पौष पुत्रदा एकादशी 2027 कब है? तिथि, पूजा विधि, कथा और महत्व जानें

सनातन धर्म में पौष माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि का विशेष महत्व माना गया है, जिसे पौष पुत्रदा एकादशी के नाम से जाना जाता है। वर्ष 2027 में पौष पुत्रदा एकादशी का पवित्र व्रत 19 जनवरी, मंगलवार के दिन रखा जाएगा। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, जो भी भक्त अत्यंत श्रद्धा और निष्ठा के साथ भगवान श्री हरि विष्णु की पूजा-अर्चना करते हैं तथा इस व्रत का पालन करते हैं, उन्हें संतान सुख की प्राप्ति होती है और उनके जीवन में सुख-समृद्धि एवं शांति का वास होता है। पौष पुत्रदा एकादशी का व्रत विशेष रूप से उन दंपत्तियों के लिए अत्यंत फलदायी माना गया है, जो संतान प्राप्ति की कामना रखते हैं। 'पुत्रदा' शब्द का अर्थ ही 'पुत्र अथवा संतान देने वाली' होता है। 

                                पौष पुत्रदा एकादशी 2027 कब है? तिथि, पूजा विधि, कथा और महत्व जानें

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पौराणिक कथाओं के अनुसार, द्वापर युग में भद्रावती नगर के राजा सुकेतुमान और उनकी रानी शैव्या संतान न होने के कारण अत्यंत दुखी रहते थे। उन्होंने अपना सारा राज-पाट त्याग कर वन की ओर प्रस्थान किया। वन में उन्हें ऋषियों के माध्यम से पौष पुत्रदा एकादशी के महात्म्य और विधि-विधान के बारे में ज्ञात हुआ। राजा और रानी ने पूरी श्रद्धा के साथ इस एकादशी का उपवास और श्रीहरि की पूजा-अर्चना की। इस व्रत के प्रभाव से उन्हें एक तेजस्वी और धर्मनिष्ठ पुत्र की प्राप्ति हुई। तभी से यह मान्यता प्रचलित है कि इस एकादशी का व्रत रखने से संतान संबंधी सभी बाधाएं दूर होती हैं।

पंचांगीय गणना के अनुसार पौष पुत्रदा एकादशी

पंचांगीय गणना के अनुसार पौष मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि का शुभारंभ 18 जनवरी 2027 को प्रातःकाल 10:27 बजे से होगा, जो कि अगले दिन 19 जनवरी 2027 को प्रातःकाल 07:49 बजे समाप्त होगी। शास्त्रों में सूर्योदयकालीन उदयातिथि के नियम को सर्वोपरि माना गया है, इसलिए व्रत का अनुष्ठान और मुख्य पूजन 19 जनवरी को ही किया जाएगा। व्रत रखने वाले साधकों के लिए पारण का समय 20 जनवरी 2027 को प्रातःकाल सूर्योदय के पश्चात रहेगा, जिसमें सात्विक आहार के साथ व्रत को पूर्ण किया जाता है। व्रत के दिन प्रातःकाल ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान आदि से निवृत्त होकर स्वच्छ वस्त्र धारण करने चाहिए। तत्पश्चात भगवान विष्णु की मूर्ति या चित्र के समक्ष दीप प्रज्वलित कर व्रत का संकल्प लें। पूजन सामग्री में तुलसी पत्र, पीले फूल, अक्षत, फल, धूप-दीप और पंचामृत का प्रयोग करना अत्यंत शुभ माना जाता है। इस दिन 'ॐ नमो भगवते वासुदेवाय' मंत्र का जप करना तथा पौष पुत्रदा एकादशी की कथा का श्रवण करना विशेष लाभदायक होता है। रात्रि के समय जागरण करते हुए भगवान के नाम का संकीर्तन करना चाहिए। अगले दिन पारण के समय ब्राह्मणों या जरूरतमंदों को भोजन कराकर एवं दान-दक्षिणा देकर ही स्वयं भोजन ग्रहण करना चाहिए। यह व्रत न केवल संतान की रक्षा और उन्नति के लिए वरदान स्वरूप है, बल्कि मनुष्य के समस्त पापों को नष्ट कर उसे मोक्ष की ओर अग्रसर करता है।

पौष पुत्रदा एकादशी का व्रत कब रखें?

