भारतीय सनातन संस्कृति में व्रतों और त्योहारों का विशेष महत्व है, जिनमें माताओं द्वारा अपनी संतान के सुखी जीवन, उत्तम स्वास्थ्य और दीर्घायु की कामना के लिए रखा जाने वाला 'अहोई अष्टमी' का व्रत अत्यंत पवित्र और कठिन व्रतों में से एक माना जाता है। पंचांग के अनुसार, यह व्रत प्रत्येक वर्ष कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को रखा जाता है। यह पर्व ठीक करवा चौथ के चार दिन बाद और दीपावली से आठ दिन पूर्व मनाया जाता है। वर्ष 2026 में अहोई अष्टमी का यह पावन पर्व कब है, इसकी सही तिथि, वार, शुभ मुहूर्त और व्रत से जुड़ी संपूर्ण जानकारी नीचे विस्तार से दी गई है।
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वैदिक पंचांग की गणना के अनुसार, वर्ष 2026 में अहोई अष्टमी का व्रत 1 नवंबर 2026, रविवार के दिन रखा जाएगा। कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि का प्रारंभ 1 नवंबर 2026 को दोपहर 02:51 बजे से होगा और इस तिथि का समापन अगले दिन यानी 2 नवंबर 2026 को दोपहर 01:10 बजे होगा। चूंकि उदया तिथि और व्रत की मुख्य मान्यता के अनुसार पूजा प्रदोष काल (संध्या के समय) में की जाती है, इसलिए यह व्रत 1 नवंबर को ही मान्य होगा। अहोई अष्टमी के दिन माताएं पूरे दिन निर्जला (बिना जल के) व्रत रखती हैं और शाम के समय विधि-विधान से माता अहोई की पूजा-अर्चना करती हैं। वर्ष 2026 में अहोई माता की पूजा का सबसे उत्तम मुहूर्त शाम 05:36 बजे से लेकर शाम 06:54 बजे तक रहेगा। पूजा की कुल अवधि 1 घंटा 18 मिनट की है। इस दौरान माताएं दीवार पर अहोई माता का चित्र बनाकर या कैलेंडर स्थापित कर रोली, चावल, दूध और भाटे (पायरा) से उनकी पूजा करती हैं। पूजा के दौरान अहोई माता की कथा सुनने और सुनाने का विशेष विधान है।
तारों को अर्घ्य और व्रत पारण का समय
अहोई अष्टमी का व्रत सूर्योदय से शुरू होकर रात में तारों के दर्शन करने के बाद ही खोला जाता है। इस दिन चंद्रोदय रात्रि में काफी देर से होता है, इसलिए अधिकांश महिलाएं चंद्रमा की बजाय आकाश में तारे देखकर उन्हें अर्घ्य देती हैं और इसके बाद ही अपना व्रत पारण करती हैं। वर्ष 2026 में तारों को देखने और अर्घ्य देने का मुख्य समय शाम 06:00 बजे के बाद शुरू हो जाएगा। इसके अलावा, जिन क्षेत्रों या परंपराओं में चंद्रोदय के बाद व्रत खोलने का विधान है, वहां चंद्रोदय रात्रि 11:40 बजे के आसपास होगा।अहोई अष्टमी का व्रत मुख्य रूप से माताएं अपनी संतानों की रक्षा के लिए रखती हैं। इस दिन चांदी की 'अहोई' या सेठी बनाकर उसकी पूजा की जाती है, जिसे गले में भी पहना जाता है। पूजा में चांदी की माला का भी विशेष महत्व होता है। इस दिन स्याहु और उसके सात पुत्रों की कथा सुनने की परंपरा है, जो संतान सुख और परिवार की सुरक्षा का प्रतीक है। इस प्रकार अहोई अष्टमी 2026 का यह पर्व माता और संतान के अटूट प्रेम, निष्ठा और समर्पण का एक अनूठा अवसर लेकर आ रहा है।
अहोई अष्टमी क्यों मनाई जाती है? – व्रत का धार्मिक महत्व
