बहुलाष्टमी 2026: कब है? जानें राधाकुंड अष्टमी का महत्व और पूजा विधि

वर्ष 2026 में बहुलाष्टमी (राधा कुंड प्रकटोत्सव/स्नान) का पर्व कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को मनाया जाएगा। धार्मिक पंचांग और मान्यता अनुसार यह व्रत 1 नवंबर 2026 (रविवार) को रखा जाएगा तथा इसकी मध्यरात्रि का विशेष स्नान मुहूर्त 1 नवंबर की रात से 2 नवंबर के तड़के (सोमवार) के बीच रहेगा। (वैष्णव/इस्कॉन कैलेंडर में बहुलाष्टमी तिथि की मान्यता 2 नवंबर 2026 को दर्शाई गई है।)

बहुलाष्टमी 2026 कब है? – तिथि, वार और शुभ समय

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बहुलाष्टमी 2026: तिथि, वार और शुभ समय सारणी

विवरणशुभ समय / जानकारी
त्योहार / तिथिबहुलाष्टमी (कार्तिक कृष्ण पक्ष अष्टमी)
मुख्य व्रत/स्नान तिथि1 नवंबर 2026
वार (दिन)रविवार
वैष्णव तिथि (इस्कॉन)2 नवंबर 2026 (सोमवार)
अष्टमी तिथि प्रारम्भ1 नवंबर 2026, दोपहर 01:10 बजे से
अष्टमी तिथि समाप्त2 नवंबर 2026, दोपहर 02:00 बजे तक
राधा कुंड निशीथ काल (मध्यरात्रि) स्नान मुहूर्त1 नवंबर 2026 की रात 11:37 बजे से 12:29 बजे (2 नवंबर तड़के) तक

बहुलाष्टमी को राधाकुंड अष्टमी क्यों कहा जाता है?

बहुलाष्टमी को 'राधाकुंड अष्टमी' इसलिए कहा जाता है क्योंकि इसी पवित्र तिथि (कार्तिक कृष्ण पक्ष अष्टमी) पर द्वापर युग में श्री राधा रानी द्वारा 'राधा कुंड' का प्राकट्य (उत्पत्ति) हुआ था। पौराणिक कथा के अनुसार, जब भगवान श्रीकृष्ण ने अरिष्टासुर राक्षस का वध किया था, तब उन्हें गौ-हत्या का पाप लगा l इस पाप से मुक्ति पाने के लिए श्रीकृष्ण ने अपनी बांसुरी से एक कुंड खोदा और सभी तीर्थों के जल का आह्वान कर उसमें स्नान किया, जिसे 'श्याम कुंड' कहा गया।

श्याम कुंड के ठीक पास ही राधारानी और उनकी सखियों ने अपने कंगन से एक और सुंदर कुंड की खुदाई की, जिसे दिव्य जल से भरकर 'राधा कुंड' का स्वरूप दिया गया। चूंकि इसी दिन और रात्रि के विशेष मुहूर्त में इस परम पवित्र कुंड का प्रकटोत्सव हुआ था, इसलिए बहुलाष्टमी के इस पावन पर्व को मुख्य रूप से 'राधाकुंड प्राकट्य दिवस' या 'राधाकुंड अष्टमी' के रूप में अत्यंत धूमधाम के साथ मनाया जाता है।

बहुलाष्टमी का धार्मिक महत्व 

बहुलाष्टमी का हिंदू धर्म में अत्यंत विशिष्ट और गहरा आध्यात्मिक महत्व है, जिसका सीधा संबंध भगवान श्रीकृष्ण, श्री राधा रानी और ब्रज के प्रसिद्ध राधा कुंड से है। इस पावन पर्व के धार्मिक और पौराणिक आयाम निम्नलिखित हैं:

  • कार्तिक कृष्ण पक्ष की अष्टमी को मनाए जाने वाले इस पर्व पर माता बहुला (सुरभि गाय) की पूजा की जाती है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, इस दिन माता बहुला ने अपने सत्य और धर्म का पालन करते हुए अपने प्राणों का संकट टालने का आदर्श प्रस्तुत किया था, जिससे गौ माता की सेवा और पूजन का अनंत पुण्य प्राप्त होता है।
  • द्वापर युग में जब भगवान श्रीकृष्ण ने अरिष्टासुर (बृषभासुर) का वध किया था, तब उन्हें गौ-हत्या का पाप लगा। इस पाप से मुक्ति पाने के लिए देवर्षि नारद के मार्गदर्शन में श्रीकृष्ण ने अपनी बांसुरी से एक कुंड खोदा और उसमें स्नान किया, जिसे श्याम कुंड कहा गया।
  • श्याम कुंड की पावनता को देखकर श्री राधा रानी और उनकी सखियों ने अपने कंगन से पास ही एक अन्य कुंड की खुदाई की और उसमें दिव्य जल भरा, जो राधा कुंड के रूप में प्रकट हुआ। बहुलाष्टमी की मध्यरात्रि (अहोई अष्टमी की रात) को ही इन दोनों कुंडों का प्राकट्य हुआ था, इसलिए इसे 'राधा कुंड प्राकट्य दिवस' भी कहा जाता है।
  • धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, बहुलाष्टमी की रात के ठीक बारह बजे (निशीथ काल में) जो भी दम्पति या भक्त राधा-श्याम कुंड में आस्था के साथ स्नान करते हैं, उन्हें अखंड सौभाग्य, आरोग्यता और भगवान श्री कृष्ण-राधा रानी की असीम कृपा प्राप्त होती है। ब्रज क्षेत्र में इस दिन लाखों श्रद्धालु आकर पवित्र कुंड में डुबकी लगाते हैं और दान-पुण्य करते हैं।

बहुलाष्टमी की पौराणिक कथा 

द्वापर युग में जब कंस द्वारा भेजा गया अरिष्टासुर नामक राक्षस बछड़े (वृषभ) का रूप धारण कर ब्रजवासियों को सताने आया, तब भगवान श्रीकृष्ण ने उसका वध कर दिया। चूँकि राक्षस बछड़े के रूप में था, इसलिए श्रीकृष्ण पर गौ-हत्या का पाप माना गया। इस पाप के निवारण हेतु देवर्षि नारद के परामर्श पर श्रीकृष्ण ने अपनी बांसुरी से एक कुंड खोदा और उसमें सभी तीर्थों के जल का आह्वान कर स्नान किया, जिसे 'श्याम कुंड' कहा गया। श्याम कुंड के प्राकट्य के बाद श्री राधा रानी और उनकी सखियों ने अपने कंगन से पास ही एक अन्य सुंदर कुंड की खुदाई की और उसमें दिव्य जल भरा, जो 'राधा कुंड' कहलाया। श्रीकृष्ण ने राधारानी को वरदान दिया कि कार्तिक कृष्ण पक्ष की अष्टमी की मध्यरात्रि (निशीथ काल) में राधा कुंड में स्नान करने वाले श्रद्धालुओं को राधा-कृष्ण की अनन्य भक्ति और सौभाग्य की प्राप्ति होगी, तभी से इस पर्व को बहुलाष्टमी या राधाकुंड प्राकट्य दिवस के रूप में मनाया जाता है।

बहुलाष्टमी पर राधाकुंड स्नान का महत्व

बहुलाष्टमी के पावन अवसर पर राधाकुंड में स्नान करने का आध्यात्मिक और धार्मिक दृष्टि से अत्यंत अलौकिक महत्व है:-

  • धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, कार्तिक कृष्ण पक्ष की अष्टमी (बहुलाष्टमी) की मध्यरात्रि (निशीथ काल) में जो दम्पति या श्रद्धालु राधा कुंड में पूरी श्रद्धा के साथ स्नान करते हैं, उन्हें अखंड सौभाग्य, सुखी वैवाहिक जीवन और संतान सुख की प्राप्ति होती है।
  • इस पवित्र तिथि पर राधा कुंड में स्नान करने से भक्तों पर भगवान श्रीकृष्ण और श्री राधा रानी की असीम अनुकंपा बरसती है, जिससे जीवन के सभी कष्ट दूर होते हैं।
  • चूंकि इसी मध्यरात्रि में द्वापर युग में राधा कुंड और श्याम कुंड का प्राकट्य हुआ था, इसलिए इस विशेष मुहूर्त में डुबकी लगाने से समस्त तीर्थों में स्नान करने के समान पुण्य फल मिलता है।
  • मान्यता है कि बहुलाष्टमी की रात जो भी भक्त विधि-विधान से कुंड में स्नान कर पूजन और दीपदान करता है, उसे श्री राधा-कृष्ण के चरणों में अनन्य प्रेम और अंत में मुक्ति (मोक्ष) की प्राप्ति होती है।

बहुलाष्टमी पर राधा-कृष्ण की पूजा विधि

बहुलाष्टमी के पावन पर्व पर भगवान श्रीकृष्ण, श्री राधा रानी और गौ माता की पूजा-अर्चना का विशेष विधान है, जिसकी विधि नीचे दी गई है:

  • बहुलाष्टमी के दिन सुबह जल्दी उठकर स्नान करें और साफ वस्त्र धारण करें। इसके बाद व्रत और पूजा का संकल्प लें।
  • इस दिन विशेष रूप से गौ माता (बहुला) और उनके बछड़े की पूजा की जाती है। गाय को स्नान कराएं, उनके माथे पर कुमकुम या हल्दी का तिलक लगाएं, गले में माला पहनाएं और उन्हें हरा चारा, गुड़ व रोटी खिलाएं।
  • एक चौकी पर लाल या पीले रंग का वस्त्र बिछाकर भगवान श्रीकृष्ण और श्री राधा रानी की मूर्ति या तस्वीर स्थापित करें।
  • भगवान को गंगाजल से स्नान कराएं। इसके बाद उन्हें चंदन, पीले वस्त्र, अक्षत, धूप, दीप, नैवेद्य (मिठाई और फल) अर्पित करें। विशेष रूप से माखन-मिश्री का भोग लगाएं।
  • पूजन के दौरान "ॐ श्री राधायै नमः" या "ॐ नमो भगवते वासुदेवाय" मंत्र का जाप करें। इसके बाद बहुलाष्टमी और राधाकुंड के प्राकट्य की कथा अवश्य सुनें या पढ़ें।
  • यदि संभव हो, तो ब्रज के राधा कुंड में जाकर या घर पर ही ध्यान करते हुए मध्यरात्रि (रात 12 बजे) के समय विशेष आराधना करें, क्योंकि इसी समय कुंडों का प्राकट्य हुआ था। अंत में आरती कर सभी में प्रसाद वितरित करें।

बहुलाष्टमी पूजा सामग्री 

बहुलाष्टमी पूजा सामग्री


  • भगवान श्री कृष्ण और श्री राधा रानी की मूर्ति या चित्र
  • चौकी और लाल या पीला वस्त्र
  • गंगाजल
  • रोली, चंदन, कुमकुम और अक्षत (चावल)
  • पुष्प और फूलों की माला
  • धूप, दीप और अगरबत्ती
  • शुद्ध घी का दीपक
  • नैवेद्य (फल, मिठाई और विशेष रूप से माखन-मिश्री)
  • गाय और बछड़े के पूजन के लिए— हरा चारा, गुड़ और गेहूं की रोटी
  • कथा की पुस्तक
  • कलश और जल से भरा पात्र

बहुलाष्टमी पर क्या करें और क्या न करें?