पौष पुत्रदा एकादशी का व्रत 19 जनवरी 2027 (मंगलवार) को रखा जाएगा।   यद्यपि एकादशी तिथि 18 जनवरी को ही शुरू हो जाएगी, लेकिन शास्त्रों के अनुसार उदयातिथि (सूर्योदय के समय रहने वाली तिथि) को ही मुख्य उपवास और पूजन के लिए मान्य माना जाता है। इसलिए 19 जनवरी 2027 को ही पूरे दिन का व्रत रखा जाएगा और इसका पारण अगले दिन 20 जनवरी 2027 (बुधवार) को सूर्योदय के पश्चात किया जाएगा।

पौष पुत्रदा एकादशी पर व्रत पारण का समय और सही तरीका

तिथि: 20 जनवरी 2027 (बुधवार)

समय: प्रातः 07:14 बजे से प्रातः 09:21 बजे के मध्य

पारण करने का सही तरीका

  • पारण के दिन सुबह जल्दी उठकर स्नान करें और स्वच्छ वस्त्र धारण करें।
  • सबसे पहले भगवान विष्णु की पूजा करें, उनके सामने घी का दीपक जलाएं और तुलसी का पत्ता अर्पित करें।
  • भोजन ग्रहण करने से पहले किसी ब्राह्मण, गरीब या जरूरतमंद व्यक्ति को अन्न, वस्त्र या दक्षिणा का दान करें।
  • पारण की शुरुआत तुलसी के पत्तों और जल ग्रहण करके करें।

इसके बाद ही सात्विक भोजन (जैसे चावल, मूंग दाल की खिचड़ी या फलाहारी आहार) से अपना व्रत खोलें। ध्यान रखें कि एकादशी के अगले दिन (द्वादशी को) चावल खाकर पारण करना अत्यंत शुभ माना जाता है।

पौष पुत्रदा एकादशी:-आवश्यक पूजा सामग्री

  • तुलसी दल  
  • भगवान विष्णु एवं माता लक्ष्मी की प्रतिमा या चित्र
  • पूजा की चौकी
  • पीला कपड़ा
  • पीले फूल
  • पीली मिठाई
  • मौसमी फल (विशेषकर केला)
  • अक्षत (बिना टूटे हुए चावल)
  • रोली, चंदन, हल्दी, धूप
  • गाय के शुद्ध देसी घी का दीपक
  • पंचामृत (दूध, दही, घी, शहद और गंगाजल का मिश्रण) 
  • गंगाजल, कपूर, सुपारी, लौंग, इलायची, नारियल और कलावा (मौली) 
  • आरती के लिए थाली 
  • अर्घ्य देने के लिए तांबे का लोटा 

