भारतीय सनातन संस्कृति में लोक आस्था, प्रकृति प्रेम और सूर्योपासना के महाकुंभ के रूप में यदि किसी पर्व की सबसे बड़ी महिमा है, तो वह 'छठ महापर्व' है। जहाँ देश के अधिकांश पर्व देवी-देवताओं की मूर्तियों की स्थापना, भव्य पंडालों और चमकीले अनुष्ठानों के साथ मनाए जाते हैं, वहीं छठ दुनिया का एकमात्र ऐसा अद्वितीय पर्व है जिसमें किसी मूर्ति की नहीं, बल्कि सीधे प्रत्यक्ष देवता—भगवान भास्कर (सूर्य देव) और प्रकृति की अधिष्ठात्री देवी षष्ठी (छठी मैया) की आराधना की जाती है। साल में दो बार मनाए जाने वाले इस महापर्व—कार्तिक मास और चैत्र मास के शुक्ल पक्ष—में कार्तिक छठ का विशेष और अलौकिक महत्व है। लेकिन इन सबके बीच हर श्रद्धालु के मन में यह जिज्ञासा जरूर उठती है कि आखिर इस कठिन 36 घंटे के निर्जला अनुष्ठान और लोक-आस्था की यह प्राचीन परंपरा आज से हजारों साल पहले कैसे शुरू हुई थी? क्या इसकी जड़ें सीधे पौराणिक युग और वेदों से जुड़ी हैं?
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छठ पूजा की प्राचीनता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि इसका कोई निश्चित आधुनिक इतिहास नहीं मिलता, बल्कि इसका उल्लेख सीधे तौर पर हिंदू धर्म के महाकाव्यों—महाभारत और रामायण—के काल से चला आ रहा है। इतिहासकार और धर्मशास्त्री मानते हैं कि यह पर्व आर्यों के वैदिक काल से भी बहुत पहले से हमारी संस्कृति का हिस्सा रहा है, जब ऋषि-मुनि जंगलों में रहकर प्रकृति के पांचों तत्वों (जल, वायु, अग्नि, पृथ्वी और आकाश) की साधना करते थे। ऋग्वेद में भी सूर्य देव की स्तुति के कई ऐसे मंत्र मिलते हैं जो सीधे तौर पर स्वास्थ्य, तेज और दीर्घायु की कामना से जुड़े हैं। समय के साथ-साथ यह पर्व आम जनमानस की लोक परंपराओं में इस तरह घुल-मिल गया कि आज यह बिहार, झारखंड और पूर्वी उत्तर प्रदेश की सांस्कृतिक पहचान बन चुका है, जो अब पूरी दुनिया में अपनी कठोर साधना और अनुशासन के लिए जाना जाता है।
इस लेख में हम इसी प्राचीन रहस्य से पर्दा उठाएंगे और विस्तार से जानेंगे कि युगों-युगों से चली आ रही इस महान परंपरा की शुरुआत वास्तव में कैसे हुई थी और इसके पीछे कौन-कौन सी पौराणिक मान्यताएं जुड़ी हुई हैं। यदि आप भी छठी मैया के इस पावन इतिहास और इसकी कहानियों को गहराई से समझना चाहते हैं, तो आगे की कथाएं आपके मन में इस पर्व के प्रति श्रद्धा और विश्वास को और अधिक प्रगाढ़ कर देंगी।
छठ पूजा का इतिहास: सतयुग से लेकर द्वापर युग तक की यात्रा
भारतीय सनातन संस्कृति में छठ महापर्व केवल एक आधुनिक लोक उत्सव मात्र नहीं है, बल्कि इसकी जड़ें युगों-युगों पुरानी उस दिव्य साधना से जुड़ी हैं जो सतयुग से लेकर त्रेता और द्वापर युग तक निरंतर प्रवाहित होती रही है। ऐतिहासिक और पौराणिक ग्रंथों के अनुसार, प्रकृति और सूर्य की यह उपासना सनातन काल से चली आ रही है, जिसे विभिन्न युगों में महान ऋषि-मुनियों, राजाओं और आराध्यों द्वारा निभाया गया।
पहली पौराणिक कथा: महाभारत काल में कर्ण की सूर्य भक्ति