अहोई अष्टमी का पावन पर्व हिंदू धर्म में माताओं के लिए सबसे महत्वपूर्ण और कठिन व्रतों में से एक माना जाता है। यह व्रत मुख्य रूप से माताएं अपनी संतानों की लंबी उम्र, उत्तम स्वास्थ्य, सुरक्षा और उज्जवल भविष्य की कामना के लिए रखती हैं। यह दिन माता और संतान के अटूट प्रेम, निष्ठा और समर्पण का प्रतीक है।
अहोई अष्टमी मनाने के मुख्य कारण
- ऐसा विश्वास है कि इस व्रत को विधि-विधान से करने से संतान पर आने वाले सभी संकट टल जाते हैं और उन्हें लंबी आयु का वरदान प्राप्त होता है।
- धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, अहोई माता की पूजा करने से परिवार में सुख-शांति, वंश वृद्धि और खुशहाली बनी रहती है।
- कई जगहों पर संतान प्राप्ति की इच्छा रखने वाली महिलाएं भी इस व्रत को पूरी श्रद्धा के साथ रखती हैं।
व्रत का धार्मिक और पौराणिक महत्व
अहोई अष्टमी के व्रत का इतिहास और पौराणिक महत्व बहुत गहरा है। आइए इसके मुख्य पहलुओं को जानते हैं:-
स्याहु माता की कथा
इस व्रत की पूजा के दौरान दीवार पर अहोई माता के साथ 'स्याहु' (सेहुड़ के पौधे की प्रतीक या स्याहु माता) और उसके सात पुत्रों का चित्र बनाया जाता है। कथा के अनुसार, एक साहूकार की सात बहुएँ थीं। एक बार दीपावली के लिए मिट्टी लाते समय अनजाने में साहूकार की सबसे छोटी बहू से स्याहु के सात पुत्रों (मांद में रहने वाले शावक) की मिट्टी कट गई, जिससे स्याहु ने क्रोधित होकर उसे शाप दिया कि उसकी कोख बंध जाएगी (संतान नहीं होगी)।अपनी गलती का अहसास होने पर छोटी बहू ने पूरी श्रद्धा, पश्चात्ताप और निष्ठा के साथ अहोई माता (स्याहु) की शरण ली और उनकी पूजा की। उसकी सच्ची भक्ति से प्रसन्न होकर माता ने उसे न केवल माफ किया, बल्कि उसकी संतानों को भी सुरक्षित जीवन का आशीर्वाद दिया।अहोई माता कौन हैं? – अहोई माता का स्वरूप
हिंदू धर्म में अहोई माता को साक्षात माता पार्वती (आदि शक्ति) का ही एक स्वरूप माना जाता है। इन्हें विशेष रूप से बच्चों की रक्षक, पालनकर्ता और संतानों को दीर्घायु का वरदान देने वाली देवी के रूप में पूजा जाता है।अहोई अष्टमी के दिन घरों में दीवार पर रोली, गेरू या चावल के घोल से अहोई माता का चित्र बनाया जाता है या बाजार में मिलने वाले कैलेंडर का पूजन किया जाता है।
इस चित्र में माता के साथ-साथ 'स्याहु' (सेहुड़ के पौधे का प्रतीक माना जाने वाला वन्य जीव) और उसके सात पुत्रों का चित्रांकन होता है। इसके अलावा, कलश और दीपावली से जुड़े प्रतीकों का भी अंकन किया जाता है। ऐसी धार्मिक मान्यता है कि अहोई माता अपने भक्तों की संतानों को अकाल मृत्यु, दुर्घटना और हर प्रकार के संकट से बचाती हैं। माताएं अपनी संतान के उज्ज्वल भविष्य, सुख-समृद्धि और लंबी उम्र के लिए यह व्रत पूरी निष्ठा से रखती हैं।
अहोई अष्टमी की पौराणिक व्रत कथा
अहोई अष्टमी के व्रत की कथा के बिना इस पर्व की पूजा अधूरी मानी जाती है। यह कथा माता और संतान के प्रेम और कर्तव्य पर आधारित है:-