पौष पुत्रदा एकादशी की पूजा विधि

  • पौष पुत्रदा एकादशी की पूजा विधि का प्रारंभ ब्रह्म मुहूर्त में ही हो जाता है। 
  • व्रत के दिन प्रातःकाल सूर्योदय से पूर्व उठकर नित्य कर्मों से निवृत्त होकर गंगाजल युक्त जल से स्नान करें और पवित्र पीले वस्त्र धारण करें। 
  • इसके पश्चात हाथ में जल, अक्षत और पुष्प लेकर भगवान विष्णु के समक्ष व्रत का संकल्प लें। 
  • घर के मंदिर या पूजा स्थल को अच्छी तरह साफ करके एक लकड़ी की चौकी स्थापित करें और उस पर पीला वस्त्र बिछाएं। 
  • चौकी पर भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की मूर्ति अथवा चित्र स्थापित करें। 
  • सबसे पहले लोटे में जल भरकर गंगाजल मिलाएं और भगवान को आचमन कराएं। 
  • तत्पश्चात पंचामृत और शुद्ध जल से प्रतिमा को स्नान कराएं या सांकेतिक रूप से जल छिड़कें। 
  • इसके बाद श्रीहरि को रोली, चंदन और हल्दी का तिलक लगाएं तथा पीले वस्त्र और पीला कलावा अर्पित करें। 
  • पूजन में पीले ताजे फूल और माला चढ़ाएं। 
  • धूप और गाय के घी का दीपक प्रज्वलित कर वातावरण को सुगंधित व पवित्र बनाएं। 
  • भगवान को फल, मिष्ठान और पंचामृत का भोग लगाएं तथा भोग में तुलसी पत्र अवश्य रखें। 
  • इसके बाद पौष पुत्रदा एकादशी की व्रत कथा का श्रद्धापूर्वक पाठ करें या श्रवण करें। 

अंत में कपूर और घी के दीपक से भगवान विष्णु की आरती उतारें और परिवार के सदस्यों में प्रसाद वितरित करें।

पौष पुत्रदा एकादशी:-  भगवान विष्णु की विशेष उपासना

  • भगवान विष्णु की पूजा में क्या करें और किन बातों का ध्यान रखें? इस संदर्भ में शास्त्रों में विशेष निर्देश दिए गए हैं। पूजा के दौरान मन को पूरी तरह शांत, सात्विक और भक्तिमय रखना चाहिए। 
  • पूरे दिन 'ॐ नमो भगवते वासुदेवाय' या 'ॐ विष्णवे नमः' मंत्र का निरंतर जप करते रहें। 
  • भगवान विष्णु को पीला रंग अत्यंत प्रिय है, इसलिए पूजा में पीले फूल, पीले वस्त्र और पीले फल का उपयोग अधिक से अधिक करें। 
  • इस दिन विष्णु सहस्रनाम या श्री सूक्त का पाठ करना अति उत्तम फल प्रदान करता है। 
  • पूजा में एकाग्रता बनाए रखने के लिए रात्रि के समय जागरण करें और भजन-कीर्तन करें। 
  • ध्यान रखें कि एकादशी के दिन तुलसी के पत्ते नहीं तोड़े जाते, इसलिए पूजा के लिए तुलसी दल एक दिन पूर्व ही तोड़कर रख लें। 
  • इस दिन किसी के प्रति मन में द्वेष, क्रोध या असत्य भाषण न करें और पूर्ण सात्विकता का पालन करें। 

इस प्रकार विधि-विधान और शुद्ध भाव से की गई पूजा से भगवान श्री हरि प्रसन्न होकर भक्त की सभी मनोकामनाएं पूरी करते हैं।

पौष पुत्रदा एकादशी व्रत में क्या उपयोगी (शुभ/त्याज्य) है और क्या नहीं?

पौष पुत्रदा एकादशी का व्रत नियम और निष्ठा के साथ करने पर ही पूर्ण फलदायी होता है। शास्त्रों के अनुसार इस दिन कुछ विशेष कार्यों को करना अत्यंत शुभ माना गया है, जबकि कुछ चीजों व आदतों से सख्त परहेज करना चाहिए:

क्या उपयोगी है (क्या करें / क्या खाएं)

  1. उपवास के दौरान मखाना, कुट्टू या सिंघाड़े का आटा, साबूदाना, सेंधा नमक, दूध, दही, और ताजे फल (विशेषकर केला और सेब) का सेवन करें।
  2. भगवान विष्णु को पीला रंग प्रिय है, इसलिए पूजा में पीले वस्त्र, पीले फूल, हल्दी, चंदन, और पीली मिठाई का प्रयोग करें।
  3. श्रीहरि के भोग में तुलसी का पत्ता अवश्य रखें (ध्यान रहे कि तुलसी का पत्ता एकादशी के एक दिन पूर्व ही तोड़ लें)।
  4. दिनभर 'ॐ नमो भगवते वासुदेवाय' मंत्र का मानसिक जाप करें और रात्रि में विष्णु सहस्रनाम का पाठ या भजन-कीर्तन करें।
  5. जरूरतमंदों को अन्न, वस्त्र, जल या दक्षिणा का दान करना अत्यंत शुभ और फलदायी माना जाता है।