बहुलाष्टमी के पावन पर्व पर क्या करें और क्या न करें, इसके नियम निम्नलिखित हैं:-

क्या करें (Do's)

  • इस दिन माता बहुला (गौ माता) और बछड़े को स्नान कराकर उनका पूजन करें तथा उन्हें हरा चारा, गुड़ और रोटी खिलाएं。
  • विधि-विधान से भगवान श्रीकृष्ण और श्री राधा रानी की पूजा करें और उन्हें माखन-मिश्री का भोग लगाएं。
  • बहुलाष्टमी और राधाकुंड के प्राकट्य से जुड़ी पौराणिक कथा का पाठ या श्रवण अवश्य करें。
  • संभव हो तो निशीथ काल (मध्यरात्रि) में राधा कुंड में स्नान करें या मानसिक रूप से राधा-कृष्ण का स्मरण कर विशेष आराधना करें。
  • इस पवित्र तिथि पर सामर्थ्य के अनुसार जरूरतमंदों को दान, अन्नदान या गौशाला में सेवा कार्य करें。

क्या न करें (Don'ts)

  • इस दिन भूलकर भी गाय, बछड़े या किसी भी बेजुबान जानवर को परेशान न करें, उन्हें मारें-पीटें या भूखा न रखें。
  • व्रत या पूजा के दिन लहसुन, प्याज, मांसाहार और मदिरा जैसी तामसिक चीजों का सेवन बिल्कुल न करें。
  • इस पावन दिन मन में किसी के प्रति द्वेष, गुस्सा या नकारात्मक विचार न लाएँ और ब्रह्मचर्य का पालन करें
  • गौ माता, ब्राह्मणों या बुजुर्गों का अपमान करने से बचें।

बहुलाष्टमी पर दीपदान और रात्रि पूजा की परंपरा

बहुलाष्टमी के पावन पर्व पर दीपदान और रात्रि पूजा (विशेषकर निशीथ काल में) का अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है, जिसकी परंपरा और मान्यताएँ इस प्रकार हैं:-

बहुलाष्टमी पर दीपदान और रात्रि पूजा की परंपरा

    • बहुलाष्टमी की पूजा मुख्य रूप से प्रदोष काल और मध्यरात्रि यानी निशीथ काल में की जाती है, क्योंकि इसी अलौकिक समय में द्वापर युग में राधा कुंड और श्याम कुंड का प्राकट्य हुआ था。 इस समय की गई पूजा से राधा-कृष्ण की विशेष कृपा प्राप्त होती है。
    • इस पवित्र रात्रि को मंदिरों, घरों की देहरी और विशेष रूप से ब्रज के राधा कुंड तथा अन्य पवित्र सरोवरों के घाटों पर दीपदान करने की प्राचीन परंपरा है。 आटे या मिट्टी के दीपकों में शुद्ध घी जलाकर कुंड या जल स्रोतों में प्रवाहित किए जाते हैं。
    • दीपदान को अंधकार पर प्रकाश और जीवन में सुख-समृद्धि, अखंड सौभाग्य तथा सकारात्मकता का प्रतीक माना जाता है。 मान्यता है कि इस रात किए गए दीपदान से पितरों को भी तृप्ति मिलती है और घर मेंार में माता लक्ष्मी का वास होता है。
    • बहुलाष्टमी की रात को कई स्थानों पर श्रद्धालु भजन-कीर्तन करते हैं और "ॐ श्री राधायै नमः" तथा महामंत्र का जाप करते हुए रात्रि जागरण करते हैं, जिससे व्रत का पूर्ण और अनंत फल प्राप्त होता है。

    बहुलाष्टमी 2026 से जुड़े सवाल-जवाब (FAQ)

    प्रश्न 1: बहुलाष्टमी का व्रत मुख्य रूप से कौन रखता है और इसका क्या उद्देश्य है?

    बहुलाष्टमी का व्रत मुख्य रूप से माताएं अपनी संतान की लंबी आयु, अच्छे स्वास्थ्य, उज्जवल भविष्य और उनकी रक्षा के लिए रखती हैं। इसके साथ ही, यह व्रत निःसंतान दंपतियों को संतान प्राप्ति और सुखी वैवाहिक जीवन के लिए भी अत्यंत फलदायी माना जाता है। 

    प्रश्न 2: क्या बहुलाष्टमी और अहोई अष्टमी एक ही दिन होती हैं?