छठ महापर्व के इतिहास और इसकी परंपराओं का सबसे गहरा संबंध द्वापर युग और महाभारत काल से जुड़ा हुआ है। इस महान पर्व की सबसे प्रसिद्ध और लोकप्रिय मान्यताओं में से एक संबंध भगवान सूर्य के परम भक्त और दानवीर सूर्यपुत्र कर्ण से है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, अंगराज कर्ण भगवान सूर्य के अनन्य उपासक थे और उनकी कृपा प्राप्त करने के लिए उनकी साधना का तरीका ही आज के छठ व्रत की जल-अर्घ्य परंपरा का मुख्य आधार बना।
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कथा के अनुसार, दानवीर कर्ण प्रतिदिन सुबह घंटों कमर तक पवित्र नदी के जल में खड़े होकर भगवान भास्कर (सूर्य देव) की उपासना करते थे और उन्हें अर्घ्य अर्पित करते थे। उनकी यह कठोर साधना नियम और निष्ठा की पराकाष्ठा थी, जिसमें वे बिना थके घंटों सूर्य की ओर मुख करके जल अर्पित करते थे। जल में खड़े होकर सूर्य को अर्घ्य देने का जो विधान आज छठ पूजा के दौरान तीसरे (संध्या अर्घ्य) और चौथे (उषा अर्घ्य) दिन लाखों व्रतियों द्वारा नदी या तालाब के घाट पर किया जाता है, उसकी शुरुआत का सबसे पहला प्रमाण महाभारत काल में कर्ण की इसी साधना से माना जाता है। सूर्य देव की इस नियमित और कठिन आराधना के फलस्वरूप ही कर्ण को असीम ऊर्जा, तेज, और अजेय शक्ति का वरदान प्राप्त हुआ था। सूर्य देव की कृपा से ही उन्हें अद्भुत कवच और कुंडल प्राप्त हुए थे, जिसके कारण महाभारत के युद्ध में उन्हें परास्त करना असंभव सा था।
भगवान सूर्य की उपासना न केवल उनके शारीरिक और आत्मिक बल को बढ़ाती थी, बल्कि उन्हें समाज में परम दानवीर और महान योद्धा के रूप में स्थापित करती थी। कर्ण की इस कथा से यह स्पष्ट होता है कि सूर्य देव की पूजा केवल एक कर्मकांड नहीं है, बल्कि यह व्यक्ति के जीवन में तेज, आरोग्य, अनुशासन और ऊर्जा का संचार करती है। छठ महापर्व के दौरान जब आज भी लाखों श्रद्धालु जल के भीतर खड़े होकर डूबते और उगते सूर्य को अर्घ्य देते हैं, तो वे प्रत्यक्ष रूप से कर्ण की उसी प्राचीन और पवित्र परंपरा का अनुसरण कर रहे होते हैं। यह प्रसंग हमें सिखाता है कि जो व्यक्ति पूरी निष्ठा और समर्पण के साथ प्रकृति और सूर्य देव की उपासना करता है, उसे जीवन के हर संकट से लड़ने की शक्ति और सफलता अवश्य प्राप्त होती है।
दूसरी पौराणिक कथा: पांडवों का राजपाठ और द्रौपदी का कठिन व्रत
छठ महापर्व की उत्पत्ति और इसकी दिव्यता से जुड़ी एक अन्य अत्यंत महत्वपूर्ण कथा महाभारत के द्वापर युग से जुड़ी है। जब हस्तिनापुर के जुए के खेल में पांडव कौरवों से अपना सारा राजपाठ, वैभव और संपत्ति हार गए थे, तब उन्हें मजबूरन 12 वर्ष का वनवास और 1 साल का अज्ञातवास झेलना पड़ा था। उस विकट और संकटपूर्ण समय में पांडवों का जीवन बेहद कष्टों में बीत रहा था। उनके पास न तो रहने के लिए राज्य था और न ही सुख-सुविधाएं पांडवों के इन असीम कष्टों को देखकर उनके कुल गुरु और महान ऋषि महर्षि धौम्य ने उन्हें संकट से उबरने का मार्ग सुझाया। महर्षि धौम्य ने पांडवों और विशेष रूप से पांचाली (द्रौपदी) को सलाह दी कि यदि वे अपने खोए हुए राज्य, सम्मान और वैभव को पुनः प्राप्त करना चाहते हैं, तो उन्हें प्रत्यक्ष देवता भगवान सूर्य और प्रकृति की शक्ति षष्ठी देवी (छठी मैया) की शरण में जाना चाहिए। उन्होंने द्रौपदी को विधि-विधान के साथ इस कठिन सूर्य व्रत को करने का उपदेश दिया।