क्या उपयोगी नहीं है (क्या न करें / क्या न खाएं)

  1. एकादशी के दिन चावल, गेहूं, जौ, दालें और किसी भी प्रकार के साधारण अन्न का सेवन भूलकर भी न करें। (विशेषकर चावल खाना शास्त्रों में पूरी तरह वर्जित है)।
  2. प्याज, लहसुन, मांस, मदिरा, बैंगन, मसूर की दाल और साधारण नमक का सेवन पूरी तरह से वर्जित है।
  3. एकादशी के दिन तुलसी के पौधे में जल चढ़ाना और उसके पत्ते तोड़ना वर्जित होता है।
  4. इस दिन किसी पर क्रोध न करें, किसी की चुगली या बुराई न करें और मन में नकारात्मक विचार न लाएं।
  5. एकादशी के दिन बाल काटना, नाखून काटना, दाढ़ी बनाना, साबुन का अधिक प्रयोग करना और तेल मालिश करना सही नहीं माना जाता।

पौष पुत्रदा एकादशी की व्रत कथा

सनातन धर्म में पौष मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को संतान प्राप्ति और उसकी रक्षा के लिए अत्यंत पावन माना गया है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, द्वापर युग में भद्रावती नामक एक अत्यंत समृद्ध और सुंदर नगर था, जहाँ सुकेतुमान नाम के राजा राज्य करते थे। उनकी रानी का नाम शैव्या था। राजा सुकेतुमान धर्मनिष्ठ, न्यायप्रिय और प्रजापालक थे। उनके राज्य में हर प्रकार का सुख और वैभव था, किंतु दंपत्ति के जीवन में एक बहुत बड़ा दुख था—उनकी कोई संतान नहीं थी। संतान न होने के कारण राजा और रानी निरंतर चिंतित और उदास रहते थे। राजा को सदैव यह चिंता सताती रहती थी कि उनके बाद राज्य का संचालन कौन करेगा और उनके पित्रों का श्राद्ध तथा तर्पण कौन संपन्न करेगा। इस वेदना से दुखी होकर राजा और रानी ने अपना राज-पाठ मंत्रियों को सौंप दिया और एकांत की खोज में सघन वन की ओर चले गए।

पौष पुत्रदा एकादशी की व्रत कथा

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    वन में भटकते हुए राजा सुकेतुमान एक अत्यंत सुंदर सरोवर के पास पहुँचे। वहाँ उन्होंने देखा कि सरोवर के तट पर कई वेदपाठी ऋषि-मुनि तपस्या और वेदपाठ कर रहे थे। राजा ने अत्यंत विनम्र भाव से ऋषियों को प्रणाम किया और उनके चरणों में बैठकर अपनी व्यथा सुनाई। ऋषियों ने राजा से प्रसन्न होकर कहा कि आज पौष मास के शुक्ल पक्ष की पुत्रदा एकादशी की पावन तिथि है। जो भी मनुष्य इस दिन पूरी निष्ठा और श्रद्धा के साथ भगवान श्री हरि विष्णु का उपवास रखता है और विधि-विधान से पूजन करता है, उसकी संतान प्राप्ति की मनोकामना अवश्य पूरी होती है। ऋषियों के मार्गदर्शन और परामर्श पर राजा सुकेतुमान ने उसी स्थान पर सरोवर के तट पर पूर्ण श्रद्धा, भक्ति और सात्विकता के साथ पौष पुत्रदा एकादशी का उपवास किया और भगवान जनार्दन की आराधना की।

