

    बसौड़ा यानी शीतला अष्टमी के दिन माता शीतला की पूजा करने के साथ कई पारंपरिक नियमों का पालन किया जाता है। इन नियमों का संबंध मुख्य रूप से शीतलता, स्वच्छता, पूजा-पाठ और एक दिन पहले तैयार किए गए भोजन से होता है। अलग-अलग क्षेत्रों और परिवारों में इन परंपराओं में कुछ अंतर भी देखने को मिलता है। इसलिए बसौड़ा के दिन अपने परिवार की मान्यताओं और स्थानीय परंपरा के अनुसार पूजा करना उचित माना जाता है।

    बसौड़ा पर क्या करें?

    • सुबह स्नान करके स्वच्छ वस्त्र पहनें और शीतला माता की पूजा करें। माता को रोली, अक्षत, फूल, धूप, दीप और नैवेद्य अर्पित करें।
    • कई क्षेत्रों में बसौड़ा से एक दिन पहले, यानी सप्तमी के दिन भोजन और पारंपरिक पकवान बनाए जाते हैं। अगले दिन इन्हीं पकवानों का माता को भोग लगाया जाता है।
    • परिवार की परंपरा के अनुसार पूड़ी, दही, मीठे चावल, पुआ, पकौड़ी, राबड़ी और अन्य पारंपरिक व्यंजन भोग में रखे जा सकते हैं।
    • शीतला माता की पूजा में स्वच्छता का विशेष महत्व माना जाता है। इसलिए पूजा से पहले घर और पूजा स्थल को अच्छी तरह साफ करना चाहिए।
    • पूजा के दौरान परिवार के सभी सदस्यों के अच्छे स्वास्थ्य, सुख-शांति और समृद्धि की कामना करें।
    • पूजा के बाद शीतला माता की कथा सुनें या पढ़ें और अंत में माता की आरती करके प्रसाद ग्रहण करें।

    बसौड़ा पर क्या न करें?

    • जिन परिवारों में बसौड़ा के दिन चूल्हा न जलाने की परंपरा है, वहां अष्टमी के दिन भोजन पकाने के बजाय एक दिन पहले भोजन तैयार किया जाता है।
    • धार्मिक परंपरा के अनुसार इस दिन बासी या पहले से तैयार शीतल भोजन का भोग लगाया जाता है। हालांकि, यह नियम सभी क्षेत्रों में समान नहीं है।
    • बासी भोजन की धार्मिक परंपरा का अर्थ खराब भोजन खाना नहीं है। यदि भोजन में दुर्गंध, स्वाद या रंग में बदलाव हो अथवा वह खराब दिखाई दे, तो उसका सेवन नहीं करना चाहिए। भोजन को सुरक्षित तरीके से रखना आवश्यक है।
    • पूजा स्थल, पूजा सामग्री और भोजन को साफ-सुथरा रखें। पूजा करते समय स्वच्छता का ध्यान रखें।
    • बसौड़ा का मुख्य उद्देश्य श्रद्धा और धार्मिक आस्था से माता शीतला का स्मरण करना है। इसलिए पूजा शांत मन और श्रद्धा के साथ करनी चाहिए।
    • बसौड़ा की पूजा और भोजन से जुड़े नियम अलग-अलग स्थानों पर अलग हो सकते हैं। इसलिए किसी दूसरी जगह की परंपरा को अपने परिवार की परंपरा पर अनिवार्य रूप से लागू नहीं करना चाहिए।

    बसौड़ा के दिन चूल्हा न जलाने और बासी भोजन खाने की परंपरा धार्मिक मान्यता है। स्वास्थ्य की दृष्टि से भोजन को सुरक्षित रखना सबसे महत्वपूर्ण है। विशेषकर गर्म मौसम में भोजन लंबे समय तक सामान्य तापमान पर रखा हो तो उसे खाने से बचना चाहिए।

    बसौड़ा 2027 से जुड़े महत्वपूर्ण FAQ

    1. बसौड़ा पर बासी भोजन क्यों खाया जाता है?

    धार्मिक मान्यता के अनुसार शीतला माता को शीतलता और आरोग्य की देवी माना जाता है। इसलिए कई क्षेत्रों में सप्तमी के दिन भोजन बनाकर अष्टमी के दिन माता को भोग लगाया जाता है और फिर उसे प्रसाद के रूप में ग्रहण किया जाता है।

    2. बसौड़ा के एक दिन पहले भोजन क्यों बनाया जाता है?

    बसौड़ा के दिन चूल्हा न जलाने की परंपरा के कारण कई परिवार सप्तमी के दिन ही भोजन और पारंपरिक पकवान तैयार कर लेते हैं। अगले दिन इन्हीं पकवानों का माता को भोग लगाया जाता है।

    3. शीतला अष्टमी के दिन चूल्हा क्यों नहीं जलाया जाता?

    धार्मिक परंपरा के अनुसार शीतला अष्टमी के दिन अग्नि पर भोजन नहीं बनाया जाता। इसके बजाय एक दिन पहले तैयार किए गए शीतल भोजन का सेवन किया जाता है।

    4. बसौड़ा की पूजा में कौन-कौन सी सामग्री चाहिए?