    उत्तर: नहीं, दोनों पर्व अलग-अलग हैं, हालांकि दोनों का संबंध कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष से है। अहोई अष्टमी का व्रत कार्तिक कृष्ण पक्ष की अष्टमी से कुछ दिन पहले (सामान्यतः अष्टमी तिथि के आरंभ या उसके आसपास) माताएं अपनी संतानों के लिए रखती हैं, जबकि बहुलाष्टमी विशेष रूप से भगवान श्रीकृष्ण, गौ माता और राधा कुंड के प्राकट्य उत्सव के रूप में मनाई जाती है। 

     प्रश्न 3: बहुलाष्टमी के दिन किस प्रकार के अन्न या आहार का सेवन वर्जित होता है?

    इस दिन व्रत रखने वाले श्रद्धालुओं को अन्न का सेवन नहीं करना चाहिए। इसके अलावा, इस पावन तिथि पर गाय के दूध, दही या उससे बनी चीजों का सेवन करने से भी कई जगह परहेज किया जाता है, क्योंकि यह दिन पूर्णतः गौ-माता और उनके बछड़े की पूजा को समर्पित होता है। 

    प्रश्न 4: बहुलाष्टमी पर यदि राधा कुंड जाना संभव न हो, तो घर पर कैसे पूजा करें?

    यदि आप ब्रज स्थित राधा कुंड नहीं जा सकते, तो घर के पूजा स्थल पर गंगाजल छिड़क कर पवित्र करें। एक चौकी पर श्री राधा-कृष्ण की मूर्ति या चित्र स्थापित कर विधि-विधान से पूजन करें। घर में ही किसी स्वच्छ पात्र में जल भरकर उसमें थोड़ा गंगाजल मिला लें और उसे 'राधा कुंड' का प्रतीक मानकर मध्यरात्रि में ध्यान व दीपदान करें। 

    प्रश्न 5: बहुलाष्टमी के दिन गाय की पूजा में किस बात का विशेष ध्यान रखना चाहिए?

    इस दिन जब आप गौ माता और उनके बछड़े (बहुला) का पूजन करें, तो उन्हें केवल सूखा चारा न दें, बल्कि अपने हाथों से गुड़, भीगी हुई चने की दाल या गेहूं की रोटी और हरा चारा प्रेमपूर्वक खिलाएं। साथ ही, उनकी परिक्रमा कर आशीर्वाद लें और किसी भी प्रकार से उन्हें कष्ट न पहुँचाने का संकल्प लें।

    निष्कर्ष (Conclusion)

    बहुलाष्टमी का यह पावन पर्व केवल एक धार्मिक अनुष्ठान या परंपरा मात्र नहीं है, बल्कि यह गौ-माता की सेवा, जीवों के प्रति करुणा और भगवान श्रीकृष्ण व श्री राधा रानी के अलौकिक प्रेम का सबसे सुंदर प्रतीक है। आधुनिक भागदौड़ भरी जिंदगी में यह व्रत हमें हमारी प्राचीन भारतीय संस्कृति, संस्कारों और सनातन मूल्यों से जोड़े रखता है, जहाँ भक्त और माताएं अपनी संतान की रक्षा, परिवार की सुख-समृद्धि और अखंड सौभाग्य के लिए विधि-विधान से व्रत रखती हैं, मध्यरात्रि में राधा कुंड में आस्था की डुबकी लगाती हैं और दीपदान कर जीवन में प्रकाश की कामना करती हैं। वर्ष 2026 में 31 अक्टूबर 2026 को मनाया जाने वाला यह महापर्व सभी श्रद्धालुओं और उनकी संतानों के जीवन में सुख, शांति, आरोग्य और अनंत समृद्धि लेकर आए। राधा-कृष्ण और गौ माता के आशीर्वाद से हर घर में खुशियों का उजाला हो और हर भक्त का जीवन स्वस्थ व मंगलमय हो।

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    जीवनसेतु टीम की ओर से आप सभी को बहुलाष्टमी और राधाकुंड प्राकट्य दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं और धन्यवाद!

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