    अगले दिन द्वादशी को ऋषियों के आशीर्वाद से राजा ने व्रत का पारण किया और अपनी राजधानी वापस लौट आए। व्रत के प्रभाव और भगवान श्री हरि विष्णु की असीम कृपा से कुछ ही समय पश्चात महारानी शैव्या ने गर्भधारण किया और समय आने पर एक अत्यंत सुंदर, तेजस्वी और धर्मनिष्ठ पुत्र को जन्म दिया। वह बालक बड़ा होकर एक न्यायप्रिय, पराक्रमी और महान राजा बना, जिसने अपनी प्रजा का कुशलतापूर्वक पालन किया। इस प्रकार पौष पुत्रदा एकादशी की कथा यह संदेश देती है कि जो भी साधक या दंपत्ति निःसंतानता के दुख से पीड़ित हैं अथवा अपनी संतान की उन्नति, आरोग्य और दीर्घायु की कामना करते हैं, उन्हें पौष पुत्रदा एकादशी का व्रत पूरी श्रद्धा और नियम के साथ अवश्य करना चाहिए। इस पावन कथा के श्रवण और पठन मात्र से मनुष्य के समस्त पाप नष्ट हो जाते हैं और अंत काल में श्रीहरि के परम पद की प्राप्ति होती है।

    पौष पुत्रदा एकादशी का धार्मिक महत्व

    1. सनातन धर्म और पौराणिक ग्रंथों में पौष पुत्रदा एकादशी का धार्मिक एवं आध्यात्मिक महत्व अत्यंत उच्च माना गया है। पद्मा पुराण और भविष्योत्तर पुराण के अनुसार, पौष माह के शुक्ल पक्ष में आने वाली यह एकादशी केवल एक सामान्य उपवास नहीं, बल्कि संतान सुख, वंश वृद्धि और पितृ ऋण से मुक्ति प्रदान करने वाला एक सिद्ध पर्व है।
    2. 'पुत्रदा' शब्द का शाब्दिक अर्थ है—'संतान (पुत्र) प्रदान करने वाली'। मान्यता है कि जो दंपत्ति संतान हीनता के दुख से पीड़ित हैं या जिन्हें संतान प्राप्ति में बाधाओं का सामना करना पड़ रहा है, यदि वे पूरी श्रद्धा से श्रीहरि विष्णु का पूजन व व्रत करते हैं, तो उन्हें योग्य, तेजस्वी और सद्गुणी संतान की प्राप्ति होती है।
    3. यह व्रत केवल संतान प्राप्ति के लिए ही नहीं, बल्कि पहले से मौजूद संतान के आरोग्य, दीर्घायु, सुरक्षा और जीवन में सफलता की कामना के लिए भी रखा जाता है।
    4. हिंदू परंपरा में माना जाता है कि पुत्र या संतान ही आगे चलकर पितरों का तर्पण और श्राद्ध कर्म संपन्न करती है। इस एकादशी के प्रभाव से प्राप्त संतान कुल का नाम रोशन करती है और पितरों को सद्गति प्राप्त होती है।
    5. पद्म पुराण के अनुसार, इस दिन भगवान जनार्दन (विष्णु) की विधिवत पूजा-अर्चना करने से साधक के पूर्व जन्मों तथा इस जन्म के सभी जाने-अनजाने में हुए पाप नष्ट हो जाते हैं। यह व्रत व्यक्ति के मन को सात्विक बनाता है और अंत समय में मोक्ष का मार्ग प्रशस्त करता है।

    संक्षेप में कहें तो, पौष पुत्रदा एकादशी का निष्ठापूर्वक पालन करने से गृहस्थ जीवन में सुख, शांति, समृद्धि और संतान रूपी अनमोल रत्न की प्राप्ति होती है।

    पौष पुत्रदा एकादशी 2027 से संबंधित प्रश्न (FAQ)

    1. पौष पुत्रदा एकादशी और श्रावण पुत्रदा एकादशी में क्या अंतर है? 