    पूजा में शीतला माता की तस्वीर या प्रतिमा, रोली, कुमकुम, हल्दी, अक्षत, फूल, दीपक, धूप, कपूर, जल, फल, मिठाई और परिवार की परंपरा के अनुसार भोग की सामग्री रखी जा सकती है।

    5. बसौड़ा पर शीतला माता की पूजा कैसे की जाती है?

    सुबह स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करें। पूजा स्थल की सफाई करके माता की तस्वीर स्थापित करें। रोली, अक्षत, फूल, धूप और दीप अर्पित करें, शीतल भोजन का भोग लगाएं, माता की कथा सुनें और अंत में आरती करें।

    6. शीतला माता को बसौड़ा पर कौन-कौन से भोग लगाए जाते हैं?

    क्षेत्रीय परंपरा के अनुसार पूड़ी, दही, मीठे चावल, पुआ, पकौड़ी, राबड़ी, गुड़ और अन्य पारंपरिक पकवानों का भोग लगाया जा सकता है।

    7. क्या बसौड़ा के दिन ताजा भोजन बनाया जा सकता है?

    बसौड़ा के दिन ताजा भोजन न बनाने की परंपरा कई क्षेत्रों में प्रचलित है, लेकिन यह सभी परिवारों में समान नहीं है। अपने परिवार और स्थानीय परंपरा के अनुसार इसका पालन किया जाता है। भोजन की स्वच्छता और सुरक्षा का विशेष ध्यान रखना चाहिए।

    8. बसौड़ा पर क्या करना चाहिए?

    इस दिन स्नान करके शीतला माता की पूजा, कथा और आरती करनी चाहिए। माता को भोग लगाकर परिवार के स्वास्थ्य, सुख-शांति और समृद्धि की प्रार्थना करनी चाहिए।

    10. बसौड़ा पर क्या नहीं करना चाहिए?

    धार्मिक मान्यता के अनुसार जिन परिवारों में परंपरा है, वहां इस दिन चूल्हा जलाने और ताजा भोजन पकाने से बचा जाता है। साथ ही पूजा स्थल और भोजन की स्वच्छता का ध्यान रखना चाहिए।

    11. बसौड़ा का धार्मिक महत्व क्या है?

    बसौड़ा को माता शीतला की आराधना और परिवार के आरोग्य, सुख-शांति एवं समृद्धि की कामना से जुड़ा महत्वपूर्ण पर्व माना जाता है।

    12. बसौड़ा पर शीतला माता की कथा क्यों सुनी जाती है?

    धार्मिक मान्यता के अनुसार शीतला माता की कथा सुनने से श्रद्धालु माता के स्वरूप, उनकी महिमा और पर्व से जुड़ी धार्मिक मान्यताओं को समझते हैं तथा परिवार के कल्याण की प्रार्थना करते हैं।

    13. क्या बसौड़ा की पूजा घर पर की जा सकती है?

    हाँ, शीतला माता की पूजा घर पर भी श्रद्धा और अपनी पारिवारिक परंपरा के अनुसार की जा सकती है। पूजा के बाद माता को भोग लगाकर आरती और प्रसाद वितरण किया जाता है।

    14. बसौड़ा 2027 पर किन बातों का विशेष ध्यान रखना चाहिए?

    बसौड़ा के दिन पूजा की सामग्री पहले से तैयार रखें, परिवार की परंपरा के अनुसार भोग बनाएं और भोजन को सुरक्षित तरीके से रखें। धार्मिक परंपराओं के साथ स्वास्थ्य और स्वच्छता का भी ध्यान रखना जरूरी है।

    15. बसौड़ा पर किन लोगों को ठंडा या बासी भोजन खाने से बचना चाहिए?

    बसौड़ा पर बासी या ठंडा भोजन खाने की परंपरा धार्मिक मान्यता से जुड़ी है, लेकिन हर व्यक्ति के लिए लंबे समय तक रखा हुआ भोजन खाना उचित नहीं होता। खासकर छोटे बच्चों, बुजुर्गों, गर्भवती महिलाओं, कमजोर रोग-प्रतिरोधक क्षमता वाले लोगों और जिन लोगों को पाचन संबंधी समस्या रहती है, उन्हें सावधानी रखनी चाहिए। यदि भोजन को सही तरीके से सुरक्षित नहीं रखा गया है, उसमें दुर्गंध आ रही है, स्वाद या रंग बदल गया है अथवा भोजन खराब दिखाई दे रहा है, तो उसे बिल्कुल नहीं खाना चाहिए। 

    निष्कर्ष:-

    माता शीतला की कृपा से आपके जीवन में सुख, शांति, आरोग्य और समृद्धि बनी रहें। बसौड़ा का यह पावन पर्व आपके परिवार के लिए खुशियां और मंगल लेकर आए। माता शीतला सभी को स्वस्थ एवं सुखी जीवन का आशीर्वाद प्रदान करें।

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    लेखक एवं JeevanSetu टीम

    बसौड़ा 2027 और शीतला अष्टमी की हार्दिक शुभकामनाएं!

    जय माता शीतला!


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