गुरु महर्षि धौम्य के उपदेश के अनुसार, द्रौपदी ने पूरी निष्ठा, पवित्रता और अटूट श्रद्धा के साथ कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि को भगवान भास्कर और छठी मैया का यह कठिन व्रत रखा। द्रौपदी ने नदी के जल में खड़े होकर पूरे अनुशासन के साथ सूर्य देव की आराधना की और दोनों समय अस्ताचलगामी तथा उदित सूर्य को अर्घ्य अर्पित किया। उन्होंने अपनी इस कठोर साधना से छठी मैया को प्रसन्न किया, जिससे उनका व्रत पूर्ण हुआ। माँ छठी और सूर्य देव की असीम कृपा से द्रौपदी का यह व्रत सफल हुआ। इस अनुष्ठान के प्रभाव से न केवल पांडवों के जीवन के सभी बड़े संकट टल गए, बल्कि उन्हें अपनी खोई हुई ऊर्जा, बल, मान-सम्मान और अंततः अपना संपूर्ण राजपाठ भी पुनः प्राप्त हो गया। तभी से यह मान्यता और भी अधिक दृढ़ हो गई कि जो भी व्यक्ति सच्चे मन और कठिन नियमों के साथ छठ व्रत का पालन करता है, उसके जीवन के सभी कष्ट दूर होते हैं और उसकी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं।
तीसरी पौराणिक कथा: राजा प्रियंवद और देवी षष्ठी (छठी मैया की उत्पत्ति)
छठ महापर्व की उत्पत्ति और इसके धार्मिक विधान के पीछे की सबसे प्रमुख, प्रामाणिक और चमत्कारी कथा पौराणिक ग्रंथों में राजा प्रियंवद और रानी मालिनी की मिलती है। यह कथा न केवल छठ व्रत के मूल स्वरूप को दर्शाती है, बल्कि यह भी बताती है कि पहली बार धरती पर 'छठी मैया' (षष्ठी देवी) की पूजा का विधान कैसे और क्यों शुरू हुआ था।
पौराणिक कथाओं के अनुसार, प्राचीन काल में स्वायंभुव मनु के पुत्र राजा प्रियंवद अपनी प्रज्ञा, न्यायप्रियता और धर्मपरायणता के लिए पूरी प्रजा में प्रसिद्ध थे। उनके राज्य में किसी भी प्रकार की कमी नहीं थी, प्रजा सुखी और समृद्ध थी। परंतु, राजा प्रियंवद और उनकी पत्नी रानी मालिनी के जीवन में एक बहुत बड़ा और गहरा दुःख था—वे दोनों संतानहीन थे। राजपाट और अपार वैभव होने के बावजूद कोई उत्तराधिकारी न होने के कारण राजा और रानी का मन हमेशा व्यथित और उदास रहता था। इस संतानहीनता के दुख ने उनके जीवन के सारे सुखों को फीका कर दिया था। राजा प्रियंवद अपनी इस हीन भावना और वंश के आगे न बढ़ पाने की चिंता में हर पल घुटते रहते थे। जब राजा और रानी का यह दुःख असहनीय हो गया, तब उनके इस कष्ट को दूर करने के लिए महान ऋषि महर्षि कश्यप उनके दरबार में पधारे। राजा प्रियंवद ने हाथ जोड़कर ऋषि के सामने अपनी सारी व्यथा रखी और संतान प्राप्ति का उपाय पूछा। महर्षि कश्यप ने राजा की पीड़ा को समझते हुए उनकी कामना पूर्ति के लिए पुत्रेष्टि यज्ञ करवाने का निर्णय लिया। महर्षि के मार्गदर्शन और मंत्रोच्चार के साथ पूरे विधि-विधान से यज्ञ संपन्न हुआ। यज्ञ के प्रभाव से रानी मालिनी गर्भवती हो गईं और समय पूरा होने पर उनके घर एक शिशु का जन्म हुआ। लेकिन, राजा और रानी की खुशी उस समय भीषण शोक में बदल गई जब उन्हें पता चला कि रानी ने एक मृत (प्राणहीन) शिशु को जन्म दिया है। इस अघटित घटना से पूरे राजमहल में कोहराम मच गया और राजा प्रियंवद तथा रानी मालिनी अपने मृत बच्चे को छाती से लगाकर विलाप करने लगे।