    पौष पुत्रदा एकादशी विक्रम संवत के पौष माह के शुक्ल पक्ष में आती है, जो अंग्रेजी कैलेंडर के अनुसार मुख्य रूप से दिसंबर या जनवरी के शीत ऋतु (ठंड के मौसम) में पड़ती है। वहीं श्रावण पुत्रदा एकादशी श्रावण माह के शुक्ल पक्ष में आती है, जो अंग्रेजी कैलेंडर के अनुसार अगस्त महीने के वर्षा ऋतु (मानसून) में पड़ती है।

    2. पुत्रदा एकादशी वर्ष में कितनी बार आती हैं ?

    वर्ष में पुत्रदा एकादशी दो बार आती है। पहली पौष पुत्रदा एकादशी जो कि पौष माह के शुक्ल पक्ष में (लगभग जनवरी में) आती है। दूसरी श्रावण पुत्रदा एकादशी जो की श्रावण माह के शुक्ल पक्ष में (लगभग अगस्त में) आती है। ये दोनों ही व्रत भगवान श्री हरि विष्णु को समर्पित हैं और मुख्य रूप से संतान प्राप्ति, संतान की सुरक्षा तथा उसकी उन्नति की कामना के लिए रखे जाते हैं।

    3. पुत्रदा एकादशी कौन कर सकता है?   

    पुत्रदा एकादशी का व्रत मुख्य रूप से वे दंपत्ति कर सकते हैं जो संतान प्राप्ति की कामना रखते हैं। इसके अलावा, माता-पिता अपनी संतान की दीर्घायु, आरोग्य, सुरक्षा और उन्नति के लिए भी यह उपवास रख सकते हैं। भगवान श्री हरि विष्णु में श्रद्धा रखने वाला कोई भी साधक—चाहे पुरुष हो या महिला—सच्चे मन और सात्विकता के साथ यह पावन व्रत कर सकता है।

    4. क्या पुत्रदा एकादशी व्रत  दंपत्ति को साथ में करना चाहिए या दंपत्ति में से कोई भी ?

    पौष पुत्रदा एकादशी का व्रत पति और पत्नी दोनों द्वारा साथ मिलकर करना सर्वोत्तम माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार दंपत्ति द्वारा एक साथ पूजा-अर्चना और उपवास करने से पूर्ण फल की प्राप्ति होती है और संतान संबंधी मनोकामनाएं शीघ्र पूर्ण होती हैं। हालांकि, यदि किसी कारणवश दोनों में से कोई एक व्रत न कर सके, तो अकेला पति या पत्नी भी पूर्ण निष्ठा और सात्विकता के साथ यह व्रत रख सकते हैं।

    5. पुत्रदा एकादशी के दिन पुत्र प्राप्ति के लिए क्या करना चाहिए?

    पुत्रदा एकादशी के दिन संतान प्राप्ति की कामना के लिए पति-पत्नी को मिलकर व्रत रखना चाहिए और भगवान विष्णु व बाल गोपाल की विधि-विधान से पूजा करनी चाहिए।

    निष्कर्ष

    पौष पुत्रदा एकादशी केवल एक धार्मिक व्रत या उपवास नहीं है, बल्कि यह सनातन परंपरा में भक्ति, साधना और परिवार के प्रति समर्पण का एक पावन पर्व है। भगवान श्री हरि विष्णु की विधिवत पूजा और निष्ठापूर्वक रखा गया यह व्रत न केवल निसंतान दंपत्तियों को संतान सुख का वरदान देता है, बल्कि पूर्व से मौजूद संतान की रक्षा, उसके उत्तम स्वास्थ्य और दीर्घायु की भी कामना पूरी करता है। इस पावन तिथि पर सात्विकता का पालन करते हुए श्रीहरि के मंत्रों का जाप, कथा का श्रवण और दान-पुण्य करने से व्यक्ति के समस्त पाप नष्ट हो जाते हैं तथा जीवन में सुख, शांति और समृद्धि का आगमन होता है।

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