पौराणिक कथा के अनुसार, किसी नगर में एक साहूकार रहता था, जिसके सात पुत्र और सात बहुएं थीं। दीपावली के पावन पर्व के नजदीक आने पर घर की लीपापोती के लिए सातों बहुएं जंगल से मिट्टी लाने गईं। सबसे छोटी बहू ने जहाँ से मिट्टी खोदनी शुरू की, वहीं पास में एक सेहुड़ (स्याहु) की मांद थी। मिट्टी खोदते समय अनजाने में छोटी बहू की कुदाल से स्याहु के सात छोटे बच्चे (शावक) मारे गए। अपने बच्चों की मृत्यु से दुखी और क्रोधित होकर स्याहु ने शाप दिया— "जैसे तूने मेरी कोख सूनी की है, वैसे ही तेरी कोख भी सूनी हो जाएगी।"
स्याहु के शाप के प्रभाव से छोटी बहू की जो भी संतान होती, वह जन्म के कुछ ही दिनों बाद अकाल मृत्यु को प्राप्त हो जाती। सातवें पुत्र की भी ऐसी ही स्थिति होने पर छोटी बहू अत्यंत दुखी और विलाप करने लगी। उसने अपने किए गए पाप की क्षमा के लिए नगर की एक निष्ठावान और वृद्ध महिला (ब्राह्मणी) से मार्गदर्शन मांगा। ब्राह्मणी ने उसे सलाह दी कि वह पूरी श्रद्धा और पश्चात्ताप के साथ 'स्याहु माता' (अहोई माता) की शरण में जाए और कार्तिक मास की कृष्ण पक्ष की अष्टमी को विधि-विधान से व्रत रखकर उनकी पूजा करे। छोटी बहू ने सच्चे मन से प्रायश्चित करते हुए अहोई माता का व्रत रखा और उनकी सेवा की। उसकी सच्ची भक्ति, पश्चात्ताप और विलाप से प्रसन्न होकर स्याहु माता (अहोई माता) प्रकट हुईं और उसे सात पुत्रों व बहुओं के साथ सुखी जीवन का आशीर्वाद दिया।
तभी से सनातन संस्कृति में संतानों के कल्याण, लंबी आयु और रक्षा के लिए अहोई अष्टमी का यह व्रत रखने की परंपरा चली आ रही है।
अहोई अष्टमी के व्रत में संध्याकाल (प्रदोष काल) में माता अहोई की पूजा का सबसे अधिक महत्व होता है। वर्ष 2026 में पूजा के लिए मिलने वाला शुभ मुहूर्त और अन्य जरूरी समय इस प्रकार हैं:
अहोई अष्टमी 2026: पूजा का शुभ मुहूर्त
1. मुख्य पूजा मुहूर्त (प्रदोष काल)
- पूजा का समय शाम 05:36 बजे से लेकर शाम 06:54 बजे तक और कुल समय अवधि 1 घंटा 18 मिनट
- यह समय अहोई माता की तस्वीर या कैलेंडर स्थापित कर विधि-विधान से पूजा करने, रोली, चावल, दूध अर्पित करने और अहोई माता की कथा सुनने के लिए सबसे श्रेष्ठ माना गया है।
2. तिथि का विवरण
- अष्टमी तिथि का प्रारंभ 1 नवंबर 2026 को दोपहर 02:51 बजे से अष्टमी तिथि का समापन 2 नवंबर 2026 को दोपहर 01:10 बजे तक
3. तारे देखने और अर्घ्य देने का समय (व्रत पारण)
- तारों के दर्शन का समय शाम 06:00 बजे के बाद (जैसे ही आसमान में तारे नज़र आने लगें)
- इस व्रत में पूरे दिन निर्जला उपवास रखने के बाद शाम को तारों को जल से अर्घ्य दिया जाता है और इसके बाद ही माताएं अन्न-जल ग्रहण करके अपना व्रत खोलती हैं।
4. चंद्रोदय का समय
- रात्रि चंद्रोदय रात 11:40 बजे के आसपास
- जिन क्षेत्रों या पारिवारिक परंपराओं में चंद्रमा को देखकर व्रत खोलने का विधान है, वे रात्रि में चंद्रोदय के बाद अर्घ्य देती हैं। हालांकि, अधिकांश जगहों पर तारों को अर्घ्य देकर ही व्रत पूरा कर लिया जाता है।
अहोई अष्टमी पूजा सामग्री
- अहोई माता के चित्र या कैलेंडर (जिसमें स्याहु और सात पुत्रों का चित्रांकन हो)
- पूजा के लिए दीवार पर छापने या चित्र बनाने हेतु रोली, गेरू या चावल का घोल
- जल से भरा हुआ मिट्टी का कलश (करवा)
- दूध और चावल (भोग व पूजा के लिए)