ब्रह्मा जी की मानस पुत्री 'षष्ठी देवी' (छठी मैया) का प्रकट होना:-
अपने मृत पुत्र के शव को लेकर श्मशान घाट पहुंचे राजा प्रियंवद पुत्र वियोग में इतने दुखी थे कि उन्होंने अपने प्राण त्यागने का निर्णय कर लिया। वे आत्महत्या करने ही वाले थे कि तभी आकाश में एक दिव्य और अलौकिक प्रकाश फैल गया। उस तेजोमय प्रकाश के बीच भगवान ब्रह्मा जी की मानस पुत्री, प्रकृति की अधिष्ठात्री देवी 'षष्ठी देवी' (जिन्हें हम छठी मैया के रूप में जानते हैं) प्रकट हुईं। रोते बिलखते राजा प्रियंवद को देखकर देवी षष्ठी ने करुणा से भर, दिव्य वाणी में कहा— "हे राजन! जो व्यक्ति मेरी शरण में आकर पूरी श्रद्धा और पवित्रता के साथ मेरी पूजा करता है, मैं उसके सभी दुखों को हर लेती हूँ और उसे सौभाग्य तथा संतान सुख प्रदान करती हूँ।" देवी षष्ठी ने अपनी योग शक्ति और आशीर्वाद से उस मृत शिशु के शरीर में प्राण फूंक दिए, जिससे वह बालक जीवित होकर किलकारियां मारने लगा। राजा प्रियंवद की खुशी का ठिकाना नहीं रहा और उन्होंने हाथ जोड़कर देवी षष्ठी की स्तुति की। जिस दिन देवी षष्ठी ने राजा प्रियंवद के मृत बालक को जीवनदान दिया था, वह तिथि कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि थी। इस चमत्कारिक घटना के बाद राजा प्रियंवद ने अपने पूरे राज्य में यह घोषणा करवा दी कि वे अपनी संतान की दीर्घायु और लोक-कल्याण के लिए हर साल कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि को देवी षष्ठी (छठी मैया) और सूर्य देव की पूजा करेंगे। राजा को देखकर उनके राज्य की समस्त प्रजा ने भी विधि-विधान के साथ इस व्रत को करना शुरू कर दिया। ऐसा माना जाता है कि तभी से धरती पर छठ महापर्व की नींव पड़ी और संतान सुख, आरोग्य तथा अखंड सौभाग्य की कामना के साथ यह कठिन अनुष्ठान पीढ़ी-दर-पीढ़ी हमारी संस्कृति का अटूट हिस्सा बन गया।
चौथी पौराणिक कथा: रामराज्य की स्थापना और माता सीता का सूर्य पूजन
छठ महापर्व की पौराणिक परंपराओं और इसके इतिहास में त्रेतायुग की एक और अति महत्वपूर्ण कथा जुड़ी हुई है, जिसका सीधा संबंध भगवान श्री राम और माता सीता से है। यह कथा हमें बताती है कि कैसे त्रेतायुग में भगवान राम के राज्याभिषेक और रावण वध के बाद लगे ब्रह्महत्या के पाप से मुक्ति पाने के लिए सूर्योपासना का अनुष्ठान किया गया था।
रामायण काल के अनुसार, लंका पर ऐतिहासिक विजय प्राप्त करने और अधर्म के प्रतीक रावण का वध करने के बाद, भगवान श्री राम, माता सीता और लक्ष्मण जी के साथ चौदह वर्ष का वनवास पूरा कर अयोध्या लौटे थे। अयोध्या नगरी लौटने पर पूरी प्रजा ने उनका भव्य स्वागत किया था और दीपोत्सव मनाया गया था। चारों तरफ रामराज्य की स्थापना की खुशी मनाई जा रही थी।यह भी पढ़े.........................रंग पंचमी 2027: कब है यह रंगों का त्योहार? जानें तारीख, पूजा विधि और धार्मिक महत्व
यद्यपि रावण का वध धर्म की स्थापना और न्याय के लिए किया गया था, फिर भी शास्त्रों के अनुसार एक ज्ञानी, ब्राह्मण कुल में जन्मे और वेदों के ज्ञाता रावण का वध करने के कारण भगवान श्री राम पर 'ब्रह्महत्या' का पाप लग गया था। इस पाप से मुक्ति पाने और राज्य के कल्याण के लिए कुल गुरु वशिष्ठ और अन्य ऋषियों के परामर्श पर रामेश्वरम में शिवलिंग की स्थापना की गई। इसके साथ ही, महर्षि मुदगल के आश्रम में पहुंचकर विशेष अनुष्ठान करने का निर्णय लिया गया। महर्षि मुदगल के आश्रम में रहकर माता सीता ने ब्रह्महत्या के पाप से मुक्ति पाने और भगवान राम के संकटों को दूर करने के लिए कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष में षष्ठी तिथि को भगवान सूर्य (सूर्य नारायण) और छठी मैया की कठोर आराधना का संकल्प लिया। माता सीता ने लगातार 6 दिनों तक पूरी निष्ठा, पवित्रता और नियमों का पालन करते हुए सूर्य देव की उपासना की। उन्होंने जल में खड़े होकर सूर्य को अर्घ्य दिया और षष्ठी देवी का यह कठिन व्रत पूर्ण किया। माता सीता की इस कठिन सूर्योपासना और व्रत के प्रभाव से ही भगवान राम को ब्रह्महत्या के पाप से मुक्ति मिली और उनके राज्य में सुख, शांति और समृद्धि की स्थापना हुई। तभी से त्रेतायुग की इस परंपरा को बहुत पवित्र माना गया और कार्तिक मास के साथ-साथ चैत्र मास में भी सूर्योपासना व छठ पर्व की यह लोक-आस्था पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ती चली गई।
वैज्ञानिक और ऐतिहासिक दृष्टिकोण: ऋग्वेद में सूर्य पूजा का वर्णन
छठ महापर्व न केवल पौराणिक कथाओं और मध्यकालीन मान्यताओं पर आधारित है, बल्कि इसकी जड़ें सीधे तौर पर विश्व के सबसे प्राचीन धार्मिक ग्रंथ ऋग्वेद और वैदिक काल की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत से जुड़ी हुई हैं। यह मान्यता सिद्ध करती है कि प्रकृति, सूर्य और जल की सामूहिक उपासना की यह परंपरा भारतवर्ष में हज़ारों सालों से चली आ रही है, जब वैदिक ऋषि-मुनि जंगलों में रहकर प्रकृति के पंच तत्वों (जल, वायु, अग्नि, पृथ्वी, और आकाश) के साथ सामंजस्य बिठाकर साधना करते थे। छठ पर्व इसी प्राचीन वैदिक विज्ञान और लोक-आस्था का एक जीवंत और अलौकिक प्रमाण है। हिन्दू धर्म के आधार स्तंभ ऋग्वेद में भगवान सूर्य को प्रत्यक्ष देवता, ब्रह्मांड की ऊर्जा के मुख्य स्रोत, आरोग्य और तेज के प्रदाता के रूप में सर्वोच्च स्थान प्राप्त है। ऋग्वेद में ऐसे कई 'सूक्त' (स्तोत्र) और 'मंत्र' मिलते हैं जो पूरी तरह से सूर्य देव की महिमा, उनके उदय, उनके अस्त होने और उनकी जीवनदायी किरणों की स्तुति से भरे हुए हैं।
सबसे प्रसिद्ध और पवित्र 'गायत्री मंत्र' (ऋग्वेद 3.62.10: "तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्") सीधे तौर पर भगवान सूर्य (सवितृ) के तेज का ध्यान और बुद्धि को प्रकाशित करने की प्रार्थना है। इसके अलावा, ऋग्वेद में सूर्य देव की स्तुति के लिए कई अन्य मंत्र भी हैं, जैसे— 'सूर्यो देवीमुषसं रोचमानां मर्यो न योषामभ्येति पश्चात्...' (ऋग्वेद 1.115), जो उदित सूर्य की रश्मियों और उनके उदय होने की सुंदरता का वर्णन करते हैं। ऋग्वेद के अनुसार, भगवान सूर्य केवल प्रकाश नहीं देते, बल्कि वे पृथ्वी पर जीवन के रक्षक, रोगों को दूर करने वाले (खासकर चर्म रोग और कुष्ठ रोग), और दीर्घायु प्रदान करने वाले हैं। वैदिक ऋषियों ने सूर्य की इस असीम शक्ति को पहचाना था और वे प्रतिदिन उनके उदय और अस्त होने पर