- पूजा के लिए चांदी की 'अहोई' या सेठी (यदि पारिवारिक परंपरा हो)
- चांदी की माला या मोतियों का हार
- मीठे पुए या आटे का हलवा (माता को भोग लगाने के लिए)
- कच्चे सूत का धागा या कलावा
- दीपक (शुद्ध घी का), धूप और अगरबत्ती
- फल, फूल, सिंघाड़े और ऋतुफल
- पूजा के दौरान अर्पित करने के लिए दक्षिणा (सिक्के)
- तारों को अर्घ्य देने के लिए जल से भरा लोटा और छलनी (या दीप)
अहोई अष्टमी की पूजा विधि
- सुबह स्नान करके स्वच्छ वस्त्र पहनें और पूरे दिन निर्जला (बिना जल के) व्रत रखने का संकल्प लें।
- शाम के समय घर की साफ दीवार पर रोली, गेरू या चावल के घोल से अहोई माता, 'स्याहु' और उसके सात पुत्रों का चित्र बनाएं (या बाजार का कैलेंडर लगाएं)।
- पूजा स्थल पर माता के चित्र के पास जल से भरा हुआ मिट्टी का कलश (करवा) रखें।
- रोली, अक्षत (चावल), पुष्प, दूध और चावल अर्पित कर माता की विधि-विधान से पूजा करें।
- माता को मीठे पुए, आटे का हलवा या मिठाई का भोग लगाएं।
- पूजा के समय हाथ में थोड़े से गेहूं या चावल लेकर अहोई अष्टमी की पौराणिक कथा सुनें या पढ़ें।
- शाम को आकाश में तारे निकलने पर जल से भरे लोटे और छलनी से तारों को अर्घ्य दें।
- अर्घ्य देने के बाद अपनी संतान की लंबी उम्र और सुख-समृद्धि की कामना करें और बड़ों का आशीर्वाद लेकर व्रत का पारण करें।
अहोई अष्टमी व्रत के नियम – क्या करें और क्या न करें
अहोई अष्टमी का व्रत संतान के सुख, अच्छे स्वास्थ्य और लंबी उम्र के लिए रखा जाता है। इस व्रत को अत्यंत कठिन और पवित्र माना जाता है, इसलिए इसके नियमों का पूरी निष्ठा से पालन करना जरूरी है। आइए जानते हैं इस व्रत के दौरान क्या करें और क्या न करें:-
क्या करें (Do's)
- इस व्रत में पूरे दिन अन्न और जल का त्याग किया जाता है, इसलिए अपनी क्षमता के अनुसार निर्जला या फलाहार का व्रत का पालन करें।
- व्रत के दिन सुबह जल्दी उठकर स्नान करें और स्वच्छ वस्त्र पहनकर व्रत का संकल्प लें।
- शाम के समय प्रदोष काल में दीवार पर अहोई माता और स्याहु (सात पुत्रों सहित) का चित्र बनाकर या कैलेंडर स्थापित कर विधिवत पूजा करें।
- पूजा के दौरान अहोई माता की पौराणिक कथा सुनें या पढ़ें और माता को मीठे पुए या हलवे का भोग लगाएं।
- शाम को आकाश में तारे निकलने के बाद तारों को जल से अर्घ्य दें और अपनी संतान के कल्याण की कामना करें।
- व्रत पूरा होने के बाद घर के बड़े-बुजुर्गों का पैर छूकर आशीर्वाद अवश्य लें।
क्या न करें (Don'ts)
- व्रत के दिन या पूजा के समय साग-सब्जी काटने के लिए चाकू या किसी भी प्रकार की नुकीली वस्तु के प्रयोग से बचें। खासकर इस दिन मिट्टी खोदने या पेड़-पौधों को नुकसान पहुंचाने से बचना चाहिए।
- व्रत के दिन मन शांत रखें। किसी पर भी गुस्सा न करें, अपशब्द न बोलें और नकारात्मक विचारों से दूर रहें।
- इस दिन दिन के समय सोने की मनाही होती है। पूरा दिन माता के भजन-कीर्तन और ध्यान में बिताना चाहिए।
- इस दिन घर में लहसुन, प्याज या किसी भी प्रकार के तामसिक भोजन का प्रयोग नहीं करना चाहिए। सात्विक भोजन ही बनाएं।