उनकी साधना करते थे, जो बाद में 'संध्या उपासना' और छठ पूजा के रूप में जनमानस में लोकप्रिय हुई। वैदिक काल (लगभग 1500 ईसा पूर्व से 600 ईसा पूर्व तक) में, आर्यों के जीवन में प्रकृति का विशेष महत्व था। वे मूर्तियों के बजाय प्रकृति के प्रत्यक्ष और शक्तिशाली तत्वों की पूजा करते थे। उनके लिए जल पवित्र था, सूर्य जीवनदायी ऊर्जा था, और षष्ठी देवी (जिन्हें ऋग्वेद में 'षष्ठी' या प्रकृति की शक्ति माना गया है) संतान और आरोग्य की अधिष्ठात्री थीं। ऋग्वेद के काल में ऋषि-मुनि और साधु-संत प्रतिदिन सुबह और शाम नदी के पवित्र जल में खड़े होकर, डूबते और उगते सूर्य की ओर मुख करके 'अर्घ्य' देते थे और मंत्रोच्चार के साथ उनकी साधना करते थे।
जल में खड़े होकर सूर्य को अर्घ्य देने का विधान वैज्ञानिक दृष्टि से भी बहुत महत्व रखता था, क्योंकि जल की सतह से परावर्तित होकर सूर्य की किरणें सीधे आँखों में पहुँचकर स्वास्थ्य लाभ प्रदान करती थीं। छठ महापर्व के दौरान आज भी लाखों व्रती इसी वैदिक विधान का पालन करते हुए घंटों जल में खड़े रहते हैं और उदित व अस्ताचलगामी सूर्य को अर्घ्य देते हैं। यह परंपरा साबित करती है कि छठ पर्व युगों-युगों से अटूट आस्था, तपस्या और प्रकृति के प्रति कृतज्ञता का सबसे पावन और सबसे पुराना प्रतीक रहा है। इस प्रकार, ऋग्वेद के ऋषियों द्वारा शुरू की गई यह प्राचीन वैदिक सूर्य उपासना की धारा पीढ़ी-दर-पीढ़ी प्रवाहित होती हुई, विभिन्न युगों (सतयुग, त्रेता और द्वापर) में महान विभूतियों के अनुभव और कथाओं के साथ समृद्ध होकर आज के 'छठ महापर्व' के रूप में हमारे सामने है। यह पर्व हमें हमारी प्राचीन वैदिक संस्कृति और प्रकृति के साथ गहरे जुड़ाव की याद दिलाता है।
निष्कर्ष (Conclusion)
छठ महापर्व केवल चार दिनों का एक अनुष्ठान मात्र नहीं है, बल्कि यह सनातन संस्कृति, प्रकृति के प्रति कृतज्ञता और अटूट लोक-आस्था का सबसे जीवंत प्रतीक है। सतयुग के दिव्य अनुष्ठानों से लेकर त्रेतायुग में माता सीता द्वारा मुनि मुदगल के आश्रम में की गई सूर्योपासना, द्वापर युग में दानवीर कर्ण की जल-साधना और द्रौपदी द्वारा पांडवों के संकट निवारण के लिए रखे गए व्रत तक—यह परंपरा युगों-युगों से निरंतर प्रवाहित होती रही है। वैदिक काल के ऋग्वेद में जिन सूर्य सूक्तों और प्राकृतिक ऊर्जा की स्तुति का विधान मिलता है, उसका प्रत्यक्ष दर्शन आज भी छठ के इन पावन दिनों में घाटों पर उमड़ने वाली लाखों श्रद्धालुओं की भीड़ में होता है। आधुनिक युग की भागदौड़ के बीच भी जब लोग मोबाइल और तकनीकी व्यस्तताओं को छोड़कर उगते और डूबते सूर्य को एक साथ अर्घ्य देने के लिए नदी के तट पर एकत्र होते हैं, तो यह इस बात का प्रमाण है कि हमारी प्राचीन सांस्कृतिक जड़ें कितनी गहरी हैं। यह महापर्व हमें यह सिखाता है कि प्रकृति, जल और सूर्य के बिना जीवन की कल्पना नहीं की जा सकती। यही कारण है कि यह पवित्र पर्व पीढ़ी-दर-पीढ़ी हमारी संस्कृति का अटूट हिस्सा बनकर आज भी उतनी ही श्रद्धा और दिव्यता के साथ हमारी आस्था को रोशन कर रहा है।जीवनसेतु टीम की ओर से आप सभी को धन्यवाद!







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