- एक बार व्रत का संकल्प लेने के बाद इसे अधूरा न छोड़ें। यदि स्वास्थ्य बहुत ज्यादा खराब हो, तो ही किसी अन्य विकल्प का विचार करें अन्यथा नियमों का पालन करते हुए व्रत पूरा करें।
अहोई अष्टमी पर तारों को अर्घ्य देने की परंपरा – सही विधि और महत्व
अहोई अष्टमी का व्रत सनातन संस्कृति में माताओं द्वारा अपनी संतान की लंबी उम्र, अच्छे स्वास्थ्य और उज्जवल भविष्य के लिए रखा जाने वाला एक अत्यंत कठिन और पवित्र व्रत है। इस व्रत की सबसे प्रमुख विशेषता यह है कि इसमें चंद्रमा की बजाय आकाश में तारों को देखकर अर्घ्य दिया जाता है और इसके बाद ही व्रत का पारण किया जाता है।
आइए जानते हैं अहोई अष्टमी पर तारों को अर्घ्य देने की इस परंपरा का महत्व और इसकी सही विधि:
तारों को अर्घ्य देने का धार्मिक और व्यावहारिक महत्व
- अहोई अष्टमी के दिन आमतौर पर चंद्रोदय बहुत देर रात को होता है (जैसे रात्रि 11:40 बजे के आसपास)। चूंकि माताएं पूरा दिन निर्जला उपवास रखती हैं, इसलिए शाम को प्रदोष काल में पूजा करने के बाद तारों के दर्शन करके व्रत पूरा करने का विधान बनाया गया है।
- जिस प्रकार तारे आकाश में स्थिर रहकर चमकते हैं, उसी प्रकार माताएं अपनी संतान के जीवन में स्थिरता, तेज, सफलता और अच्छे स्वास्थ्य की कामना करती हैं।
- तारों को साक्षी मानकर माताएं ईश्वर से प्रार्थना करती हैं कि उनकी संतान का जीवन भी तारों की तरह प्रकाशमान और सुरक्षित रहे।
तारों को अर्घ्य देने की सही विधि
अहोई अष्टमी की पूजा और कथा संपन्न होने के बाद तारों को अर्घ्य देने की प्रक्रिया इस प्रकार है:
- शाम को पूजा और अहोई माता की कथा पढ़ने के बाद आकाश में तारों के प्रकट होने का इंतजार करें (सामान्यतः शाम 06:00 बजे के बाद तारे दिखने लगते हैं)।
- अर्घ्य देने के लिए जल से भरा हुआ तांबे या लोटे का कलश अपने साथ रखें। इसके साथ छलनी (चन्नी) और दीपक भी साथ रख सकते हैं।
- कई परंपराओं में करवा चौथ की तरह ही छलनी से तारों के दर्शन किए जाते हैं और उसी छलनी से दीपक को भी देखा जाता है।
- हाथ में जल का लोटा लेकर या जमीन पर जल की धारा गिराते हुए आकाश के तारों को अर्घ्य दें।
- अर्घ्य देते समय मन ही मन अहोई माता का स्मरण करें और अपनी संतान की दीर्घायु, रक्षा और सुख-समृद्धि की कामना करें।
- तारों को अर्घ्य देने के बाद घर के बड़ों का आशीर्वाद लें और फिर जल या प्रसाद ग्रहण करके अपना निर्जला व्रत खोलें।
होई अष्टमी 2026 से जुड़े महत्वपूर्ण सवाल-जवाब (FAQ)
प्रश्न 1: क्या गर्भवती महिलाएं या अस्वस्थ लोग अहोई अष्टमी का निर्जला व्रत रख सकते हैं?
उत्तर: अहोई अष्टमी का व्रत पारंपरिक रूप से निर्जला (बिना पानी के) रखा जाता है। हालांकि, यदि कोई महिला गर्भवती है, स्तनपान कराती है, या स्वास्थ्य कारणों से निर्जला रहने में असमर्थ है, तो वे फलाहार (फल, जूस या दूध) लेकर भी यह व्रत रख सकती हैं। शास्त्रों और मान्यताओं के अनुसार, ईश्वर भक्ति में शारीरिक क्षमता और सच्ची भावना का महत्व सबसे ऊपर होता है, इसलिए स्वास्थ्य से समझौता किए बिना व्रत रखा जा सकता है।
प्रश्न 2: यदि अहोई अष्टमी के दिन मासिक धर्म (Periods) आ जाए, तो पूजा कैसे करें?
उत्तर: यदि व्रत के दिन किसी महिला को मासिक धर्म (अशुद्धता) आ जाए, तो उसे घबराने की आवश्यकता नहीं है। इस स्थिति में महिला को स्वयं दीवार पर चित्र बनाने या सीधे पूजा सामग्री को हाथ लगाने से बचना चाहिए। वह घर के किसी अन्य सदस्य (जैसे पति, सास या बड़ी बहन) से पूजा करवा सकती है, दूर बैठकर अहोई माता की कथा सुन सकती है और मानसिक रूप से माता का ध्यान कर सकती है। व्रत खंडित नहीं होता है।
प्रश्न 3: अहोई अष्टमी में चांदी की 'अहोई' (माला) का क्या विशेष महत्व है?
उत्तर: कई परिवारों में चांदी की अहोई (जिसे चांदी के मोतियों और चांदी की सेठी वाली माला भी कहा जाता है) बनवाने की परंपरा है। इस चांदी की माला को पूजा के दिन अहोई माता के साथ रखा जाता है और इसकी पूजा की जाती है। पूजा संपन्न होने के बाद इस माला को माताएं अपने गले में पहनती हैं। इसे वंश वृद्धि, शीतलता, और संतान की रक्षा का एक स्थायी प्रतीक माना जाता है, जिसे पीढ़ियों तक सहेज कर रखा जाता है।
प्रश्न 4: अहोई अष्टमी के दिन किन चीजों का दान करना सबसे शुभ माना जाता है?
उत्तर: अहोई अष्टमी के दिन दान-पुण्य का विशेष महत्व है। इस दिन अपनी क्षमता के अनुसार जरूरतमंदों या ब्राह्मणों को अन्न (गेहूं, चावल), मौसमी फल, सर्दियों के गर्म कपड़े, और सुहाग की सामग्री का दान करना अत्यंत शुभ फलदायी माना जाता है। इसके अलावा, इस दिन गाय को हरा चारा खिलाना और किसी सुहागन महिला को भोजन कराना भी बहुत पुण्यकारी माना जाता है।
प्रश्न 5: क्या पिता या पुरुष भी अहोई अष्टमी का व्रत रख सकते हैं?
उत्तर: पारंपरिक रूप से अहोई अष्टमी का व्रत मुख्य रूप से माताएं ही रखती हैं, क्योंकि इसका सीधा संबंध मातृत्व और संतान की रक्षा से है। हालांकि, आधुनिक समय और पारिवारिक सहभागिता के दौर में कई परिवारों में पिता भी अपनी संतान के उज्जवल भविष्य, अच्छी सेहत और लंबी उम्र के लिए अपनी पत्नी के साथ मिलकर व्रत रखते हैं या पूजा में पूर्ण रूप से सम्मिलित होते हैं।
अहोई अष्टमी का यह पावन पर्व केवल एक धार्मिक अनुष्ठान या परंपरा मात्र नहीं है, बल्कि यह माता और संतान के बीच के उस अटूट प्रेम, निश्छल निष्ठा, त्याग और समर्पण का सबसे सुंदर प्रतीक है। आधुनिक भागदौड़ भरी जिंदगी में यह व्रत हमें हमारी भारतीय संस्कृति, संस्कारों और पारिवारिक मूल्यों से जोड़े रखता है, जहाँ एक मां अपनी संतान की लंबी उम्र, अच्छे स्वास्थ्य, सुरक्षा और उज्जवल भविष्य के लिए निर्जला उपवास रखती है और तारों को अर्घ्य देकर उनके जीवन में प्रकाश की कामना करती है। वर्ष 2026 में 1 नवंबर 2026 को मनाया जाने वाला यह महापर्व सभी माताओं और उनकी संतानों के जीवन में सुख, शांति, आरोग्य और अनंत समृद्धि लेकर आए। अहोई माता के आशीर्वाद से हर घर में खुशियों का उजाला हो और हर संतान का जीवन स्वस्थ व दीर्घायु हो।
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अहोई अष्टमी 2026: कब है? जानें पूजा विधि, व्रत कथा और महत्व
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